11 मार्च 1944 - आँदोलन कारियों पर गोली चलाने वाले अंग्रेज अधिकारी को जिन्दा जलाया था सेनानी जुब्बा साहनी | The Voice TV

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11 मार्च 1944 - आँदोलन कारियों पर गोली चलाने वाले अंग्रेज अधिकारी को जिन्दा जलाया था सेनानी जुब्बा साहनी

Date : 11-Mar-2024

भारतीय स्वतंत्रता कहने के लिये भले अहिसंक आँदोलन से मिली । पर यदि क्राँतिकारी आँदोलन की बात छोड़दी जाय तब भी इस अहिसंक आँदोलन में भी सैकड़ों बलिदान हुये । ऐसे ही बलिदानी जुब्बा साहनी हैं जिन्होंने उस अंग्रेज थानेदार की बंदूक छीनकर जिन्दा जला दिया था जो आँदोलन कारियों पर गोली चला रहा था । 

यह बलिदान 1942 के "अंग्रेजो भारत छोड़ो आँदोलन" में हुआ था । बलिदानी जुब्बा साहनी का जन्म 1906 में बिहार के मुजफ्फरपुर नगर के अंतर्गत ग्राम चैनपुर के अत्यंत निर्धन परिवार में  हुआ था। पिता लालजी सहनी मल्लाह थे । उनकी आजीविका का साधन नाव चलाना था । जुब्बा सहनी तीन भाइयों में मझले । बड़े भाई  शिवनन्दन साहनी और छोटे भाई सुब्बा साहनी भी पिता की सहायता करते थे । जुब्बा साहनी अविवाहित थे जबकि उनके दोनों भाइयों की शादी हो चुकी थी । पूरे देश में स्वाधीनता आँदोलन की लहर उठी । जो ग्राम मीनापुर तक भी पहुँची। 1942 के अंग्रेजों भारत छोडो आंदोलन में भाग लेने के लिये पूरा मीनापुर गाँव एकजूट हो गया । इसका कारण पटना नगर का गोलीकांड था । पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के प्रयास में आँदोलन कारियों और पुलिस में जद्दोजहद हुई । पुलिस ने गोली चालन कर दिया । यह घटना 11 अगस्त 1942 की है । पटना सचिवालय पर हुये इस गोलीकांड में सात आँदोलन कारियों का बलिदान हुआ । इस घटना की तीखी प्रतिक्रिया हुई । आसपास के पूरे क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन आरंभ हुआ । मीनापुर में भी युवाओं प्रदर्शन किया और थाने पर ने तिरंगा फहराने का संकल्प किया । इसकी सूचना पुलिस को मिली तो 15  अगस्त 1942  को सीतामढ़ी से अंग्रेजी फौज मीनापुर रवाना हुई । क्रांतिकारियों ने गांव के किनारे मार्ग पर धरना दे दिया । अंग्रेजी फौज ने लोगों को हटाने के लिये गोली चालन कर दिया । इस गोली चालन में पाँच आँदोलनकारी बलिदान हुये । इस घटना से पूरे इलाके में गुस्सा बढ़ा और आँदोलन कारियों ने मीनापुर थाने पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया । निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 16 अगस्त 1942 को आँदोलनकारी  मीनापुर थाना पहुँचे । थाने का प्रभारी वायलर नामक अंग्रेज था। बड़ी संख्या में आँदोलनकारी थाने पर पहुंचे । नारेबाजी शुरू हुई । कुछ युवा आगे बढ़े वे थाने पर तिरंगा फहराना चाहते थे । थानेदार वायलर ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। इस गोलीबारी में युवा जगन्नाथ सिंह और बांगुर साहनी का बलिदान हुआ । तब युवा जुब्बा साहनी ने युवाओं से आव्हान किया और भीड़ थानेदार पर टूट पड़ी । थानेदार वायलर और सिपाही गुगली सिंह की बंदूक छीन ली । जुब्बा साहनी ने आगे बढ़कर वायलर को पकड़ लिया । पहले पिटाई की और फिर घासलेट डालकर जलाकर मार डाला ।  और थाने पर तिरंगा फहराया दिया गया। घटना के बाद सभी ग्रामवासी जंगल की ओर चले गये । सेना की अतिरिक्त टुकड़ी आई । सेना ने गांव के सारे घर जलाकर राख कर दिये । बाद में  जुब्बा साहनी मुजफ्फरपुर में गिरफ्तार कर लिए गये। उन्हें भागलपुर जेल में रखा गया । और जेल में ही सुनवाई शुरु हुई । क्रूरतम यातनाएँ देकर अन्य नाम पूछे गये । पर उन्होने किसी का नाम न लिया और सारा आरोप स्वीकार किया । अंत में 11 मार्च 1944 को उन्हें भागलपुर जेल में ही फाँसी दे दी गई। 
 
लेखक - रमेश शर्मा 

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