जब वो उठ खड़ी होती है,
आसमां को झुका देती है।
नारी शक्ति की पहचान बनकर,
वो हर मुश्किल को सुलझा देती है।
महिला सशक्तिकरण एक महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों, अवसरों और संसाधनों तक समान पहुंच प्रदान करना है। यह न केवल महिला के व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि पूरे समाज की प्रगति और समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण है। महिला सशक्तिकरण का मतलब केवल महिलाओं को अधिकार देना नहीं, बल्कि उनके विचार, आवाज़, और निर्णय लेने की शक्ति को मान्यता देना भी है।
महिला की भूमिका समाज के हर क्षेत्र में होती है, चाहे वह घर की चार दीवारों के भीतर हो या बाहर। वह माँ, बहन, बेटी और पत्नी के रूप में जीवन की नींव रखती है। उसकी शिक्षा, उसकी ताकत और उसकी आत्मनिर्भरता राज्य के विकास की कुंजी बन सकती है। महिला जब सशक्त होती है, तो उसका प्रभाव न केवल उसके परिवार पर पड़ता है, बल्कि वह समाज के हर पहलू को प्रभावित करती है।
वही महिलाओं का समाज में योगदान अनमोल है, और उनका सशक्तिकरण किसी भी राज्य या राष्ट्र के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम जानते हैं कि जब महिला को समान अवसर और अधिकार मिलते हैं, तो वह न केवल अपने परिवार को बल्कि पूरे समाज और राज्य को प्रगति की दिशा में अग्रसर कर सकती है।
यदि किसी परिवार या देश या आपके राज्य का मुकिया आपके साथ खड़े रहे महिलाओ को ध्यान में रखते हुए उनके अनुरूप नीतियाँ और योजनाएँ न केवल महिलाओं लाए तोह समाज के हर महिला के लिए सहायक होता हैं।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने वन विभाग को महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए विशेष निर्देश दिए हैं। उन्होंने वन विभाग की विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार के सभी संभव प्रयास करने कहा है। वन उत्पादों से जुड़े कार्यों एवम अन्य आजीविका मूलक कार्यों में महिलाओं की अधिक से अधिक सहभागिता को प्रोत्साहित करने उन्हें प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान करने के निर्देश दिए हैं जिसके बेहद ही सुखद परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
छत्तीसगढ़ वन विभाग संयुक्त वन प्रबंधन के तहत वनांचल में रहने वाले ग्रामीणों को वन संरक्षण और प्रबंधन में सक्रिय रूप से शामिल कर आर्थिक सशक्तिकरण के मार्ग प्रशस्त करता है। संयुक्त वन प्रबंधन समितियां स्थानीय ग्रामीणों से मिलकर बनती हैं जो वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं एवं वन संसाधनों के साझा उपयोग की अवधारणा से प्रेरित हैं। वन विभाग इन समितियों को प्रशिक्षण प्रदान करता है, जिससे वन पर निर्भर लोगो की आजीविका में सुधार हो सके।
छत्तीसगढ़ के मरवाही वन मंडल में बसे छोटे से गांव मड़ई की 11 महिलाओं का मां महामाया स्वसहायता समूह ने यह साबित कर दिया है कि दृढ़ संकल्प और सही मार्गदर्शन से अपनी आय के स्त्रोतों में वृद्धि कर जीवन स्तर को ऊँचा किया जा सकता है।
वन विभाग के सहयोग से इस समूह ने एक साधारण कृषि-वनीकरण की पहल को एक फलते-फूलते आर्थिक उद्यम में बदल दिया है। वन विभाग के मार्गदर्शन से एवं अपनी उद्यमिता से इस समूह की महिलाओं ने अब तक सात लाख रूपये से ज्यादा की आय अर्जित कर ली है। उनकी यह यात्रा न केवल आर्थिक समृद्धि की है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक सशक्तिकरण का भी प्रतीक है।
इस यात्रा की शुरुआत वित्तीय वर्ष 2018-19 में माँ महामाया स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष मीरा बाई और सचिव सुमित्रा तथा समिति की सदस्यों केवल्या, बुधकुंवर, रमेशिया, मनीषा, सेमकुंवर, मैकिन, लौंग कुंवर, सुखंता, और सुक्षेन ने साथ मिलकर, पथर्रा (रुमगा) राजस्व क्षेत्र की 5 हेक्टेयर भूमि में 2,000 आम के पेड़ लगाए। इन महिलाओं ने दशहरी, लंगड़ा, आम्रपाली, चौसा, बॉम्बे ग्रीन जैसी लोकप्रिय किस्मों के साथ-साथ स्थानीय किस्मों के भी आम के पेड़ लगाए। ग्रीन इंडिया मिशन के तहत कृषि वानिकी को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया यह कदम केवल एक वृक्षारोपण अभियान नहीं था बल्कि हरित आवरण को बढ़ाने, मृदा नमी संरक्षण में सुधार करने, और स्थानीय समुदाय के लिए स्थायी रोजगार के अवसर प्रदान करने की एक सुनियोजित रणनीति थी।

समूह की दीदियों ने बताया कि शुरुआती वर्षों में संघर्ष और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहले वर्ष में आम के पौधों की देखभाल के लिए उन्हें जमीन की गहरी जुताई करनी पड़ी। जिससे पौधों की जड़ें मजबूत हों और मिट्टी में नमी बनी रहे। इस दौरान उन्होंने सब्जियों की खेती नहीं की, क्योंकि नए आम के पौधों के लिए और भी देखभाल की जरूरत थी। हालांकि कोई मुनाफा नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 2019-20 में, जब आम के पेड़ थोड़े बड़े हुए, तो उन्होंने अंतरवर्ती स्थानों में सब्जियां उगानी शुरू कीं। बीन्स, टमाटर, पत्तागोभी, फूलगोभी, मटर, मिर्च, भिंडी, प्याज, सूरन, अदरक, हल्दी, लौकी, करेला, और कद्दू जैसी सब्जियों की खेती से होने वाली आय का उपयोग उन्होंने समूह की जरूरतों को पूरा करने और अगले मौसम के लिए बीज और खाद खरीदने में किया।
वर्ष 2020-21 और 2021-22 के वर्षों में समूह ने आम के पेड़ों की देखभाल के साथ-साथ सब्जियों की खेती का विस्तार किया। उन्होंने अपने बगीचे में विविध प्रकार की सब्जियां उगाईं और उनकी बिक्री से आय अर्जित की। इस दौरान उन्होंने आम के पौधों से फूल हटाने का कठिन निर्णय लिया ताकि पेड़ों की वृद्धि बेहतर तरीके से हो सके और भविष्य में अच्छी फसल मिल सके। वर्ष 2022-23 में समूह की मेहनत रंग लाई। आम के पेड़ पूर्ण रूप से विकसित हो गए और अच्छी फसल दी। उन्होंने 4,203 किलो आम को स्थानीय और बिलासपुर बाजारों में बेचा, जिससे उन्हें इस पहल की शुरुआत से अब तक 7 लाख रुपये से ज्यादा का मुनाफा हुआ। यह आर्थिक लाभ उनकी मेहनत, धैर्य और योजना का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
वर्त्तमान में भी मां महामाया स्वसहायता समूह ने 98 प्रतिशत जीवित पेड़ों की दर के साथ अपनी सफलता को बनाए रखा है। उनकी यह पहल न केवल स्थानीय रोजगार और आर्थिक लाभ को बढ़ावा दे रही है, बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता और महिला सशक्तिकरण का भी प्रतीक है। ग्रीन इंडिया मिशन के तहत, इस समूह की पहल गुड प्रैक्टिस का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पहल ने यह सिद्ध किया है कि सही मार्गदर्शन और सामुदायिक सहयोग से कैसे ग्रामीण महिलाएं न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

अपने वर्तमान कृषिवानिकी की उद्यमिता की सफलता से प्रेरित होकर यह स्व-सहायता की दीदियां सब्जियों और आमों के परिवहन के लिए ई-रिक्शा खरीदने पर विचार कर रही हैं। इसके अतिरिक्त भविष्य में वे आम के स्वाद में विशेषीकृत एक लघु आइसक्रीम निर्माण की इकाई स्थापित करने की योजना बना रही हैं, जिससे उनकी आय में और वृद्धि हो सके।
मां महामाया स्वसहायता समूह की अध्यक्ष मीरा बाई ने कहा कि हम वन विभाग के निरंतर सहयोग के लिए आभारी हैं। उनकी मदद से हम न सिर्फ उच्च गुणवत्ता के आमों की सफलतापूर्वक खेती कर रहे हैं, बल्कि अंतरवर्ती रिक्त स्थानों में सब्जियों की भी खेती कर रहे हैं। इससे हमारी आय में बढ़ोतरी हुई है और हमारे समूह की महिलाएं सशक्त हुई हैं। साथ ही इस पहल ने आसपास के गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। हमारे जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
मां महामाया स्वसहायता समूह की सफलता की यह कहानी न केवल आर्थिक उन्नति की मिसाल है, बल्कि एक स्थायी और समृद्ध भविष्य की दिशा में भी एक प्रेरक कदम है। यह कदम न केवल महिलाओं की स्थिति को सुधारता है, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देता है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए गए प्रयासों से हम एक समान और समृद्ध समाज की ओर बढ़ सकते हैं।
रायपुर, 28 अक्टूबर 2024 | महतारी वंदन योजना की राशि से होता है जरूरी काम
प्रदेश में लागू की गई महतारी वंदन योजना से अनेक माताओं-बहनों को अब छोटी-मोटी जरूरतों के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं आती। विकासखण्ड कोरबा अंतर्गत ग्राम खेतार की लगभग 70 वर्षीय वृद्धा आशो बाई को कुछ माह पहले तक अपनी छोटी-छोटी जरूरतों की पूर्ति के लिए कुछ लोगों से पैसे मांगने की आवश्यकता पड़ती थी। कई बार कुछ रूपए के लिए उन्हें लंबा इंतजार भी करना पड़ता था। अब जबकि महतारी वंदन योजना से हर महीने खाते में 01 हजार रूपए समय पर मिल जाते हैं। ग्राम खेतार की वृद्धा आशो बाई ने बताया कि उम्र के साथ ही उन्हें कुछ भी काम करने में परेशानी है वह किसी तरह छोटे-मोटे घरेलू काम कर लेती है। घर के आसपास अपने बकरियों को चरा लेती है। उन्होंने बताया कि विगत माह महतारी वंदन योजना से प्राप्त राशि का आहरण किया है। इस राशि का उपयोग अपने घर के लिए जरूरी सामग्री खरीदने, उपचार और बीमारी के दौरान दवा, फल आदि में किया है।
ग्राम बेला की शुकवारो बाई ने बताया कि हर महीने महतारी वंदन योजना के राशि का इंतजार रहता है। राशि समय पर खाते में आते ही उन्हें बहुत राहत मिलती है। यह राशि हमारे बड़े काम की होती है। वृद्धा आशो बाई को किसी के आगे रूपए के लिए हाथ फैलाने जैसी नौबत नहीं आती है। उन्होंने बताया कि महतारी वंदन योजना को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा लागू किए जाने के बाद हम जैसी वृद्ध महिलाओं के लिए यह वरदान साबित हो रही है। हर महीने खाते में एक हजार की राशि प्राप्त हो जाती है, इससे छोटी-मोटी जरूरतें हम पूरी कर लेते हैं। उन्होंने महतारी वंदन योजना लागू किए जाने से ग्रामीण क्षेत्र की गरीब और जरूरतमंद महिलाओं को बहुत लाभ पहुंचने की बात कही और इस योजना के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय सरकार के प्रति आभार भी प्रकट किया।
महाराष्ट्र अगले महीने विधानसभा चुनाव का सामना करने वाला है। उत्तर भारतीय विकास सेना के नेता सुनील शुक्ला पश्चिम बांद्रा निर्वाचन क्षेत्र से कुख्यात गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई की तरफ से नामांकन दाखिल करना चाहते हैं। यह निर्वाचन क्षेत्र राकांपा के दिवंगत नेता बाबा सिद्दीकी का रहा है। समझ यह नहीं आता कि इस तरह की बातों से ऐसे लोग क्या साबित करना चाहते हैं। गैंगवार को लेकर देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है जिसको लेकर हर कोई चाहता है कि देश में अमन-चैन बना रहे लेकिन सुनील शुक्ला जैसे लोग ऐसी बातें करके युवाओं के भविष्य को गलत हवा दे रहे हैं। बाबा सिद्दीकी की हत्या के बाद से कुछ लोग लारेंस बिश्नोई की सोशल मीडिया पर प्रशंसा कर रहे हैं और उसे कई तरह की उपाधियों से नवाजा जा रहा है। सबसे बडा दुर्भाग्य यह है कि युवा, लारेंस को अपना आदर्श मान रहे हैं। लेकिन यह लोग इतनी सी बात नहीं समझ रहे कि मौत का खेल दूर से देखने में ही मजा आता है, खुद खेलने में जिंदगी में आग लग जाती है।
भारतीय राजनीति में कड़े नियम-कानून-कायदे न होने की वजह से इस तरह की तमाम तरह की आजादी है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अपराधी भी चुनाव लड़ सकता है और आश्चर्य की बात वह आरोपी भी है और जेल में हैं तब भी चुनाव लड़ सकता है। इससे एक बात तो तय है कि जिस तरह हमारे यहां छूट है उसी का ऐसे लोग बेजा फायदा उठाते हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसे प्रावधान में बदलाव क्यों नहीं हो सकता। क्या इस तरह की संचालन प्रक्रिया आने वाले मौजूदा व आने वाले समय में युवाओं को नकारात्मकता की ओर नहीं ले जाएगी? चुनाव लड़ना देश की सेवा के लिए प्रेरित करने के लिए होना चाहिए या शक्ति प्रदर्शन दिखाने के लिए ? आजकल लोगों की सोच तो शक्ति प्रदर्शन दिखाने की ओर इशारा कर रही है।
हमें ऐसी सोच पर नियंत्रण पाना होगा, क्योंकि ऐसे लोगों के लिए चुनाव लड़ने का मतलब केवल सत्ता पर काबिज होना ही होता है। यदि लारेंस बिश्नोई जैसे गैंगस्टर चुनाव लड़ते हैं तो इस बात का क्या अर्थ निकाला जाए। मतलब जिससे देश असुरक्षित महसूस कर रहा है और सुनील जैसे लोग उनके हाथ में जनता की सुरक्षा देने चाहते हैं। जो पार्टी या नेता गलत व सही के बीच फर्क नहीं समझ सकती उसका पंजीकरण रद्द होना चाहिए। जब उनके मंसूबे इस तरह के हैं तो उनसे सकारात्मक राष्ट्र के निर्माण की उम्मीद करना बेमानी होगा। गुणवत्ता पर बात हो, मुद्दों पर बात हो, तथ्यात्मक घटनाओं पर बात हो, हमें इस तरह की पार्टी व नेता की जरूरत है।
हम पहले से ही बाहरी दुश्मनों से परेशान हैं और यदि अपने देश की आंतरिक व्यवस्था भी आतंकवाद से घिर जाएगी तो चुनौती बड़ी हो सकती है। जम्मू- कश्मीर में बीते मात्र 15 दिनों में 19 लोगों की जाने जा चुकी है। इस समय केन्द्र व राज्य सरकार का सारा ध्यान आतंकवाद पर केन्द्रित है। इसके अलावा दिल्ली में गैंगस्टर के नाम से कुछ लोग दहशत फैला रहे हैं। बहुत सारे तो ऐसे लोग हैं जिनका गैंगस्टर से किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं है और वह उनके नाम पर उगाही तक भी कर रहे हैं। निश्चित तौर पर व्यापारी वर्ग सहमा हुआ रहता है।
उदाहरण के तौर यदि दिल्ली के परिवेश की बात करें तो दिल्ली में नीरज बावनिया के नाम पर बहुत सारे लोगों ने गैंग बना लिया है और उसके नाम से ही बदमाशी करते हैं व दिल्ली के व्यापारी वर्ग से रंगदारी मांगते हैं। जबकि इस पर नीरज बवाना ने खुद यह कहा था कि मैं या मेरा कोई भी सदस्य व्यापारियों से रंगदारी नहीं लेता। अब लॉरेंस बिश्नोई के नाम पर ऐसा हो रहा है और निश्चित तौर पर उसको यह नहीं पता होगा कि उसके नाम का कौन-कौन प्रयोग कर रहा है। हमें इस ट्रैक पर चल रहे युवाओं को समझाना होगा कि किसी भी गैंगस्टर या बदमाश के जीवन का कोई अर्थ नहीं होता। वो चाहे कितना भी पैसा और नाम बना ले लेकिन वह अपनी जिंदगी नहीं जी सकता। वह सारी जिंदगी जेल में ही रहता है। युवाओं को यह नहीं मालूम की इस राह में कितने कांटे है और न तो ऐसे लोगों का कोई जीवन होता और न ही घरवाले कभी सुरक्षित रह पाते।
यदि किसी को कॉपी करना है तो ऐसे लोगों को कॉपी करें, जिससे आपका भविष्य बने। अपनी जिंदगी की कीमत समझें चूंकि यह मानव जीवन आसानी से नहीं मिलता। इसका हर पल व क्षण अपने भविष्य बनाने व परिवार का भविष्य संवारने में लगाएं। गैंगस्टर की जिंदगी में किसी भी प्रकार की खुशी नहीं होती। वह आपसी रंजिश या पुलिस एनकाउंटर में मारे जाते हैं या फिर पकड़े जाने पर पूरी जिंदगी जेल में सड़ते हैं। इसलिए राजनीतिक पार्टी छोटी हो यहा बड़ी सबको अपना कर्तव्य को याद रखना होगा चूंकि आप सभी समाज को लीड करते हो जिसकी वजह से जैसा आप कहते व प्रस्तुत करते हो वैसे राष्ट्र का निर्माण होता है। किसी भी गलत व्यक्ति के विषय में आप इस तरह की बातें करेंगे तो निश्चित तौर पर समाज में गलत संदेश जाएगा।
लेखक:- योगेश कुमार सोनी
आज की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में लोग अपनी परंपरा को भूलते जा रहे हैं। इसका परिणाम है कि आज देश में पर्यावरण संकट के साथ-साथ कई तरह की समस्या उत्पन्न हो रही है। जिसके चलते सभी लोग और जीव-जंतु के जीवन पर संकट है। इस परंपरा में एक दीपावली पर्व पर मिट्टी के दीये जलाना भी है। जिसको आज लोग भूलते जा रहे हैं और उसकी जगह पर इलेक्ट्रानिक लाइटों का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन जो सुंदरता मिट्टी के दीये जलने पर दिखती है वह इलेक्ट्रानिक लाइटों के जलने से नहीं। इस बात को स्वयं लोग भी स्वीकार कर रहे हैं और इस परंपरा को लोगों के भूलने पर चिंता भी व्यक्त कर रहे हैं। मिट्टी के दीये जलाना परंपरा के साथ हमारी संस्कृति है। अपनी संस्कृति को कोई कैसे भूल सकता है। इसका सभी लोगों को ध्यान रखना चाहिए। मिट्टी के दीये जलाने के कई लाभ है। जिसका उल्लेख कई जगहों पर देखने और सुनने को मिलता है। इसलिए सभी लोग मिट्टी के दीयें जलाएँ।
दीपावली का त्यौहार मिट्टी के दीये से जुड़ा हुआ है। यह हमारी संस्कृति में रचा-बसा हुआ है। दीया जलाने की परंपरा आदि काल से रही है। भगवान राम की अयोध्या वापसी की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने घर-घर दीप जलाया था, तब से ही कार्तिक महीने में दीपों का यह त्यौहार मनाये जाने की परंपरा रही है। पिछले दो दशक के दौरान कृत्रिम लाइटों का क्रेज बढ़ा है। आधुनिकता की आंधी में हम अपनी पौराणिक परंपरा को छोड़ कर दीपावली पर बिजली की लाइटिंग के साथ तेज ध्वनि वाले पटाखे चलाने लगे हैं। इससे एक तरफ़ मिट्टी के कारोबार से जुड़े कुम्हारों के घरों में अँधेरा रहने लगा, तो ध्वनि और वायु प्रदूषण फैलानेवाले पटाखों को अपना कर अपनी सांसों को ही खतरे में डाल दिया। अपनी परंपराओं से दूर होने की वज़ह से ही कुम्हार समाज अपने पुश्तैनी धंधे से दूर होता जा रहा है। दूसरे रोजगार पर निर्भर होने लगे हैं। एक समय था जब दीपावली पर्व को लेकर लोग मिट्टी के दीये खरीदने के लिए पहले ही कुम्हार को आर्डर कर देते थे। तब गाँव या अन्य किसी गाँव के कुम्हार के घर के सभी सदस्य काम में व्यस्त होते थे।
दीपावली पर्व पर कई लोगों के आर्डर को पूरा करने में दिन-रात एक कर मेहनत करते थे। हालांकि उस समय उतनी आमदनी नहीं होती थी, लेकिन कुम्हारों की भी एक रुचि रहती थी कि इस परंपरा को जीवंत रखना है। लेकिन आज लोग मिट्टी के दीये जलाना धीरे-धीरे कम कर दिए हैं, इससे अब कुम्हार भी इसमें रुचि नहीं ले रहे। जिसका नतीजा है कि आज दीपावली पर्व में लोग घर में दो-चार मिट्टी के दीये जला कर सिर्फ़ एक परंपरा को किसी तरह निर्वहन कर रहे हैं। ज्यादातर लोग इलेक्ट्रानिक लाइटों, झालर और अन्य लाइटों को जला कर ही दीपावली पर्व में अपने घर को रोशनी से जगमग करने की कोशिश कर रहे हैं। हम सभी अब दीपावली के नाम पर पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं। अब हमें पुनः अपनी परंपरा को समझना होगा। हमें मिट्टी के दिये जलाने की परंपरा की पुन: शुरुआत करनी होगी। इससे कीड़े मकोड़े मरते हैं। झालर और लाइट से कीड़े नहीं मरते। हमारी संस्कृति सरसों के तेल के दिये जलाना है, अच्छे पकवान बनाना, मिठाइयाँ खाना और पड़ोसी को भी खिलाना, लोगों को उपहार देना आदि है। लेकिन लोग अब उतने समझदार नहीं हैं इसलिए पटाखे छूटेंगे।
लोग मिट्टी के दीये जलाएँ। इससे प्रदूषण भी नहीं होगा और परंपरा भी जीवंत रहेगी। दीपावली पर्व पर मिट्टी के दीये जलाना पूर्वजों के द्वारा बनाई गई परंपरा है। इसे हम सभी लोगों को बरकरार रखना चाहिए। दिवाली में मिट्टी के दीये जलाना हमारी संस्कृति और प्रकृति से जुड़ने का बहुत ही सुगम साधन है। यह भारतीय संस्कृति में बहुत ही शुभ और पवित्र माना जाता है। मिट्टी के दीये प्रेम, समरसता और ज्ञान के प्रतीक हैं। सामाजिक व आर्थिक आधार पर भी दीयों की खूबसूरती जगजाहिर है। इस बार दीपावली के दिन मिट्टी के दीये जलाने का संकल्प लेकर संस्कृति का बचाव करना है। सभी लोग मिट्टी के दिये ही जलाएँ। आज की युवा पीढ़ी इलेक्ट्रानिक लाइटों के प्रति अधिक रुचि रख रही है। घरों को सजाने से लेकर दीये जलाने में इलेक्ट्रानिक लाइटों का ही उपयोग कर रही है। जबकि यह सोचना चाहिए कि हमारी संस्कृति और परंपरा का निर्वहन करना युवाओं के कंधे पर ही है। गाँव या किसी शहर में जो कुम्हार है वह आज भी मिट्टी के दीये बनाते हैं। इसमें उन्हें सिर्फ़ आमदनी का लालच नहीं होता बल्कि उनमें अपनी संस्कृति और परंपरा को बरकरार रखने का उत्साह होता है। लेकिन लोग इसे भूलते जा रहे हैं।
पंरपरा व पर्यावरण के संरक्षण के लिए मिट्टी के दीये जलाना है। इनसे कोई प्रदूषण नहीं होता। कृत्रिम रोशनी आंखों और त्वचा के लिए हानिकारक होती है। मिट्टी के दीये की रोशनी आंखों को आराम पहुँचाती है। मिट्टी के दीये हमारी संस्कृति के एक अहम अंग हैं। दिवाली पर इसे जला कर हम अपनी परंपराओं को याद रखते हैं। मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों को प्रोत्साहित करने का भी यह अच्छा मौका है। आइये, इस दीपावली, हम सभी मिलकर मिट्टी के दीये जलाएँ और एक स्वच्छ और हरा-भरा पर्यावरण बनाने में अपना योगदान दें। लोगों को इस पर विचार करना चाहिए। वर्तमान में अपनी परंपरा को बरकरार रखने और पर्यावरण बचाने के लिए इस दीपावली मिट्टी की दीये जलाने के प्रति लोगों ख़ास कर बच्चों व युवाओं काे जागरूक करने के लिए अभियान भी चलाएँ।
लेखिका:- प्रियंका सौरभ
भारत 2047 तक वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसके लिए रेल व्यवस्था का नवीनीकरण अत्यंत आवश्यक है। भारतीय रेलवे देश की जीवन रेखा है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे कार्यक्रमों का इस क्षेत्र पर गहरा असर पड़ा है। भारतीय रेलवे दुनिया की प्रमुख रेल प्रणालियों में से एक है और पिछले एक दशक में सरकार ने इसके मूलभूत ढांचे के विकास, आधुनिकीकरण और परिचालन दक्षता में सुधार के लिए निरंतर प्रयास किए हैं। इसके परिणामस्वरूप, रेलवे ने एक नई दिशा प्राप्त की है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए रेलवे को 2,62,200 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय आवंटित किया गया है, जो एक नया रिकॉर्ड है।
2013-14 में रेल बजट केवल 63,363 करोड़ रुपये था। 2014 से 2024 के बीच, सरकार ने 31,180 किलोमीटर से अधिक रेल ट्रैक चालू किए हैं और ट्रैक बिछाने की गति 14.54 किलोमीटर प्रतिदिन हो गई है, जो 2014-15 में केवल 4 किलोमीटर प्रतिदिन थी। इसी अवधि में 41,655 रूट किलोमीटर विद्युतीकरण भी किया गया है, जो कि 2014 के मुकाबले लगभग दोगुना है। आज, वंदेभारत, अमृत भारत और नमो भारत जैसी कई आधुनिक ट्रेनों का संचालन हो रहा है, जो यात्रियों के जीवन में सुगमता ला रही हैं। 2019 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लॉन्च की गई वंदेभारत एक्सप्रेस, आधुनिक और आरामदायक रेल यात्रा का प्रतीक बन गई है। वर्तमान में देश में 102 वंदे भारत ट्रेनों का संचालन हो रहा है, जिनकी ऑक्यूपेंसी रेट 96.62% है। वंदेभारत ट्रेनों की अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटा है, जो न केवल यात्रियों को बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी गति प्रदान कर रही है। हाल ही में, गुजरात में अहमदाबाद और भुज के बीच पहला ‘वंदेभारत मेट्रो’ शुरू हुआ, जो शहरी यातायात समस्या का समाधान है। इसके अलावा, जल्द ही वंदेभारत स्लीपर ट्रेनों का भी परिचालन शुरू होगा।
रेलवे केवल यात्री सुविधा नहीं बल्कि भारत की कृषि और औद्योगिक प्रगति का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसी दिशा में, भारत सरकार ने ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’ का शुभारंभ किया है, जिसके अंतर्गत 553 रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास का कार्य चल रहा है। यह पहल यात्रियों को आधुनिक सुविधाएं और स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास करती है। ‘पीएम गति शक्ति मिशन’ के अंतर्गत, ऊर्जा, खनिज और सीमेंट जैसे तीन आर्थिक रेलवे गलियारों की पहचान की गई है, जो लॉजिस्टिक्स लागत में कमी और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सहायक होगी। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 2014 में शुरू किए गए ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत रेलवे ने ‘स्वच्छ रेल, स्वच्छ भारत’ अभियान भी चलाया है, जिससे स्टेशनों पर सफाई और सुविधाओं में सुधार हो रहा है।
रेलवे द्वारा डिजिटलीकरण, स्वच्छता, समावेशिता और शिकायत निवारण को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष विशेष अभियान चलाए जाते हैं। इस वर्ष, 31 अक्टूबर, 2024 तक 50,000 स्वच्छता अभियान आयोजित करने का लक्ष्य है, जो पिछले वर्ष के लक्ष्य से लगभग दोगुना है। भारतीय रेलवे ने सुरक्षा और सुगमता बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं, जैसे ‘कवच प्रणाली’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग’, जिसके परिणामस्वरूप रेल हादसों में कमी आई है।
भारतीय रेलवे ‘डिजिटल इंडिया मिशन’ और ‘विकसित भारत’ के संकल्पों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हमें इस गति को बनाए रखना चाहिए, ताकि रेलवे हर वर्ग के लिए सुखद यात्रा की गारंटी बन सके। मुझे पूरा विश्वास है कि हम अपने उत्साह और जुनून से इस लक्ष्य को जल्द ही हासिल कर लेंगे।
लेखक:- डॉ. विपिन कुमार
