जिन दिनों स्वामी विवेकानंद का भारत में जन्म हुआ ,उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। भारत व पश्चिमी जगत में हिंदू व हिंदुस्तान को उपेक्षित, कमतर आंका जा रहा था। हिंदू को नीचा दिखाने के अनेकों प्रयत्न किये जा रहे थे। ऐसे समय में स्वामी रामकृष्ण परमहंस की प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका- शिकागो गए । वहां पर एक ' विश्व धर्म सम्मेलन' का आयोजन 11 सितंबर 1893 को किया गया था। वहां पहुंचकर स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी जगत को संबोधित किया और सनातन धर्म- वेदांत की एक झलक प्रस्तुत करते हुये कहा- "मेरे अमेरिका के भाईयो और बहनों " इस संबोधन से अपने वक्तव्य की शुरुआत की इन शब्दों को सुनकर लोग आनंद से शराबोर हो गए और निरंतर तालियों की गड़गड़ाहट होती रही। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा - "मैं भारत की उस प्राचीन सन्यासी परंपरा की ओर से आप सभी को बधाई देता हूं, जिसने दु:खी- पीड़ित मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पण किया ,जिसका वाक्य 'सर्वे भवंतु सुखिनः- सर्वे संतु निरामया' है। जो 'कृन्वंतो विश्वामार्यम' के संदेश को लेकर संपूर्ण विश्व के सुखी, न्याय, प्रेम की कामना करती है। मैं भारत की उस प्राचीन भगवा परंपरा का एक सन्यासी हूँ जिसने संपूर्ण विश्व को अपना परिवार माना 'वसुधैव कुटुंबकम' व नारी को जँहा 'देवी' मानकर पूजा जाता है, आप सभी को प्रणाम करता हूं एवं आप सभी के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं।"
स्वामी विवेकानंद के दिव्य विचारों से प्रभावित होकर सारा पश्चिमी जगत अमेरिका सहित स्वामी जी के चरणों में शरणागत हो गए।
प्रोफेसर हेनरी राइट ने कहा - " स्वामी जी जिस देश में आपके जैसे ज्ञान के सूर्य रहते हैं, वहां पर इसाई मिशनरियां भेजना निरी मूर्खता है, सूर्य को दीपक दिखाने के समान है।"
स्वामी विवेकानंद जी युवाओं से आवाहन करते हैं कि -" वे विनम्र, साहसी और शक्तिशाली बने। युवा अपने आप को पहचाने ,आत्म विस्मृति से बाहर आए और भारत के गौरव के अनुरूप अपना चरित्र निर्माण व व्यवहार करें। युवाओं के कंधे पर राष्ट्र का भार होता है अतः "उठो! जागो ,रुको मत जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"
स्वामी जी एक ऐसे सचरित्र , शक्तिशाली युवा का निर्माण करना चाहते हैं व उसे आवाहन करते हैं कि उसकी शिराएँ फौलाद की हों, उनके स्नायु में वीरता का रक्त बहता हो , वह शीलवान ,विनम्र, साहसी, सुसंस्कृत, स्वाभिमानी, प्राचीन ऋषियों की विरासत से ओत-प्रोत होंकर भारत माता को समर्पित हो।
स्वामी जी कहते हैं- ' *राष्ट्र प्रथम:' । हमारा जन्म, जवानी ,जीवन, प्रतिभा सब भारत माता के लिए अर्पित हो, व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं। भारत माता ही दुर्गा माता, काली माता है। "तुम्हारई प्रतिमा गढी मंदिरे - मंदिरे " वंदेमातरम गीत में इसी पंक्ति के माध्यम से हम भारत माता की प्रार्थना- उपासना करते हैं अतः हमें यहां -वहां न भटक कर एक ही देवी भारत माता की प्रार्थना- उपासना ,सेवा करनी चाहिए। 'राष्ट्र देवो भव:, दरिद्र देवो भव:, अतिथि देवो भव:' के भाव से समाज की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची उपासना है। स्वामी जी कहते हैं- " मैं उस ईश्वर की आराधना करता हूं जिसे अज्ञानीजन मनुष्य कहते हैं। " अर्थात समाज सेवा ही ईश्वर सेवा है यह संसार उस विराट परमात्मा का ही स्वरुप है अतः इसको सुंदर ,समुन्नत बनाने में योगदान देना ही सच्ची ईश्वर भक्ति है।
स्वामी जी कहते हैं - " तुम जो सोचते हो वो हो जाओगे।" अत: दिन -रात अपने मस्तिष्क को, उच्चकोटि के विचारों से भरो। जो फल प्राप्त होगा वह निश्चित ही अनोखा होगा। युद्ध हो या जीवन, सफलता केवल तीन शस्त्रों से प्राप्त होती है धर्म ,धैर्य और साहस "। आगे स्वामी जी कहते हैं -" एक विचार चुनिए और उस विचार को अपना जीवन बना लीजिए, अपने दिमाग, अपने शरीर के हर अंग को उस विचार से भर लें वांकी सारे विचार छोड़ दें, यही सफलता का रास्ता है।"
स्वामी जी युवाओं से कहते हैं - " शक्ति ही जीवन है, आशक्ति ही मृत्यु है अतः शक्तिमान बनो।"
" तुम वही हो जैसी तुम्हारी श्रद्धा है।"
" हम वही हैं जो हमारे विचारों ने हमें बनाया है; इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं। विचार जीवित रहते हैं; वे दूर तक यात्रा करते हैं।"
" जो कुछ भी तुम्हें कमजोर बनाता है , शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक उस जहर की तरह त्याग दो।"
" जब तक जीना है, तब तक सीखना। अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। "
"गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा ही सबसे उत्तम कार्य और ईश्वर प्राप्ति का साधन है।"
"समष्टि की जय में जो स्वयं की विजय का मार्ग पा लेता है ,उसकी तो सदा विजय ही विजय है।"
" तुम्हें अंदर से बाहर की ओर विकसित होना चाहिए। कोई तुम्हें सिखा नहीं सकता,तुम्हारी अपनी आत्मा के अलावा कोई दूसरा शिक्षक नहीं है। तुम अनंत शक्तियों के भंडार हो, तुम अमृत पुत्र हो! "
" भारत ईश्वर की शोध में रत हो गया तो अमर हो जाएगा, यदि राजनीति के कीचड़ में लोटता रहा तो विनाश अटल है।"
स्वामी जी ने भारत के इतिहास पर दृष्टि डालते हुए भारतवर्ष के पतन के चार कारण बताएं हैं -
1. आत्म विस्मृति
2. राष्ट्रवाद का अभाव
3. सामाजिक संगठन का अभाव
4. क्षुद्र विचार
अंततः स्वामी जी भारतवर्ष के हिंदू समाज से आह्वान करते हैं -
" हे भारत! तुम मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श सीता, सावित्री, दमयंती हैं;
तुम मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य सर्व त्यागी उमानाथ शंकर हैं; मत भूलना की तुम्हारा विवाह ,धन और जीवन अपने इंद्रिय और व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है, तुम मत भूलना कि तुम्हारा जन्म ही 'माता' के लिए समर्पित होने के लिए हुआ है।
मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र है।
तुम मत भूलना की नीच, दरिद्र, अज्ञानी, चांडाल भी तुम्हारे ही रक्त हैं और तुम्हारे ही भाई हैं।
हे वीर सिंहो ! उठो! साहस का आश्रय लो और गर्व से कहो कि मैं भारतवासी हूं और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है।
कहो की अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी ,चांडाल भारतवासी सभी मेरे भाई हैं।
तुम भी कटीमात्र वस्त्रावृत होकर गर्व से कहो, कि भारतवासी मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव- देवियां मेरे ईश्वर हैं।
भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है।
अमृत पुत्रों! तुम कहो कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है और भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है और रात -दिन कहते रहो-
हे गौरीनाथ! हे जगदंबे! मुझे मनुष्यत्व दो, मां मेरी दुर्बलता और कापुरुष्ता दूर कर दो।
हे! मां मुझे मनुष्य बना दो। "
डॉ. नितिन सहारिया
