संत परंपरा के अनुकरणीय समाज सुधारक: संत गाडगे महाराज | The Voice TV

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संत परंपरा के अनुकरणीय समाज सुधारक: संत गाडगे महाराज

Date : 23-Feb-2026

 हमारे देश में अनेक संत हुए हैं जिन्होंने अपना जीवन गरीबों, वंचितों और पीड़ितों की सेवा में समर्पित कर दिया। संत गाडगे महाराज भी गुरु नानक, कबीर, रविदास और घासीदास की उसी महान परंपरा के संत थे, जिन्होंने “सरल जीवन और उच्च विचार” का आदर्श प्रस्तुत किया। उनकी 67वीं पुण्यतिथि के अवसर पर यह स्मरण करना महत्वपूर्ण है कि वे केवल उपदेश देने वाले संत नहीं थे, बल्कि अपने आचरण से समाज को दिशा दिखाने वाले कर्मयोगी थे।


संत गाडगे बाबा, जिन्हें संत गाडगे महाराज के नाम से भी जाना जाता है, का वास्तविक नाम देवराम गाडगे (देऊजी झिंगराजी जानोरकर) था। उनका जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेणगांव में एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ। उनका बचपन गरीबी में बीता और उन्हें औपचारिक शिक्षा बहुत कम प्राप्त हुई, लेकिन जीवन के अनुभवों ने उन्हें गहरी सामाजिक चेतना प्रदान की। व्यक्तिगत संघर्षों और अनुभवों ने उनके भीतर ऐसा परिवर्तन उत्पन्न किया कि उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज सुधार के लिए समर्पित कर दिया।

संत गाडगे बाबा ने अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, शराबखोरी और अस्वच्छता जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया। वे मानते थे कि समाज में परिवर्तन केवल प्रवचन से नहीं, बल्कि व्यवहार से आता है। इसलिए वे जहाँ भी जाते, स्वयं झाड़ू लेकर सफाई करते और लोगों को स्वच्छता का महत्व समझाते। उनका प्रसिद्ध संदेश था कि स्वच्छता ही सच्ची सेवा है। उन्होंने शिक्षा को भी समाज उन्नति का मूल आधार माना और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए छात्रावास तथा शिक्षण संस्थान स्थापित किए। वे साधारण लंगोटी और कंधे पर तौलिया रखकर गाँव-गाँव पैदल भ्रमण करते थे और अपने कीर्तनों के माध्यम से सामाजिक जागृति फैलाते थे।

संत गाडगे बाबा और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच परस्पर सम्मान और विचारों की समानता उल्लेखनीय थी। दोनों ने सामाजिक न्याय और समानता के लिए अलग-अलग मार्गों से कार्य किया, परंतु उनका उद्देश्य एक ही था—एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण। गाडगे बाबा अपने प्रवचनों में शिक्षा के महत्व को समझाने के लिए डॉ. अंबेडकर का उदाहरण देते थे और लोगों को पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करते थे। कहा जाता है कि अंबेडकर भी गाडगे बाबा के कार्यों से प्रभावित थे और उन्हें महात्मा ज्योतिबा फुले के बाद जनता का महान सेवक मानते थे। दोनों महापुरुषों का निधन भी लगभग एक ही समयावधि में हुआ—6 दिसंबर 1956 को अंबेडकर के निधन के बाद गाडगे बाबा गहरे शोक में डूब गए और 20 दिसंबर 1956 को उन्होंने भी अंतिम सांस ली।

संत गाडगे बाबा की विरासत आज भी जीवित है। महाराष्ट्र सरकार ने वर्ष 2000-01 में उनके सम्मान में “संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान” प्रारंभ किया, जिसके अंतर्गत स्वच्छता में उत्कृष्ट कार्य करने वाले गाँवों को सम्मानित किया जाता है। अमरावती विश्वविद्यालय का नाम भी उनके सम्मान में रखा गया है। भारत सरकार ने 1998 में उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया। उन्होंने जिन अनेक शैक्षणिक और सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की, वे आज भी उनके आदर्शों को आगे बढ़ा रही हैं। उनका जीवन सादगी, करुणा, समानता और निस्वार्थ सेवा का प्रेरणादायक उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों को निरंतर मार्गदर्शन देता रहेगा।

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