सरोजिनी नायडू: भारतीय राजनीति और साहित्य का स्वर्णिम संगम | The Voice TV

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सरोजिनी नायडू: भारतीय राजनीति और साहित्य का स्वर्णिम संगम

Date : 13-Feb-2026

भारतीय इतिहास में सरोजिनी नायडू एक ऐसा नाम है जो अपनी मधुर काव्य रचनाओं और राष्ट्र के प्रति अदम्य साहस के लिए सदैव स्मरणीय रहेगा। 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में जन्मी सरोजिनी न केवल एक प्रखर राजनीतिज्ञ थीं, बल्कि वे एक विश्वप्रसिद्ध कवयित्री और समाज सुधारक भी थीं। उन्होंने एक ऐसे समय में अपनी पहचान बनाई जब महिलाओं की सामाजिक भागीदारी बहुत सीमित थी। उनकी बहुआयामी प्रतिभा ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में खड़ा किया।


सरोजिनी के पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक वैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री थे, जबकि उनकी माता वरदा सुंदरी एक कवयित्री थीं। यही कारण था कि उन्हें बचपन से ही घर में शैक्षणिक और रचनात्मक वातावरण मिला। मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली, जिसने उनकी विलक्षण बुद्धि का परिचय दिया। उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गईं, जहाँ उन्होंने लंदन के किंग्स कॉलेज और कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज में पढ़ाई की। इसी दौरान उन्हें महान साहित्यकारों ने अपनी मातृभूमि और प्रकृति पर लिखने के लिए प्रेरित किया।


सरोजिनी नायडू की कविताओं में भारतीय जीवन, संस्कृति और प्रकृति का जीवंत चित्रण मिलता है। उनकी प्रमुख कृतियों में 'द गोल्डन थ्रेशोल्ड', 'द बर्ड ऑफ टाइम' और 'द ब्रोकन विंग' अत्यंत प्रसिद्ध हैं। उनकी कविताओं की लय और मिठास के कारण ही महात्मा गांधी ने उन्हें 'भारत कोकिला' की उपाधि दी। उन्होंने अंग्रेजी भाषा में लिखकर भी पूरी दुनिया को भारतीय दर्शन और संवेदनाओं से परिचित कराया।


1905 में बंगाल विभाजन के समय सरोजिनी नायडू का परिचय गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी से हुआ, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने अपनी कलम छोड़कर देश की आजादी के लिए सक्रिय राजनीति में कदम रखा।


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: वे 1925 में कानपुर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं।


प्रमुख आंदोलन: उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और 'भारत छोड़ो' आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1930 के 'धरसाना सत्याग्रह' का नेतृत्व कर उन्होंने अपनी वीरता का लोहा मनवाया, जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा।


महिला अधिकार: वे 'भारतीय महिला संघ' की संस्थापक सदस्य थीं और उन्होंने महिलाओं के मतदान के अधिकार के लिए निरंतर आवाज उठाई।


स्वतंत्रता के बाद और ऐतिहासिक उपलब्धि

भारत की स्वतंत्रता के बाद, सरोजिनी नायडू को उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया। वे स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल थीं। उन्होंने इस पद की गरिमा को बढ़ाते हुए प्रशासनिक कौशल का परिचय दिया और हमेशा समाज के कमजोर वर्गों के लिए कार्य किया।


2 मार्च 1949 को सरोजिनी नायडू ने अंतिम सांस ली, लेकिन उनका व्यक्तित्व आज भी लाखों भारतीयों के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने सिद्ध किया कि एक स्त्री अपनी कोमल भावनाओं (कविता) और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति (राजनीति) के बीच संतुलन बनाकर इतिहास रच सकती है। उनका जीवन साहस, समरसता और देशप्रेम का एक ऐसा अध्याय है जो युगों-युगों तक भारतीय महिलाओं को सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।


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