जब बात नर्मदा के भौगोलिक दृश्य व परिचय की जाती है तो नर्मदा भारत की प्रमुख नदियों में से एक है। इसे रेवा भी कहा जाता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप की पाँचवी सबसे लम्बी नदी है। यह गोदावरी तथा कृष्णा नदी के बाद भारत के अंदर बहने वाली तीसरी सबसे लम्बी नदी है। यह मध्यप्रदेश के अनूपपर जिले में विन्ध्याचल और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के संधिस्थल पर स्थित अमरकण्टक के नर्मदा कुंड से निकलती है तथा पश्चिम दिशा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से बहती हुई खम्भात की खाड़ी (अरब सागर) में समा जाती है। नर्मदा नदी की कुल लम्बाई 1312 किलोमीटर है। अकेले मध्यप्रदेश राज्य में ही यह 1077 किलोमीटर में बहती है। नर्मदा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के सामाजिक, आर्थिक,पर्यटन और धार्मिक जीवन को प्रभावित करती है। मध्यप्रदेश के लोकजीवन व उनके मानस में इसका इतना गहरा प्रभाव और योगदान है कि इसे मध्यप्रदेश की जीवनरेखा भी कहा जाता है।
नर्मदा परिक्रमा को 'प्रदक्षिणा करना' भी कहते हैं, जो षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। नर्मदा परिक्रमा या यात्रा एक धार्मिक यात्रा है। जिसने भी नर्मदा या गंगा में से किसी एक की परिक्रमा पूरी कर ली उसने अपने जीवन का सबसे बड़ा काम कर लिया। उसने मृत्यु से पहले वह सब कुछ अनुभव कर लिया, जो वह यात्रा नहीं करके जीवन में कभी नहीं समझ पाता। परंपरागत रूप से परिक्रमा की शुरूआत में नदी, तीर्थ-यात्रियों के दाहिनी ओर होती है। पूरी परिक्रमा के दौरान तीर्थ-यात्रियों को कुछ परंपरागत नियमों का पालन करना होता है। उन्हें यह परिक्रमा प्रकृति उपासक की तरह करनी होती है। परिक्रमावासी मार्ग में आश्रमों और धर्मशालाओं में रहकर थोड़ा विश्राम भी कर सकते हैं। नर्मदा किनारे के लोग तीर्थयात्रियों को भगवान या पवित्र नदी का प्रतिनिधित्व मानते हैं और उन्हें भोजन और रात में रहने के लिए जगह प्रदान करके उनकी अच्छे से देखभाल करते हैं। इस परिक्रमा के दौरान तीर्थ-यात्री नर्मदा के किनारे पर स्थित विभिन्न मंदिरों के दर्शन करते हैं। पदयात्रा का एक नियम यह है कि कोई भी व्यक्ति नदी पार करके दूसरे किनारे या बीच में नहीं जा सकता।
परिक्रमा जितनी नर्मदा नदी के पास से होकर चलती है उतना ही इस नदी के नैसर्गिक सौंदर्य का दर्शन व गहरा अनुभव परिक्रमा करने वाले को होता है। यह नदी “दिन में भले ही नर्मदा हो, रात में यह नदी रेवा है। दिन में वह दृश्य है तो रात में श्रव्य।” नर्मदा को किरात-कन्या कहते है। इसका कभी लयबद्ध बहाव तो कभी पत्थरों को तोड़ती यह नदी परिक्रमावासीयों के लिए किसी स्वर्ग की यात्रा से कम नहीं। यह परिक्रमा सनातन धर्म के सौंदर्य की परिक्रमा है। यह सौंदर्य युगों युगों से माँ नर्मदा की निर्मल जल धारा के साथ बह रहा है। विश्व में सांस्कृतिक विरासत के रूप में ऐसी अन्य कोई नदी यात्रा नहीं है जो कि नर्मदा परिक्रमा के नाम से प्रसिद्ध है।
लेखक - भूपेन्द्र भारतीय
