भारत को त्योहारों और लोकपर्वों का देश कहा जाता है। यहाँ हर राज्य, हर क्षेत्र और हर समुदाय के अपने विशिष्ट पर्व हैं, जो स्थानीय संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली को दर्शाते हैं। इन त्योहारों के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और सामूहिक जीवन से जुड़ी गहरी भावना भी निहित होती है। छत्तीसगढ़ का लोकपर्व **छेरछेरा** भी ऐसा ही एक पर्व है, जो राज्य की कृषि प्रधान संस्कृति और दानशील परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व प्रतिवर्ष पौष पूर्णिमा के दिन, सामान्यतः 03 जनवरी को मनाया जाता है।
छेरछेरा पर्व नई फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है, जब किसान सालभर की मेहनत के बाद धान को घर की कोठियों में भरते हैं। इसे ‘छेरछेरा पुन्नी’ या ‘छेरछेरा तिहार’ भी कहा जाता है। यह समय किसानों के लिए हर्ष और संतोष का होता है, क्योंकि खेतों की मेहनत अब अन्न के रूप में घर तक पहुँच चुकी होती है। यह पर्व नई फसल के स्वागत, अन्न के सम्मान और समाज में खुशहाली बांटने का प्रतीक माना जाता है।
इस पर्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता दान की परंपरा है। मान्यता है कि छेरछेरा के दिन अन्नदान करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। इसी भावना के साथ लोग अपनी नई फसल से दान करते हैं। बच्चे और बड़े समूह बनाकर गांव के हर घर में जाते हैं और पारंपरिक गीत गाते हुए दान मांगते हैं। सबसे प्रचलित पंक्ति होती है— “छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हेर हेरा।” लोग दान स्वरूप धान, चावल, साग-भाजी या पैसे देते हैं। यह परंपरा समाज में आपसी सहयोग, समानता और उदारता की भावना को मजबूत करती है।
छेरछेरा पर्व में गांव के युवाओं की भागीदारी भी विशेष रूप से देखने को मिलती है। युवक पारंपरिक वेशभूषा धारण कर ढोल, मांदर जैसे लोक वाद्य यंत्रों की धुन पर डंडा नृत्य करते हुए घर-घर जाते हैं। यह नृत्य पूरे गांव में उत्साह और उल्लास का वातावरण बना देता है और लोकसंस्कृति को जीवित रखने का कार्य करता है।
इस पर्व को अन्नपूर्णा देवी या शाकंभरी देवी की आराधना से भी जोड़ा जाता है। देवी को धरती पर अन्न प्रदान करने वाली माता माना जाता है। लोग इस दिन देवी का स्मरण कर अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
छेरछेरा पर्व केवल एक कृषि या धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। इस दिन अमीर-गरीब, छोटे-बड़े का भेद मिट जाता है और पूरा समाज एक साथ उत्सव में शामिल होता है। छत्तीसगढ़ का यह लोकपर्व आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है और यह सिखाता है कि सच्ची समृद्धि वही है, जो बांटने से बढ़ती है।
