22 फ़रवरी का दिन भारतीय इतिहास में गहरी संवेदना और प्रेरणा का दिवस है। यह वह तिथि है जब राष्ट्रमाता ‘बा’ ने महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर 1944 में अपने नश्वर शरीर का त्याग किया, किंतु अपने आदर्शों, त्याग और सेवा की अमिट छाप पूरे राष्ट्र के हृदय पर अंकित कर दी। कस्तूरबा गांधी केवल महात्मा गांधी की जीवनसंगिनी भर नहीं थीं; वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मौन तपस्विनी, संघर्ष की अडिग शिला और नारी शक्ति की सशक्त प्रतीक थीं। उनकी पुण्यतिथि हमें केवल शोक का अवसर नहीं देती, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर प्रदान करती है—यह स्मरण दिलाती है कि सच्ची महानता शोर में नहीं, बल्कि शांत समर्पण में निहित होती है।
कस्तूरबा गांधी का जन्म 11 अप्रैल 1869 को गुजरात के पोरबंदर में एक समृद्ध व्यापारी परिवार में हुआ। बाल्यावस्था में ही उनका विवाह मोहनदास करमचंद गांधी से हुआ। उस समय वे एक सामान्य भारतीय बालिका थीं, जिन्हें औपचारिक शिक्षा का अवसर कम मिला, परंतु जीवन के अनुभवों ने उन्हें जो शिक्षा दी, वह किसी विद्यालय से कम नहीं थी। विवाह के प्रारंभिक वर्षों में ही उन्होंने संघर्ष और समायोजन का पाठ सीखा। धीरे-धीरे उनका व्यक्तित्व परिपक्व होता गया और वे केवल एक गृहिणी न रहकर अपने पति के विचारों और आंदोलनों की सशक्त सहभागी बन गईं।
जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे, तब बा ने भी सत्याग्रह के मार्ग को अपनाया। 1913 में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय विवाहों की वैधता के प्रश्न पर उन्होंने खुलकर विरोध किया और जेल यात्रा भी की। उस समय जेलों की कठोर परिस्थितियाँ, अस्वच्छ भोजन और अमानवीय व्यवहार ने उनके शरीर को अवश्य कष्ट पहुँचाया, परंतु उनकी आत्मा को और अधिक दृढ़ बना दिया। उनका यह साहस दर्शाता है कि वे केवल किसी के पीछे चलने वाली नहीं थीं, बल्कि स्वयं अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली स्वतंत्र चेतना थीं।
भारत लौटने के बाद असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों में उनका सक्रिय योगदान रहा। जब-जब गांधीजी जेल गए, बा ने सभाओं का नेतृत्व किया, महिलाओं को संगठित किया और स्वतंत्रता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाया। वे भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गईं। उस समय जब समाज में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी, कस्तूरबा ने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर राष्ट्र सेवा को अपना कर्तव्य बनाया।
साबरमती आश्रम और सेवाग्राम आश्रम में उनका जीवन अनुशासन, सादगी और सेवा का उदाहरण था। वे आश्रमवासियों के लिए केवल एक अनुशासक नहीं, बल्कि एक ममतामयी माँ थीं। उन्होंने स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और श्रम की गरिमा को जीवन में उतारने का संदेश दिया। वे मानती थीं कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी होनी चाहिए। उन्होंने छुआछूत के विरुद्ध आवाज़ उठाई और समाज के वंचित वर्गों के साथ समानता का व्यवहार किया। यह उनकी दूरदर्शिता और करुणा का परिचायक था।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक चरण था। इसी दौरान बा को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद कर दिया गया। वहीं उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए। लगातार गिरते स्वास्थ्य, पुरानी ब्रोंकाइटिस और हृदय रोग के बावजूद उनके चेहरे पर शांति और विश्वास की आभा बनी रही। वे किसी प्रकार की शिकायत या भय से दूर रहीं। 22 फ़रवरी 1944 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उस समय गांधीजी उनके पास थे। यह क्षण जितना मार्मिक था, उतना ही गौरवपूर्ण भी—एक तपस्विनी ने अपने जीवन की साधना पूर्ण की थी।
कस्तूरबा गांधी का जीवन हमें यह सिखाता है कि त्याग ही सच्ची शक्ति है। उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा, न ही किसी प्रशंसा की अपेक्षा की। उनका जीवन सेवा और समर्पण का जीवंत उदाहरण है। वे मानती थीं कि राष्ट्र निर्माण का आधार परिवार और समाज की नैतिक शक्ति है। यदि महिलाएँ शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर होंगी, तो राष्ट्र स्वतः सशक्त होगा। उनकी यह सोच आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी स्वतंत्रता संग्राम के समय थी।
आज जब हम उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने का दिन नहीं है। यह दिन हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का आह्वान करता है। आधुनिक युग में जहाँ भौतिकता और प्रतिस्पर्धा का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, वहाँ बा की सादगी और संयम हमें संतुलन का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने सिखाया कि सच्ची प्रगति नैतिक मूल्यों और सेवा भाव से ही संभव है।
कस्तूरबा गांधी भारतीय नारीत्व की उस गरिमा का प्रतीक हैं जो कोमल भी है और दृढ़ भी। वे नदी की तरह शांत थीं, परंतु आवश्यकता पड़ने पर चट्टान की तरह अडिग भी। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में विश्वास और संकल्प हो तो हर बाधा को पार किया जा सकता है।
उनकी स्मृति में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को आगे बढ़ाएँगे। हम अपने समाज में महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण के लिए कार्य करेंगे। हम सादगी, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का प्रयास करेंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
बा का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि इतिहास केवल उन लोगों को याद नहीं रखता जो मंच पर खड़े होकर भाषण देते हैं, बल्कि उन लोगों को भी अमर कर देता है जो मौन रहकर अपने कर्मों से समाज को दिशा देते हैं। कस्तूरबा गांधी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि एक महिला, यदि संकल्पित हो, तो वह राष्ट्र की आत्मा को आकार दे सकती है।
22 फ़रवरी हमें हर वर्ष यह याद दिलाती है कि त्याग और सेवा का मार्ग कभी व्यर्थ नहीं जाता। बा का तप, उनका धैर्य और उनका अटूट विश्वास आज भी हमें प्रेरित करता है। वे केवल अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान की प्रेरणा और भविष्य की आशा हैं।
आइए, उनकी पुण्यतिथि पर हम सब मिलकर यह प्रण लें कि हम अपने जीवन में सादगी, सेवा और सत्य को स्थान देंगे। हम समाज में प्रेम, करुणा और समानता का संदेश फैलाएँगे। यही उनके जीवन का सार है और यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि।
राष्ट्रमाता ‘बा’ को शत-शत नमन।
