हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला 'महाशिवरात्रि' का पर्व भारतीय संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था, जो पुरुष और प्रकृति के मिलन का प्रतीक है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी रात्रि को भगवान शिव ने ब्रह्मांड के संरक्षण के लिए 'कालकूट' विष का पान किया था और पहली बार ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यह रात्रि 'अंधकार और अज्ञान' पर विजय प्राप्त करने का संकल्प लेने का समय है। इस दिन भक्त उपवास रखकर और रात्रि जागरण कर अपनी आंतरिक चेतना को जागृत करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि माना जाता है कि इस रात प्राकृतिक रूप से मनुष्य की ऊर्जा ऊपर की ओर प्रवाहित होती है।
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महाशिवरात्रि की रात को 'सिद्धि की रात' कहा जाता है। वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो इस रात पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध इस विशेष स्थिति में होता है कि मनुष्य के शरीर के भीतर की ऊर्जा (कुंडलिनी शक्ति) प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। लेखों के माध्यम से इस वैज्ञानिक तथ्य को समझाया जाता है कि क्यों इस रात 'रीढ़ की हड्डी' को सीधा रखकर जागरण करना चाहिए। उपवास और ध्यान के लाभों को वैज्ञानिक तर्क के साथ प्रस्तुत करना ही इस विषय पर लेखन का मुख्य उद्देश्य होता है, ताकि लोग इसे केवल अंधविश्वास न मानकर एक 'प्राकृतिक अवसर' के रूप में देखें।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संदेश
महाशिवरात्रि पर लेख बनाने का एक बड़ा सामाजिक कारण 'शिव तत्व' का प्रचार करना है। शिव का अर्थ है 'कल्याण'। शिव वह हैं जो विष पीकर भी शांत रहते हैं और श्मशान की भस्म से लेकर देवताओं के अमृत तक, सबको समान भाव से अपनाते हैं। समाज में बढ़ते तनाव, भेदभाव और अशांति के बीच शिव का यह स्वरूप धैर्य और समानता का संदेश देता है। लेखों के जरिए यह बताया जाता है कि कैसे हम अपने भीतर के 'काम, क्रोध और लोभ' रूपी विष को खत्म कर आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। अतः, महाशिवरात्रि पर लेख केवल सूचना मात्र नहीं, बल्कि आत्म-सुधार और विश्व-कल्याण का एक वैचारिक माध्यम है।
