सही पूछा जाए तो अहिंदी क्षेत्रवासियों ने ही हिन्दी का बाना उठाया। बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, रवींद्र नाथ टैगोर, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सुब्रह्मण्यम भारती, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जैसे मनीषी थे जिन्होंने हिन्दी की प्राण प्रतिष्ठा में मदद की।
ये सभी यह मानते थे कि हिन्दी ही देश को एक सूत्र में बाँध सकती थी। क्योंकि यह संघर्ष भी भाषा है,यह स्वाधीनता का स्वर है। महात्मा गांधी स्वीकार करते थे कि उनकी हिन्दी कमजोर है फिर भी यह भाषा राष्ट्र की आन,बान,शान है।
संविधान में हिन्दी को जब राजभाषा स्वीकार किया गया तो ये बात कही गई कि निकट भविष्य में देश अँग्रेजी की केंचुल उतार फेकेगा लेकिन यह एक झांसेबाजी थी।
भारतीय प्रशासनिक एवं समकक्षीय सेवाएं जिनसे देसी लाटसाहब तैयार होते हैं,वहां हिन्दी के संस्कार नहीं दिए गए। ये देश के नए राजे महाराजे हैं और हर बाप अपने बेटों का भविष्य इन्हीं की छवि में देखता है।
लाटसाहबियत में अँग्रजी अभी भी है कल भी रहेगी नेता कुछ भी बोलें उसे फर्जी समझिए।
हिन्दी अब तक न्याय की भी भाषा नहीं बन पाई। उच्चन्यायालयों में नख से शिख तक अँग्रजी है। मुव्वकिलों को हिन्दी की एक एक चिंदी का अँग्रजी रूपांतरण करवाना होता है और उसके लिए भी रकम खर्चनी पड़ती है। यहां अँग्रजी शोषण की भाषा है।
कल्पना करिए यदि उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी व देश की अन्य भाषाओं को उनके क्षेत्र हिसाब से चलन में आ जाए तो अँग्रजी का एकाधिकार टूटने में पलभर भी नहीं लगेगा। मंहगे वकीलों की फीस जमीन पर आ जाएगी और न्याय भी सहज और सस्ता हो जाएगा।
हिन्दी और देशी भाषाओं की लडा़ई लड़ने वाले श्यामरुद्र पाठक की सुधि लेने वाली न भाजपा है न स्वदेशी आंदोलन वाले। सन् 2011में यूपीए सरकार के खिलाफ लंबी लडा़ई लड़ी। सालोंसाल धरने में बैठे रहे। एक दिन सरकार ने पकड़कर तिहाड़ भेज दिया तब से पता नहीं कि वे कहां हैं।
श्यामरुद पाठक कोई मामूली आदमी नहीं हैं। उच्च शिक्षित, व हिंदी माध्यम से विग्यान विषय में पीएचडी करने वाले, हिंदी माध्यम से आईएएस की परीक्षा पास करने वाले। हर मुद्दे पर गत्ते की तलवार भांजने वाले चैनलिया एंकरों को भी इधर देखने की फुरसत नहीं।
वस्तुत: जो लोकरूचि का लेखक हैं उन्हें ये महंत और उनके पंडे साहित्यकार मानते ही नहीं। बाहर 'गाँडफादर' और लोलिता जैसे उपन्यासों को साहित्यिक कृति का दर्जा है। यहां ऐसी कृतियों को लुगदी साहित्य करार कर पल भर में खारिज कर दिया जाता है।
हिन्दी के कृतिकार अपने ख़ोल में घुसे हैं । यही इनकी दुनिया है। हिन्दी को बाजार पालपोस रहा है। यह उत्पादक और उपभोक्ता की भाषा है। बाजार के आकार के साथ साथ हिन्दी का भी आकार बढ़ रहा है। फिल्में हिन्दी को सात समंदर पार ले जा रही हैं। जिस काम की अपेक्षा साहित्यकारों से है वह काम अपढ फिल्मकार कर रहे हैं।
हिन्दी की गति उसकी नियति से तय हो रही है। जैसे फैले फैलने दीजिए। अपन तो यही मानते हैं कि जैसे घूरे के दिन भी कभी न कभी फिरते हैं, वैसे ही हिन्दी के भी फिरेंगे।
लेखक - जयराम शुक्ल
