नई दिल्ली, 17 अप्रैल । अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने एआईसीटीई- वाइब्रेंट एडवोकेसी फॉर एडवांसमेंट एंड नर्चरिंग ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज (वाणी) योजना के तीसरे संस्करण का शुक्रवार को शुभारंभ किया।
इस योजना का उद्घाटन दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के कुलपति और एआईसीटीई के अध्यक्ष प्रो. योगेश सिंह ने एआईसीटीई के मुख्यालय में किया। उन्होंने योजना दस्तावेज और आवेदन के लिए एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल भी जारी किया।
इस अवसर पर प्रो. सिंह ने कहा कि इस योजना का उद्देश्य क्षेत्रीय भाषाओं में सशक्त और समावेशी ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है जिससे विद्यार्थी और शोधकर्ता अपनी मातृभाषा में नवीनतम तकनीकी प्रगति तक पहुंच सकें। यह पहल भारतीय भाषाओं में शोध पत्रों के प्रकाशन को प्रोत्साहित करेगी तथा अकादमिक एवं उद्योग जगत के बीच सहयोग को मजबूत बनाएगी, जिससे तकनीकी ज्ञान का व्यापक प्रसार संभव होगा।
कुलपति ने कहा कि अनेक छात्र अपनी स्कूली शिक्षा मातृभाषा में पूर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा में अंग्रेजी माध्यम के कारण कठिनाइयों का सामना करते हैं, जबकि अपनी भाषा में पढ़ाए जाने पर वे बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
एआईसीटीई की सदस्य सचिव प्रो. श्यामा रथ ने कहा कि यह योजना देशभर के विद्यार्थियों के लिए तकनीकी शिक्षा को अधिक सुलभ और सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। विद्यार्थियों की मातृभाषा में अध्ययन सामग्री की उपलब्धता और अनुकूल शैक्षणिक वातावरण का निर्माण उनके समग्र विकास और राष्ट्र की प्रगति में सहायक होगा। इस योजना के अंतर्गत प्रतिवर्ष चार करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी, जिसके माध्यम से 200 सम्मेलनों, सेमिनारों और कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा। प्रत्येक चयनित संस्थान को दो लाख रुपये की सहायता दी जाएगी। ये कार्यक्रम दो से तीन दिनों की अवधि के होंगे और हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, उर्दू सहित 22 क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित किए जाएंगे।
प्रो. रथ ने कहा कि योजना में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) एवं डाटा साइंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, हाइड्रोजन ऊर्जा, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष एवं रक्षा तथा एग्रोटेक जैसे उभरते क्षेत्रों सहित 16 प्रमुख विषय शामिल हैं।
एआईसीटीई द्वारा अनुमोदित संस्थान एआईसीटीई-अटल पोर्टल के माध्यम से 18 अप्रैल से 17 मई तक आवेदन कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि योजना की शुरुआत से अब तक 200 से अधिक शोध पत्र भारतीय भाषाओं में प्रकाशित किए जा चुके हैं। इस पहल ने ज्ञान आधार को मजबूत करने, सामग्री सृजन को बढ़ावा देने तथा संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
