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बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का संकट बहुत गहरा है !

Date : 04-Jan-2026

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की स्थिति आज भयावह से भी आगे बढ़ चुकी है। हत्या, आगजनी, भीड़ हिंसा और झूठे “धर्म अपमान” के आरोप अब सिर्फ विशेष घटनाओं तक सीमित नहीं रहे, ये एक स्थायी और व्यवस्थित समस्या बन चुकी है। पिछले 20 दिनों में ही चौथी बार किसी हिंदू युवक की हत्या ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वहाँ कानून की पकड़ टूट चुकी है और इस्‍लामिक कट्टरता को खुलेआम जगह मिल रही है। मयमनसिंह, ढाका और पिरोजपुर तक फैली हिंसा अलग-अलग घटनाओं का संग्रह भर नहीं है, यह सामूहिक सामाजिक विफलता की अभूतपूर्व तस्वीर है जो आज बांग्‍लादेश में हमें दिखाई देती है।

ढाका के नेशनल बर्न इंस्टीट्यूट में शनिवार (3 जनवरी, 2026) को 50 वर्षीय हिंदू व्यापारी खोकन चंद्र दास की इलाज के दौरान मौत हो गई, जिसे पहले धारदार हथियारों के हमला कर पूरी तरह से लहूलुहान कर दिया गया था और उसके बाद उसे आग के हवाले कर दिया गया था। खोकन चंद्र दास अपनी दवाई की दुकान बंद कर रात में ऑटो से घर लौट रहे थे, इस बीच रास्ते में कुछ हमलावरों ने उन्हें रोका और बुरी तरह से मारा। इसके बाद उन पर पेट्रोल डालकर उन्हें जिंदा जला दिया। हालांकि, इस घटना के बाद तीन दिनों तक खोकन दास जिंदगी के लिए मौत और असहनीय तकलीफ से जूझते रहे, लेकिन अंत में हार गए। इससे पहले मयमनसिंह जिले में 29 दिसंबर 2025 की शाम बजेंद्र बिस्वास की गोली मारकर हत्या की गई थी।

कहना होगा कि बांग्लादेश में बार-बार हो रही हिंदुओं के खिलाफ हिंसा ने फिर सवाल खड़े कर दिए कि सुरक्षा व्यवस्था किनके लिए है और किनके लिए नहीं। पुलिस इसे केवल “दुर्घटना” मानने की कोशिश कर रही है, किंतु जिस सामाजिक और राजनीतिक माहौल में यह हुआ, वह इसे सामान्य घटना नहीं रहने देता। 18 दिसंबर को दीपू चंद्र दास को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला और उसका शव सार्वजनिक रूप से जलाया, जो बर्बर तरीके से की गई हिंसक घटना थी।

बांग्‍लादेश को लेकर बीते कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या यहां अचानक उत्पन्न नहीं हुई है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। साल 2022 में ऐसे 47 हमले दर्ज किए गए, साल 2023 में यह बढ़कर 302 हो गए और साल 2024 में यह संख्या 3,200 पार कर गई। इसी अवधि में 23 हिंदुओं की मौत और 152 मंदिरों पर हमले भी दर्ज हुए। मानवाधिकार संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि साल 2023 से 2024 के बीच 1,045 से अधिक हमले हुए, जिनमें हत्या, भूमि पर जबरन कब्जा, घर और व्यवसाय को नुकसान पहुंचाना, बलात्कार और जबरन धर्म परिवर्तन (इस्‍लाम अपनाने) जैसी घृणित घटनाएँ शामिल हैं।

समझने वाली बात यह भी है कि हिंसा अपराध होने तक सीमित नहीं है, ये जनसांख्यिकीय संकट का संकेत भी है। साल 1974 में बांग्लादेश की कुल आबादी में हिंदू समुदाय 13.5 प्रतिशत था, जबकि मुसलिम आबादी 85.4 प्रतिशत थी। साल 2022 की जनगणना में हिंदुओं का हिस्सा घटकर केवल 7.96 प्रतिशत रह गया। यह स्पष्ट संकेत है कि सामाजिक-दबाव, हिंसा और विस्थापन के कारण यहां हिन्‍दू अल्पसंख्यक समुदाय लगातार सिकुड़ रहा है।

धर्म के अपमान या ‘ईशनिंदा’ के झूठे आरोप भी तेजी से बढ़े हैं। साल 2025 की जून से दिसंबर अवधि में कम से कम 71 ऐसे मामले दर्ज किए गए। यह दिखाता है कि सोशल मीडिया और अफवाहें समुदायों को भड़काने का माध्यम बन गई हैं और फिर भीड़ हिंसा को बढ़ावा दिया जाता है।राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता इस संकट को और गंभीर बनाती है। बांग्लादेश खुद को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में पेश करने की कोशिश करता है लेकिन उसका व्‍यवहार इससे उलट है। राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथी ताकतों का उभार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें और वीडियो निर्दोष लोगों के जलते घर और पीड़ितों की तस्वीर यहां जीते-जागते सामूहिक असहिष्णुता का दस्तावेज हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समुदाय के लिए भी यह एक गंभीर चेतावनी है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के अनुसार हर राज्य की जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। जब एक धर्मनिरपेक्ष देश अपनी अल्पसंख्यक आबादी की सुरक्षा में असफल होता है तो यह संरचनात्मक मानवाधिकार संकट बन जाता है। भारत सहित कई देशों ने अपनी चिंता व्यक्त की है लेकिन कूटनीतिक बयान और चेतावनी अब तक बांग्‍लादेश के संदर्भ में पर्याप्त नहीं है। समस्या को रोकने के लिए कट्टरपंथी समूहों पर कठोर कार्रवाई, दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी प्रावधान और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आज बेहद अनिवार्य है। जिहाद और इस्लाम के नाम पर पड़ोसी मुल्कों (बांग्लादेश- पाकिस्तान) में हो रही हिंदुओं की हत्याएं आज भी यही बता रही हैं कि धर्म के आधार पर साल 1947 में हुआ भारत विभाजन अभी भी न्याय मांग रहा है।


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