अपने जन्मस्थान अयोध्या में रामलला के विराजमान होने की उमंग पूरे संसार में है । मुस्लिम समाज के अनेक प्रतिनिधि समारोह में उपस्थित थे, उनकी टिप्पणियाँ भी सकारात्मक आईं। लेकिन उमंग से भरी इन समरस अनुभूतियों के वातावरण को बिगाड़ने का षड्यंत्र शुरु हो गया है। हल्दवानी की घटना के बाद न केवल सोशल मीडिया पर भड़काऊ सामग्री बढ़ रही है वहीं बरेली के तौफीक रजा, बंगाल के मंत्री सिद्दीकुल्लाह और आई एम आई एम के नेता उबेसुद्दीन ओबैसी के खुलकर ब्यान आये । अब पूरे देश को उमंग के साथ सावधान रहने की आवश्यकता है ।
रामलला अपने जन्मस्थान अयोध्या में विराजमान हो गये हैं । वह अवसर साधारण नहीं था । सैकड़ों वर्षों के संघर्ष और लाखों प्राणों के बलिदान के बाद यह संभव हो पाया है । इतिहास का संघर्ष चाहे जैसा रहा हो पर पिछले काफी वर्षों से भारतीय मुस्लिम समाज में एक बड़ा वर्ग अयोध्या के सत्य को स्वीकार करने लगा था कि अयोध्या में जिस स्थान पर बाबरी मस्जिद थी वहाँ पहले भव्य और विशाल मंदिर रहा है । मुस्लिम समाज के कुछ प्रबुद्ध जनों ने सार्वजनिक तौर पर भी इस बात को रखा । इससे देश में एक सकारात्मक वातावरण और समन्वय का भाव बढ़ा। यह ठीक है कि मुस्लिम समाज में कुछ कट्टरपंथी समन्वय के बजाय आक्रामक शैली से समाज अपनी ओर आकर्षित करने की राजनीति करते रहे । फिर भी अयोध्या निवासी अधिकांश मुस्लिम समाड इस मुद्दे से जुड़ा और उनमें एक समन्वय का भाव सदैव बना रहा । इतिहास के पन्नों में ऐसे सकारात्मक भाव की झलक 1857 की क्रांति और बाद में चले मुकदमें के दौरान भी देखने को मिलती है । 1857 की क्रांति के समय महंत बाबा रामचरणदास और मौलवी अमीरअली के बीच सहमति बन गई थी । और मौलवी अमीरअली यह स्थान जन्मस्थान मंदिर केलिये देने को तैयार हो गये थे । इस समझौते पर बादशाह बहादुरशाह जफर की सहमति भी हो गई थी । किन्तु क्रांति असफल हुई और 18 मार्च 1858 को बाबा रामचरणदास एवं मौलवी अमीरअली दोनों को अयोध्या में कुबेर के टीला पर फाँसी दे गई थी । कुबेर के टीला पर इन दोनों बलिदानियों का स्मारक बना है । इनके बलिदान के बाद यह समस्या यथावत रह गई।
समरसता, समन्वय और सद्भाव पुरातात्विक अनुसंधान अथवा न्यायालय के निर्णय तक ही सीमित न रहा । अनुसंधान के सर्व सम्मत निष्कर्ष और अदालत के सर्व सम्मत निर्णय से ही यह वातावरण बना कि मंदिर निर्माण के कार्य में भी सभी धर्मों के लोग शामिल हुये । इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम कारीगर भी दिन रात एक करके कार्य कर रहे हैं। । जिन मुस्लिमों कारीगरों की टोली पत्थर साफ करने काम में लगी उनका नेतृत्व अनीश खान और मोहम्मद अफजल कर रहे हैं। पत्थर तराशने और पत्थरों की सफाई का काम आरंभ करने से पहले रामजी का पूजन हुआ और जयघोष भी हुआ। जो नारे लगाये उनमें "राम के सम्मान में हिंदू-मुस्लिम साथ हैं, "एकता का राज चलेगा हिंदू मुस्लिम साथ चलेगा'।
अयोध्या में अपने जन्मस्थान पर विराजमान होने का यह उल्लास, स्नेह और सद्भाव के वातावरण पूरे भारत ही नहीं पूरे विश्व में दिखाई दिया । लेकिन अब इस सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिश हो रही है । मुस्लिम समाज को उत्तेजित कर एकजुट करने की कोशिश की जा रही है । इसकी शुरुआत पाकिस्तान से हुई थी । अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा आयोजन के समय वहाँ की सरकार और उनके कुछ नेताओं की टिप्पणियाँ भड़काऊ और भारत के मुस्लिम समाज को उकसाने वालीं थीं । पर भारत का सद्भाव यथावत रहा। लेकिन अब हल्वानी की घटना मानों चिनगारी का काम कर रही है । जिस प्रकार हल्दवानी में घटना घटी उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता । हल्दवानी में शासकीय भूमि पर अतिक्रमण हटाने टीम पहुँची तो पूरी तैयारी और योजना से पुलिस को घेरकर हमला किया गया । महिला पुलिस कर्मी तक घायल हैं। इसके अगले दिन बरेली में तौफीक रजा का एक भड़काऊ ब्यान आया । उनकी अपील पर सैकड़ो मुसलमानों ने प्रदर्शन किया । एक मुहल्ले में पथराव भी हुआ । इसी दिन बंगाल सरकार में मंत्री सिद्दीकुल्लाह ने भी लोगों को इकट्ठा करके भड़काऊ भाषण दिया । दो दिन बाद सांसद ओबेसुद्दीन औबेसी ने संसद में भड़काऊ भाषण दिया और बाबरी मस्जिद जिंदाबाद का नारा भी लगाया ।
लेखक - रमेश शर्मा
