"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" यह कालजयी आह्वान आज भी करोड़ों युवाओं के कानों में गूंजता है। वर्ष 2026 में, भारत और विश्व 12 जनवरी को स्वामी विवेकानन्द की 163वीं जयंती मनाने जा रहे हैं। प्रत्येक वर्ष की भांति, इस दिन को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। यह दिन उस चेतना को पुनर्जीवित करने का अवसर है जिसने सोए हुए भारत को जगाया और पश्चिम की दृष्टि में हिंदू धर्म के प्रति सम्मान पैदा किया।
स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता के एक कुलीन परिवार में हुआ। बचपन में उनका नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे, उनकी बुद्धि प्रखर थी और सत्य को जानने की उनकी जिज्ञासा अनंत थी। तर्कवादी स्वभाव के कारण वे तब तक किसी बात को नहीं मानते थे जब तक उन्हें उसका प्रमाण न मिल जाए। उनकी खोज उन्हें स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास ले गई, जहाँ उन्होंने जीवन और धर्म के गहन रहस्यों को समझा। उनके गुरु ने उन्हें सिखाया कि ‘जीव ही शिव है’ और दरिद्र की सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है।
स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को दुनिया के सामने एक नए दृष्टिकोण से पेश किया। उनका मानना था कि हर मनुष्य के भीतर परमात्मा का अंश है और हिन्दू धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मशक्ति की पहचान और मानवता की सेवा सिखाता है। उन्होंने मूर्ति पूजा की आलोचना करने वालों को समझाया कि मूर्ति केवल एक प्रतीक है, जो भक्त को निराकार ईश्वर से जोड़ती है। उनका संदेश युवाओं में निर्भयता और साहस का था; वे कहते थे कि कमजोरी पाप है और शक्ति ही धर्म है।
11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द ने जो भाषण दिया, वह आज भी ऐतिहासिक माना जाता है। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत "मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों" से की, जिसने पूरी दुनिया को हिन्दू धर्म की सहिष्णुता और सार्वभौमिक दृष्टि का परिचय दिया। उनके विचारों में सभी धर्मों की एकता, कट्टरता के विरुद्ध संदेश और मानवता के लिए चिंता झलकती है। अमेरिकी अखबारों ने उनके भाषण के बाद लिखा कि भारत में मिशनरी गतिविधियों की आवश्यकता को समझना कितना मूर्खतापूर्ण है।
स्वामी विवेकानन्द ने वेदान्त को केवल दर्शन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘व्यावहारिक वेदान्त’ में परिवर्तित किया। उनका मानना था कि धर्म का असली मूल्य समाज सेवा में है। उन्होंने जातिवाद, छुआछूत और महिलाओं की अशिक्षा के खिलाफ आवाज उठाई और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था—“आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” यानी अपने मोक्ष और समाज के कल्याण के लिए प्रयास करना।
वर्ष 2026 में राष्ट्रीय युवा दिवस की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आधुनिक युवा तकनीकी रूप से सक्षम हैं, लेकिन मानसिक शांति और उद्देश्य की तलाश में भटक रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द के विचार आज युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता, आत्मविश्वास, स्वदेशी सोच और चरित्र निर्माण में मार्गदर्शन देते हैं।
स्वामी विवेकानन्द का भारतीय राष्ट्रवाद पर भी गहरा प्रभाव रहा। उन्होंने भारत को एक ‘जीवंत देवी’ के रूप में देखा और युवाओं को देशभक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें "आधुनिक भारत का निर्माता" कहा, जबकि महात्मा गांधी ने स्वीकार किया कि उनके लेखन ने उनके देशप्रेम को कई गुना बढ़ाया।
उनके 10 अनमोल विचार जीवन को दिशा देने वाले हैं, जिनमें आत्मविश्वास, संघर्ष, सत्यप्रियता, प्रेम, अनुभव, अध्यात्म और स्वावलंबन की शिक्षा निहित है। उनका संदेश आज भी युवाओं के लिए उतना ही प्रेरणादायक है जितना 19वीं सदी में था।
स्वामी विवेकानन्द जयंती 2026 हमें यह याद दिलाती है कि हिन्दू धर्म केवल आस्थाओं का समूह नहीं, बल्कि एक महान जीवन दर्शन है। उदार होना, साहसी होना और संपूर्ण मानवता को अपना समझना, उनके संदेश का मूल है। उनकी शिक्षाओं को अपनाकर हम अपने जीवन में व्यावहारिक वेदान्त का पालन कर सकते हैं, चरित्र का निर्माण कर सकते हैं और समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द का प्रकाश सदियों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
