स्मृति शेषः कथा जगत को सूना कर गए ज्ञानरंजन | The Voice TV

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स्मृति शेषः कथा जगत को सूना कर गए ज्ञानरंजन

Date : 08-Jan-2026

साहित्यिक पत्रिका पहल के संपादक और प्रख्यात कथाकार ज्ञानरंजन कथा जगत को सूना कर गए। 07 जनवरी की रात जबलपुर में 90 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। इसी के साथ हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण युग का अवसान हो गया है। ज्ञानरंजन को अप्रतिम कथाकार और यशस्वी संपादक के रूप में जाना जाता है। उनके जाने से देश की प्रगतिशील साहित्यिक चेतना की सशक्त आवाज शांत हो गई। साठोत्तरी कहानी आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षर ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को हुआ था। वरिष्ठ साहित्यकार रामनाथ सुमन के पुत्र ज्ञानरंजन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद जबलपुर के प्रतिष्ठित जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया।

उनकी पहली कहानी 'दिवास्वप्नी' लिखी। इसके बाद 'कबाड़खाना', 'क्षणजीवी', 'सपना नहीं', 'फेंस के इधर और उधर' और 'प्रतिनिधि कहानियां' जैसे संग्रहों के माध्यम से उन्होंने हिंदी कथा साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी कहानियां काव्यात्मकता, भाषा के अनूठे प्रयोग, तीखे तेवर और नई शैली के लिए चर्चित रहीं।ज्ञानरंजन 'चार यार' के रूप में प्रसिद्ध साठोत्तरी पीढ़ी के समूह का हिस्सा रहे। इन चार यारों में दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया और 'वह' हैं। उन्होंने लगभग 35 वर्ष तक पहल संपादन और प्रकाशन किया।

उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, साहित्य भूषण सम्मान, शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और ज्ञानपीठ का ज्ञानगरिमा मानद अलंकरण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उनकी कहानियों का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और वे कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। उनके जीवन और कृतित्व पर दूरदर्शन एक फिल्म का निर्माण भी कर चुका है। ज्ञानरंजन ने 'पिता', 'अमरूद' जैसी कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक जटिलताओं को जीवंत किया। उनकी कहानियां समाज के सभी वर्गों के मनोभाव की गहरी पड़ताल करती हैं।

ज्ञानरंजन के छह कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इनकी कहानियों की कुल संख्या 25 है। यह 'सपना नहीं' संकलन में एकत्र हैं। उनकी अनूठी गद्य रचनाओं की एक किताब कबाड़खाना बहुत लोकप्रिय हुई। उन्होंने कहानियों के अतिरिक्त भी साहित्य की कई विधाओं में लेखन किया। ज्ञानरंजन की कहानियों भारतीय विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त ओसाका, लंदन, सैन फ्रांसिस्को, लेनिनग्राद, और हाइडेलबर्ग आदि के अनेक अध्ययन केंद्रों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं।

आखिरी पलों में जबलपुर में ज्ञानरंजन के पास रहे कृष्णकांत वर्मा 'टिल्लू' फोन करते ही रो पड़े। टिल्लू की बड़ी बेटी बोल्गा की शादी में ज्ञानरंजन और उनकी पत्नी रातभर रुके थे। तब इस बकलम की उनसे लंबी मुलाकात हुई थी। यह कुछ साल पहले की बात है। वो तब मौजूदा कथा परिदृश्य से काफी निराश लग रहे थे। विचारोत्तेजक कहानियों की कमी उन्हें साल रही थी। वह पहल के प्रकाशन को स्थगित करने के अपने फैसले को भी कोस रहे थे। फिर बोले-जो हुआ, अच्छा ही हुआ। सुबह जाते वक्त बोल गए थे, अगली दफा जबलपुर आएं तो '101, रामनगर, आधारताल' जरूर आएं। यही उनका और पहल का पता ठिकाना था। ताकीद किया था कि टिल्लू को भी साथ में ले आना। अफसोस तब से जबलपुर ही जाना न हो सका। टिल्लू हमारे देशबंधु की नौकरी के समय एकमात्र साथी हैं। उनसे पहल और ज्ञानरंजन जी के खूब किस्से सुने हैं।

फेसबुक में शोकाकुल उनके प्रशंसकों और परिचितों में वरिष्ठ पत्रकार सुनील श्रीवास्तव भी हैं। उन्होंने लिखा, '' पत्रकार और रंगकर्मी राकेश दीक्षित और अनिल रंजन भौमिक के पोस्ट से दुखद खबर मिली कि आदरणीय ज्ञानरंजन जी हम सब को छोड़ कर चले गए। कब-कैसे मालूम नहीं हो सका। साठोत्तरी पीढ़ी के सबसे सशक्त रचनाकार और पहल के माध्यम से साहित्यिक और प्रगतिशील सोच को सशक्त मंच देने वाले ज्ञान जी से उनकी रचनाओं के माध्यम से तो बहुत पहले से ही साक्षात्कार हो चुका था , लेकिन जब 1981 में धर्मयुग छोड़कर हितवाद में काम करने जबलपुर गया तब उनको बहुत नजदीक से जानने का अवसर मिला। न सिर्फ अवसर बल्कि स्नेह भी भरपूर मिला जो अब तक मिलता रहा । न जाने कितने लेखकों को उन्होंने न सिर्फ मंच दिया, बल्कि उन्हें साहित्य का मुकम्मल जहां भी दिया।

सुनील श्रीवास्तव कहते हैं, ''मृत्यु की खबर मिलते ही मैंने जब प्रकाश चन्द्रायन को नागपुर फोन किया तो उन्होंने बताया कि अभी साढ़े दस बजे उनकी मृत्यु हुई। पांच दिसम्बर को वह बेटे शांतनु ( पाशा ) के पास से जबलपुर गए थे। अमेरिका से उनकी बेटी भी आ गई थी। अभी कुछ महीनो पूर्व मैंने सम्पर्क करने की कोशिश की तो उनकी तबीयत खराब थी। मुझे याद आ रहा है वह दिन जब वह अकसर जब नागपुर में होते थे, तो लोकमत जरूर आते थे और प्रकाश जी, हम और ज्ञान जी खूब बातें करते थे, जिसमें सभी विषय शामिल होते। प्रकाश जी ने उनसे कुछ न- न करते भी लिखवा ही लिया करते थे। भाऊ समर्थ भी बहस में शामिल होते थे। भाऊ से भी मेरी पहचान ज्ञान जी ने ही कराई थी।

वरिष्ठ पत्रकार सुनील श्रीवास्तव लिखते हैं, ''मुझे याद आ रहा है कि जबलपुर में उनका घर कैसे साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बना था। भागवत रावत हों या कमला प्रसाद जब भी उनके यहां आते थे तो साहित्यिक उत्सव अपने आप बन जाता था। बाबा या कोई अन्य रचनाकार जब बाहर से आता था तो ज्ञान जी ही जबलपुर में उनका स्वागत करते थे। जब उत्सव शमशेर का आयोजन ज्ञान जी ने किया था, तब बाबा उन्हीं के यहां रुके थे। एक कमरा ऊपर का हरी भटनागर को दिया था। त्रिलोचन जी भी संभवत उन्हीं के यहां रुके थे। तब परसाई जी जिंदा थे और उत्सव शमशेर में शामिल भी हुए थे।सच तो यह था कि ज्ञान जी जबलपुर में होने वाली साहित्यिक -सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र थे। भाभी जी भी उनके साथ उनका पूरा सहयोग करती थीं। साठोत्तरी पीढ़ी का अंतिम स्तम्भ भी गिर गया। इसकी भरपाई अब न हो सकेगी। ज्ञानरंजन जी को अंतिम सलाम करता हूं।''


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