भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास साधारण नहीं है । इसमें बलिदान के कुछ ऐसे प्रसंग भी हैं जिन्हें पढ़कर आत्मा काँप उठती है । क्राँतिकारी सूर्यसेन और तारकेश्वर दत्त को फाँसी देने से पहले अमानवीय यातनाएँ दी गई, हथौड़े से दाँत तोड़े गये नाखून उखाड़े गये और फाँसी के बाद शव समन्दर में फेक दिये गये ।
जब इनका समूह बड़ा हो गया तब इसका नाम भारतीय रिपब्लिकन सेना रखा गया । रिपब्लिकन सेना ने सशस्त्र अभियान से अंग्रेजों को बाहर करने की योजना बनाई । इसके लिए शस्त्र जुटाने के लिये अंग्रेजों का चटगांव शस्त्रागार लूटा गया । चटगांव में दो शस्त्रागार थे । योजनानुसार 18 अप्रैल 1930 की रात दस बजे 10 बजे कुल 65 क्राँतिकारियों ने दोनों शस्त्रागारों पर धावा बोल दिया । सूर्यसेन ने क्रातिकारियों की तीन टुकड़ियाँ बनाई । पहली टुकड़ी के सोलह क्राँतिकारियों के समूह ने पुलिस शस्त्रागार पर धावा बोला । इसका नेतृत्व गणेश घोष कर रहे थे । तो लोकेन्द्र नाथ के नेतृत्व में दूसरी टुकड़ी ने सेना के शस्त्रागार पर अपना अधिकार कर लिया । जबकि तीसरी सशस्त्र टुकड़ी ने इन दोनों दलों को कवर करके सुरक्षा दी ताकि ये शस्त्र लेकर सुरक्षित निकल सकें। भारतीय रिपब्लिकन सेना के इस अभियान की एक सफलता यह थी कि शस्त्रागार पर धावा बोलने से पहले क्राँतिकारियों ने टेलीफोन, टेलीग्राफ और रेल्वे लाइन आदि संपर्क के सभी सूत्र काट दिये थे लेकिन एक असफलता यह थी कि हथियार तो मिले पर गोला बारूद नहीं मिला जिससे इन हथियारों की उपयोगिता ही न रह गई थी । दूसरी सबसे बड़ी चूक यह रही कि शस्त्रागार में एक गुप्त अलार्म भी था जिसकी जानकारी क्राँतिकारियों को नहीं थी । जब क्राँतिकारी हथियार एकत्र करके गोला बारूद ढूंढ रहे थे तब वहाँ तैनात सुरक्षा कर्मियों ने चुपके से अलार्म बजा दिया । हथियार लूटकर सभी क्रांतिकारी पुलिस शस्त्रागार के बाहर एकत्र हुए जहां सबने इस अभियान के नायक क्राँतिकारी सूर्यसेन को सैन्य सलामी दी और राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया । और यहीं एक अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की घोषणा भी करदी गई। सुबह होते होते सभी क्रांतिकारियों ने चटगांव नगर छोड़ दिया और कुल चार समूहों में विभाजित होकर अलग-अलग दिशाओं में चले गये ।
जिन दिनों सेना और पुलिस काँर्तिकारियों के समूहों को ढूंढकर समाप्त करने के अभियान में लगे थे और रिपब्लिकन आर्मी बिखर रही थी तब "मास्टरदा" सूर्यसेन को अपने अंत का आभास हो गया था । उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र लिखकर अपने अंत का संकेत दे दिया था । पत्र में लिखा था कि "मौत मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रही है। मेरा मन अनन्तकाल की ओर उड़ रहा है ... ऐसे सुखद समय पर,ऐसे गंभीर क्षण में, मैं तुम सब के पास क्या छोड़ जाऊंगा ? केवल एक चीज, यह मेरा सपना है, एक सुनहरा सपना- स्वतंत्र भारत का सपना .... कभी भी 18 अप्रैल, 1930, चटगांव के विद्रोह के दिन को मत भूलना ... अपने दिल के देशभक्तों के नाम को स्वर्णिम अक्षरों में लिखना जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की वेदी पर अपना जीवन बलिदान किया है।" यह पत्र कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है ।
लेखक - रमेश शर्मा
