‘मेरे लिए यह महान हर्ष का विषय होगा कि मेरे रक्त की प्रत्येक बूंद भारत की आजादी के लिए बहे और झाँसी मुक्ति-युद्ध का अजेय दुर्ग बन जाये, ताकि हमारा देश स्वतंत्रता- संग्राम कर सके | मैं भले ही अकेली रहूँ, मुझे साथी मिलें या न मिलें, पर मैं भयंकर युद्ध के लिए तत्पर हूँ और अंतिम समय तक फिरंगियों की दासता स्वीकार नहीं करूँगी | मेरे लिए आज एक ही रास्ता है और वह विद्रोह – आजादी के लिए विद्रोह | आज मेरे सामने एक ही मंजिल है- या तो महान विजय अथवा रणभूमि में मृत्यु | विजय या मौत! मौत या विजय!
भला इस ओजस्वी वाणी से किसका स्वाभिमान न जायेगा ?
