रामोविग्रहवान धर्म : लोकाभिमुख धर्मज्ञ राजा रामचन्द्र जी | The Voice TV

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रामोविग्रहवान धर्म : लोकाभिमुख धर्मज्ञ राजा रामचन्द्र जी

Date : 04-Jan-2024

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और उनका जीवनादर्श सम्पूर्ण सृष्टि के सम्यक ढंग से सञ्चालन के लिए अमृत सूत्र हैं। वे भारत की आत्मा के रूप में सतत् अमृत कलश से राष्ट्र की रग रग में प्रवाहित तो हो ही रहे हैं । साथ ही पुण्यता की दैवीय आभा से भी राष्ट्र जीवन का पालन-पोषण कर रहे हैं । राम पुत्र के रूप में, भाई के रूप में, पति के रूप में, शिष्य के रूप में , आदर्श राजा के रूप में अपने समस्त कर्त्तव्यों के पालनकर्ता के रूप में जन जन के मन में रचे बसे हुए हैं। गुरुभक्ति, मातृभक्ति, पितृभक्ति, प्रजापालन,धर्मपालन, जन्मभूमि मातृभूमि के प्रति अनन्य निष्ठावान प्रजाहितदक्ष राजा श्री  रामचन्द्र जी का आदर्श - जीवन के प्रत्येक क्रम में सबको धर्म की राह दिखलाता है । वे नीति धर्म-विधान-संचालन के नियामक हैं। किसी भी सीमा या विभाजन से भरे घट घट वासी राम सबके हैं और सबमें राम है ; यह बोध वाक्य ही उन्हें सर्वत्र व्याप्त करता है। इसीलिए बाबा गोस्वामी तुलसीदास ने उनकी महिमा का बखान करते हुए कहा है कि - 

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ 
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥

प्रभु श्रीराम भारत ही नहीं अपितु अखिल विश्व को 'धर्म राज्य - राम राज्य ' का पथ प्रशस्त करते हैं। इहलोक से लेकर परलोक की कामना तक में श्रीराम महिमा सबको एकसूत्रता में बांधे रहती है। उनके अवतरण काल से लेकर उनका सम्पूर्ण जीवन आदर्शों एवं मूल्यों की संस्थापना का काल रहा है ।  ठीक इसी भांति उनके द्वारा स्थापित 'राम राज्य ' भी राज्य के सञ्चालन का सर्वश्रेष्ठ आदर्श के रूप में सबके मानस में विद्यमान है। एक राजा कैसा होना चाहिए? राजा या शासनकर्त्ता के प्रजापालन धर्मपालन की नीति कैसी होनी चाहिए ? यदि इन आदर्शों को सीखना है - अनुकरण करना है तो श्रीरामचन्द्र जी में हम मनुष्यत्व से देवत्व के अनन्त स्वरूप एवं स्त्रोतों का दिग्दर्शन कर सकते हैं । 

न च पित्रा परित्यक्तो नामर्यादः कथंचन। 
न लुब्धो न च दुःशीलो न च क्षत्रियपांसनः।।

अर्थात् — 'श्रीरामचन्द्रजी न तो पिता द्वारा त्यागे या निकाले गए हैं, न उन्होंने धर्म की मर्यादा का किसी तरह त्याग किया है, न वे लोभी, न दूषित आचार-विचार वाले और न क्षत्रियकुल-कलङ्क ही हैं॥ 

उनके स्वभाव की विशिष्टता बतलाने वाला यह प्रसंग भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श को रेखांकित करता है —

न च धर्मगुणहीनः कौसल्यानन्दवर्धनः।
न च तीक्ष्णो हि भूतानां सर्वभूतहिते रतः॥

अर्थात् — ‘कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले श्रीराम धर्मसम्बन्धी गुणों से हीन नहीं हुए हैं। उनका स्वभावभी किसी प्राणी के प्रति तीखा नहीं है। वे सदा समस्त प्राणियों के हित में ही तत्पर रहते हैं।

रावण का संहार निकट था इसलिए वह माता सीता के हरण के लिए उन्माद से भरा हुआ था। उस समय मारीच - रावण को राम क्या हैं ? यह यहां पर और अधिक सुस्पष्ट हो जाता है —

रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्य पराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाम् इव वासवः॥

अर्थात्  — श्रीराम धर्म के मूर्तिमान् स्वरूप हैं। वे साधु और सत्यपराक्रमी हैं। जैसे इन्द्र समस्त देवताओं के अधिपति हैं, उसी प्रकार श्रीराम भी सम्पूर्ण जगत् के राजा हैं ।

भगवान राम केवल शस्त्र ही नहीं बल्कि शास्त्र के भी ज्ञाता थे। अतएव वे धर्मानुसार शास्त्र  की आज्ञा से राज्य का सञ्चालन करते थे। वेद के विद्वान के रूप में भी उनकी ख्याति थी‌ ‌। जब उनके  राज्याभिषेक के समय महाराजा दशरथ ने प्रजा / मन्त्रि परिषद् का अनुमोदन चाहा था, उस समय प्रजा ने यह कहते हुए भी श्रीराम के राज्याभिषेक को स्वीकृति दी थी —

“सम्यग्  विद्याव्रतस्नातो - यथावत्-  सांगवेदवित्”
( वाल्मीकि रामायण )

अर्थात् -  श्री राम में अन्य गुण वैशिष्ट्य के साथ साथ सांगोपांग वेद विद्वता भी है। 

अयोध्या में  उनके राज्य सञ्चालन के लिए अमात्य , मन्त्रि परिषद्  , राजपुरोहित , सभा आदि  की सुव्यवस्था थी। इन सबके ऊपर नियामक तत्व 'धर्म' था और धर्म - आज्ञा से ही  लोकल्याणकारी - लोकाभिमुख शासन तंत्र की संरचना थी। भगवान श्री राम को जब राजा के  आदर्श के रूप में देखते हैं तो वह आदर्श 'तत्वनिष्ठ-धर्मनिष्ठ'  स्वरूप में महनीय रुप में प्रतिष्ठित है । एक राजा के शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि - उसके राज्य में सर्वत्र प्रसन्नता, सुख समृध्दि, शान्ति,  आरोग्य, समन्वय, साहचर्य, आत्मानुशासन , प्राणिमात्र के प्रति कल्याण के भाव विचार और कार्य सर्वत्र दिखाई दें। सभी ओर सौमनस्य प्रेम भाव - धर्मभाव दृष्टिगोचर हो। कहीं भी किसी भी प्रकार की विपत्ति न हो - किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो। सब अपने अपने 'स्वधर्म' का पालन करते हुए जीवन निर्वाह करें।  ; इन समस्त वैशिष्टयों के अतिरिक्त भी मनुष्य एवं प्राणि मात्र के कल्याण एवं उन्नति के जितने भी प्रयोजन / कार्य हो सकते हैं। वे सभी भगवान श्री राम के राज्य का स्वभाव रहे हैं । इसीलिए 'रामराज्य' मानक राज्य के रूप में जन-जन की चेतना में विद्यमान है।

बाबा गोस्वामी तुलसीदास ने रामराज्य के विषय में लिखा है —

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

अर्थात् — 'रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते ( सताते ) हैं। सभी मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) के अनुसार अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। 

इसी प्रकार राम राज्य में सर्वत्र 'धर्म'  ही दृष्टव्य होता है। अभिप्रायत: धर्म ही नियामक तत्व बनकर सभी में विद्यमान हो चुका है। 

चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥

अर्थात् — धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्‌ में परिपूर्ण हो रहा है, स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परम गति (मोक्ष) के अधिकारी हैं।

इसी प्रकार उनके शासन में 'अकाल मृत्यु ' कभी नहीं होती।  प्रत्येक व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण आयु पूरी करने के पश्चात ही मृत्यु को प्राप्त करता है। 

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।‌।

अर्थात् —  अल्पायु में  मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुःखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही है। 

भगवान राम के राज्य में प्रजाजन कैसे हैं इसका सुंदर वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि —
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥

अर्थात् — सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान्‌ हैं। सभी गुणों का आदर करने वाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरे के किए हुए उपकार को मानने वाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसी में नहीं है। 

इसके अतिरिक्त रामराज्य में प्रकृति - सहचरी के रूप में थी‌ । प्रकृति का इतना अनुपमेय संतुलन अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता है। इस सन्दर्भ में —

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ॥

अर्थात् — वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह ( बैर भूलकर) एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है‌ ‌। 

लता बिटप मागें मधु चवहीं। मन भावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥

अर्थात् —  बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गायें मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की करनी (स्थिति) हो गई। 

भगवान राम के राज्य में उनके नेतृत्व में प्रकृति का जो अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। वह सर्वत्र सर्वोच्च आदर्श के रूप में राह दिखाता है।  इसी सन्दर्भ में 'राम राज्य ' में —

सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥

अर्थात् —  श्री रामचंद्रजी के राज्य में चंद्रमा अपनी (अमृतमयी) किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से (जब जहाँ जितना चाहिए उतना ही) जल देते हैं। 

फिर इस चौपाई में राम भगवान का  आदर्श निरुपित करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा —

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥

अर्थात् — प्रभु श्री रामजी ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों को अनेकों दान दिए। श्री रामचंद्रजी वेदमार्ग के पालने वाले, धर्म की धुरी को धारण करने वाले, (प्रकृतिजन्य सत्व, रज और तम) तीनों गुणों से अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्र के समान हैं॥

ऐसे प्रजापालक - धर्म के साक्षात् स्वरूप भगवान श्री राम ने धर्म की मर्यादा का जो अवर्णनीय उदाहरण अपने रामावतार में प्रस्तुत किया । वह युगों-युगों तक - जब तक भारत का अस्तित्व है ,जब तक सृष्टि का अस्तित्व है। सभी के लिए अनुकरणीय है। उनके राज्य की समस्त मर्यादाओं का एक ही आदर्श है - वह है धर्म। रामराज्य में वस्तुत: कोई किसी का शत्रु नहीं है। किन्तु फिर भी धर्मविमुखों को धर्मानुसार आचरण करने का विधान है । राम के अश्वमेध यज्ञ भी 'धर्म' की सत्ता स्वीकार कर धर्म राज्य चलाने के प्रतीक थे। भगवान राम इसी लिए राजा के आदर्श के रूप में युगों युगों से अधिष्ठित हैं , क्योंकि उन्होंने सभी को अपना माना - उसे अपने परिवार का अभिन्न अङ्ग मानकर स्वीकार किया।  वे राम ही थे जो धर्म की मर्यादा में बंधकर - पितृ आज्ञा को धर्म आज्ञा मानकर वनवास को स्वीकार कर अयोध्या का राजसिंहासन छोड़कर चले गए । क्योंकि सिंहासन नहीं बल्कि धर्म की मर्यादा और अनुशासन उनका स्वभाव था। वनवास काल में उन्होंने किन्हें अपना सहयोगी बनाया ? क्या किन्हीं राजवंशों को - राजा महाराजाओं को ? नहीं..! उन्होंने वानर, भालू, रीछ, वनवासियों को अपना सहचर बनाया। ऋषि मुनियों के चरणों की सेवा कर उनके वचनों को धर्म आज्ञा मानी। राम जहां जहां से गुजरे वे वहां वहां के हो गए। उनसे जुड़ा हुआ प्रत्येक स्थान - श्रध्दा केन्द्र एवं देवालय के रूप प्रतिष्ठित होकर लोक के साथ जुड़ गया ।  रामायणकालीन अखण्ड भारतवर्ष का एक एक कोना - राममय हो गया। सर्वत्र श्रीराम का आदर्श स्वमेव समाविष्ट हो गया।
उन्होंने निषादराज गुह, केवट, भीलनी माता शबरी, सुग्रीव, अंगद , हनुमान, जाम्बवान ,नल - नील सहित अन्यान्य वनवासियों / गिरिजनों को अपना सहयोगी बनाया - मित्र बनाया। रावण सहित समस्त आसुरी शक्तियों का संहार किया। विभीषण को लंका के राजसिंहासन पर आसीन किया। लंका विजय के पश्चात माता और मातृभूमि की महत्ता बतलाते हुए उन्होंने कहा था —
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥

अर्थात् —  हे! लक्ष्मण! मुझे स्वर्णमयी लंका भी अच्छी नहीं लगती।  माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है ।

भारतवर्ष को अपने स्वत्वबोध के साथ विश्वगुरु के सिंहासन पर पुनः विराजमान होने का पथ राजा रामचन्द्र जी के आदर्श एवं उनके द्वारा प्रणीत नीतियों के आलोक में ही दिखाई देता है। भारत भूमि तो वैसे भी सौभाग्यशाली रही है कि यहाँ धर्ममय - ज्ञान विज्ञान अनुसंधान एवं मनुष्य ही नहीं अपितु प्राणिमात्र के कल्याण का सुपंथ विकसित हुआ। धर्म अध्यात्म  ज्ञान की भूमि  भारत से ऐसे ऐसे ईश्वरीय अवतारों एवं ऋषि महर्षियों का अवतरण हुआ जिन्होंने सम्पूर्ण सृष्टि के मङ्गल का दिशाबोध युगबोध प्रदान किया। प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राजा रामचन्द्र जी के आदर्शों का अनुकरण 'राम राज्य ' के सहभागी बनें और नव्य- भव्य- दिव्य भारतवर्ष का निर्माण करें।

लेखक - कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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