रथ यात्रा 2026: भगवान जगन्नाथ की दिव्य यात्रा का महत्व | The Voice TV

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रथ यात्रा 2026: भगवान जगन्नाथ की दिव्य यात्रा का महत्व

Date : 09-Apr-2026

जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के प्रमुख और अत्यंत विशेष त्योहारों में से एक है। इसे रथ यात्रा या श्री गुंडीचा यात्रा भी कहा जाता है, जिसे विशेष रूप से उड़ीसा के पुरी में बड़े धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भगवान विष्णु के अवतार जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को समर्पित है। यह विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

इस पवित्र पर्व में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य रूप से सजे रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर, यानी गुंडीचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होकर रथ को जगन्नाथ मंदिर से गुंडीचा मंदिर तक खींचते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति रथ यात्रा में भाग लेता है, उसके जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि जो भक्त भगवान जगन्नाथ का नाम जपते हुए गुंडीचा मंदिर तक जाता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। पंचांग के अनुसार, यह यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है।

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 कब है
साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा गुरुवार, 16 जुलाई को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, द्वितीया तिथि 15 जुलाई को सुबह 11:50 बजे से शुरू होकर 16 जुलाई को सुबह 08:52 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर 16 जुलाई को ही पर्व मनाया जाएगा।

जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व
इस पर्व की शुरुआत को लेकर विभिन्न मान्यताएं प्रचलित हैं, लेकिन माना जाता है कि इसका आयोजन 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच शुरू हुआ। यह त्योहार सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक है, क्योंकि इसमें सभी वर्गों के लोग मिलकर भाग लेते हैं और उत्सव मनाते हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा की प्रमुख परंपराएं

  • छेरा पहरा रस्म: रथ यात्रा शुरू होने से पहले उड़ीसा के गजपति महाराज सोने के झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा विनम्रता और सेवा का प्रतीक मानी जाती है।
  • तीन भव्य रथों का निर्माण: इस यात्रा में तीन अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं—
    • भगवान जगन्नाथ का रथ “नंदीघोष”, जो 16 पहियों वाला सबसे बड़ा रथ होता है।
    • भगवान बलभद्र का रथ “तालध्वज”, जिसमें 14 पहिए होते हैं।
    • देवी सुभद्रा का रथ “दर्पदलन”, जिसमें 12 पहिए होते हैं।
  • नौ दिन तक चलने वाला उत्सव: यह उत्सव केवल एक दिन का नहीं होता, बल्कि लगभग नौ दिनों तक चलता है। भगवान जगन्नाथ गुंडीचा मंदिर में विश्राम करते हैं और फिर ‘बहुदा यात्रा’ के दौरान वापस अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं। इस दौरान भजन-कीर्तन, पूजा और विशाल मेले का आयोजन होता है।

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