ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले में परंपरा के साथ-साथ विकास की झलक | The Voice TV

Quote :

"मेहनत का कोई विकल्प नहीं, बस मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ते रहो।"

Travel & Culture

ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले में परंपरा के साथ-साथ विकास की झलक

Date : 19-Jan-2026

 देहरादून । बागेश्वर के ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले में इस बार परंपरा के साथ-साथ विकास की झलक भी देखने को मिल रही है। जिला प्रशासन के विभिन्न विभागाें के स्टाल मेले में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इन स्टालों के माध्यम से आम जनता को सरकारी योजनाओं, विभागीय गतिविधियों और स्वरोजगार से जुड़ी जानकारियां दी जा रही हैं। इन स्टालों पर बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर योजनाओं की जानकारी ले रहे हैं।

उत्तरायणी मेले में लगे उद्यान विभाग के स्टाल विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। यहां प्रदर्शित 10.5 किलोग्राम की मूली और 8.5 फीट ऊंचा शिमला मिर्च का पौधा लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। मेलार्थी इन अनोखी सब्जियों को देखकर हैरान नजर आए और इनके बारे में जानकारी लेते दिखे। वही ताम्र के विभिन्न उत्पाद भी यहां देखे जा सकते है जो खुद अपने हाथों से शिल्पी बनाते है। साथ ही किसानों के विभिन्न उत्पाद भी विभिन्न स्टालों में देखे जा सकते है।

सहायक उद्यान अधिकारी कमलेश जोशी ने बताया कि उत्तरायणी मेले के माध्यम से विभाग ने किसानों और आम लोगों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। साथ ही उन्हें उन्नत कृषि पद्धतियों, सब्जी उत्पादन, फलोत्पादन और आधुनिक खेती के तरीकों की जानकारी दी जा रही है। वही किसान चंद्रशेखर पांडे ने बताया कि उनके द्वारा मेले में खुद उगाई गई जड़ी बूटी के उत्पाद ग्रीन टी, लेमन टी सहित कई उत्पाद लाए है। जिनको लोगों का बेहतर प्यार भी मिल रहा है। लोगों को इस दौरान जागरूक भी कर रहे है। इसके साथ ही मेले में हस्तशिल्प और ताम्र शिल्प से जुड़े कारीगरों ने अपनी पारंपरिक कला का शानदार प्रदर्शन किया है। बेकार लकड़ी से बने उपयोगी उत्पाद हों या हाथों से तैयार किए गए ताम्र बर्तन—हर स्टाल स्थानीय हुनर और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर पेश कर रहा है।

बेकार लकड़ी से बेहतर उत्पाद तैयार करने वाले हैंडक्राफ्ट के कारीगर का कहना है कि जोउनको मेले में काफी लाभ हो रहा है। लोगों के द्वारा उनके उत्पादों को सराहा गया है। उत्तरायणी मेले में बोर गांव से अपने ताम्र उत्पाद लेकर पहुंचे ताम्र शिल्पी शिव लाल ने बताया कि वह खुद अपने हाथों से बने ताम्र के उत्पाद लेकर मेले में पहुंचे है। मेले में आने का मुख्य कारण हमारी कला लोगो तक पहुंचे और उस कला को एक पहचान मिले। उत्तरायणी मेला न सिर्फ सांस्कृतिक उत्सव बना हुआ है, बल्कि किसानों, कारीगरों और शिल्पियों को नई पहचान और आर्थिक संबल देने का मजबूत मंच भी साबित हो रहा है।


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement