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गोपाल कृष्ण गोखले: भारतीय राजनीति के विवेक और गांधीजी के मार्गदर्शक

Date : 19-Feb-2026

 गोपाल कृष्ण गोखले आधुनिक भारत के उन महानतम निर्माताओं में से थे, जिन्होंने राष्ट्रवाद को एक बौद्धिक और नैतिक आधार प्रदान किया। 9 मई, 1866 को जन्मे गोखले ने न केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को दिशा दी, बल्कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन में शुचिता और गरिमा का एक ऐसा मानक स्थापित किया जो आज भी अनुकरणीय है। उन्हें एक 'मध्यमपंथी' नेता के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनका मध्यममार्ग कमजोरी का नहीं, बल्कि गहन धैर्य, तर्क और संवैधानिक शक्ति का परिचायक था। वे मानते थे कि स्वराज की प्राप्ति केवल नारों से नहीं, बल्कि ठोस सामाजिक सुधार और शिक्षा के माध्यम से ही संभव है।

गोखले की दूरदर्शिता का सबसे अनुपम उदाहरण 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' की स्थापना है। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने ऐसे युवाओं की फौज तैयार करने का स्वप्न देखा जो बिना किसी स्वार्थ के देश सेवा के लिए समर्पित हों। उनकी राजनीति केवल सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित नहीं थी; वे चाहते थे कि भारतीय नागरिक शिक्षित और चारित्रिक रूप से सशक्त बनें। समाज सुधार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि उन्होंने महिला शिक्षा और अस्पृश्यता निवारण जैसे मुद्दों को अपनी राजनीतिक गतिविधियों का अभिन्न हिस्सा बनाया।

विधायिका के भीतर गोखले का कौशल अद्वितीय था। इंपीरियल विधान परिषद में दिए गए उनके बजट भाषण इतने तर्कसंगत और जानकारी से भरपूर होते थे कि ब्रिटिश अधिकारी भी उनके मुरीद हो जाते थे। 1909 के मोर्ले-मिंटो सुधारों में उनकी सक्रिय भूमिका ने भारतीयों के लिए संवैधानिक भागीदारी के नए द्वार खोले। वे एक ऐसे संवादक थे जिन्होंने दिखाया कि विरोध भी शालीनता और तथ्यों के साथ किया जा सकता है।

गोखले की सबसे बड़ी विरासत शायद महात्मा गांधी के रूप में है। गांधीजी उन्हें अपना 'राजनीतिक गुरु' मानते थे। गांधीजी ने एक बार कहा था कि गोखले 'गंगा' के समान हैं—निर्मल और पवित्र। गोखले ने ही गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद भारत को अपनी आंखों से देखने और समझने की सलाह दी थी। यह गोखले की ही शिक्षा थी जिसने गांधीजी के अहिंसक आंदोलनों को एक मजबूत नींव प्रदान की। आज का भारत, जो लोकतंत्र और न्याय के पथ पर अग्रसर है, उनके इस महान योगदान का सदैव ऋणी रहेगा।


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