गांधी जी के कई गुमनाम प्रयासों को याद दिलाता है 'बापू स्टूडियो' : रामबहादुर राय | The Voice TV

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गांधी जी के कई गुमनाम प्रयासों को याद दिलाता है 'बापू स्टूडियो' : रामबहादुर राय

Date : 09-May-2023

 नई दिल्ली, 09 मई राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की स्मृति में हाल ही में आकाशवाणी दिल्ली के एक स्टूडियो का नाम ‘बापू स्टूडियो' रखा गया है। यह नामकरण खास महत्व रखता है, क्योंकि गांधी जी पहली एवं अंतिम बार 12 नवंबर, 1947 को आकाशवाणी आए थे, तब इसी स्टूडियो से उन्होंने भारत विभाजन की विभीषिका झेल रहे पाकिस्तान के उन शरणार्थियों को संबोधित किया था, जो हरियाणा के कुरुक्षेत्र में ठहरे हुए थे।

इससे जुड़ी कुछ अनसुनी बातों और उस समय की चुनौतियों को वरिष्ठ पत्रकार एवं हिन्दुस्थान समाचार के समूह संपादक रामबहादुर राय ने आकाशवाणी के एफएम गोल्ड पर प्रसारित 'आज के मेहमान' कार्यक्रम में साझा किया। यह समूची बातचीत बापू स्टूडियो में ही रिकॉर्ड की गयी। यह भी उल्लेखनीय है कि इस स्टूडियो के 'बापू स्टूडियो' नामकरण के बाद की गई यह पहली रिकॉर्डिंग है।

रामबहादुर राय ने कहा कि महात्मा गांधी जिन परिस्थितियों में यहां आए, वह बड़ी भीषण थी, दुखदायी थी और बापू कई मोर्चे पर काम कर रहे थे। विभाजन ने ऐसी त्रासदी पैदा कर दी थी, जो राजनीतिक के साथ ही सामाजिक और आर्थिक भी थी। उस समय उनका यहां आना और कुरुक्षेत्र में रह रहे शरणार्थियों को देखकर ऐसा लगता है कि वह बहुत मर्मांतक समय था, जिसमें लोग उजड़ कर आ रहे हैं और उनको जीवन की कोई सुरक्षा नहीं है। ऐसे समय में बापू का संदेश उनके लिए बहुत बड़ा आश्वासन था। इस बात का आश्वासन था कि आप अभी शरणार्थी जरूर हैं लेकिन आप लोग जल्दी ही बसाए जाएंगे। शायद यह गांधी जी के ही संदेश का परिणाम रहा होगा, जब बाद में उन शरणार्थियों को फरीदाबाद और अन्य स्थानों पर बसाया गया। इस मायने में 12 नवंबर एक यादगार दिन है। बापू के तमाम प्रयासों में यह बात गुम सी हो गई है, जिसे बापू स्टूडियो याद दिलाता है।

आकाशवाणी के प्रसारण भवन के स्टूडियो ब्लॉक स्थित स्टूडियो 03 में गांधी जी आए थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात के 100वें एपिसोड के उपलक्ष्य में 30 अप्रैल को इस स्टूडियो का ‘बापू स्टूडियो’ नाम से उद्घाटन किया गया।

प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात से जुड़े सवाल पर रामबहादुर राय ने कहा कि मन की बात जब शुरू हुई थी तो मेरे सामने एक प्रश्न था कि प्रधानमंत्री ने रेडियो माध्यम ही क्यों चुना? यह मन की बात कब तक चलेगी? लेकिन जब इसका 100 एपिसोड पूरा हुआ तो यह बात सामने आई कि वह लोगों से जुड़ना चाहते थे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का एक विलक्षण स्वरूप है, जो दूसरे प्रधानमंत्रियों से उन्हें भिन्न और श्रेष्ठ बनाता है। दूसरे लोग भी जनता से जुड़े रहने की कोशिश करते थे, जुड़ते भी थे लेकिन कोई प्रधानमंत्री एक समाज की शक्ति को जगाएगा, प्रेरित करेगा और अच्छे कामों के लिए किसी को प्रोत्साहित करेगा, यह काम पहले नहीं हुआ था। मन की बात कार्यक्रम सांस्कृतिक एवं सामाजिक जागरण का स्वरूप है। इससे एक नई चेतना पैदा होती है कि हम अपने बलबूते भी कुछ कर सकते हैं। हर काम सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। अब 100वें पड़ाव पर पहुंचकर मन की बात एक जनांदोलन बन गया है।

उल्लेखनीय है कि गांधी जी 76 वर्ष पहले विभाजन के बाद भारत आए लेकिन करीब 2.5 लाख शरणार्थियों से मिलने हरियाणा के कुरुक्षेत्र नहीं पहुंच सके। तब उन्होंने आकाशवाणी के जरिए अपना संदेश पहुंचाने का निर्णय लिया। 12 नवंबर, 1947 को गांधी जी ने आकाशवाणी के दिल्ली केन्द्र से पहली और अंतिम बार लोगों को संबोधित किया था। वर्ष 1947 में गांधी जी के आकाशवाणी दिल्ली आगमन की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 12 नवंबर को लोक प्रसारण दिवस मनाया जाता है।


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