प्रेरक प्रसंग:- सभ्यता और सज्जनता की कसौटी Date : 20-Aug-2024 काषाय वस्त्रधारी स्वामी विवेकानंद अमेरिका के शिकागो नगर में सड़क से जा रहे थे| उनका यह वेश अमेरिका वासियों के लिए कौतूहल की वस्तु था | पीछे आ रही एक अमेरिका महिला ने अपने साथी पुरुष से कहा, “जरा इन महाशय की इस अजीब पोशाक को तो देखो |” स्वामीजी ने वह व्यंग्य सुना | वे जरा रुके और मुड़कर उस महिला से बोले, “देवी ! आपके देश में दर्जी सभ्यता के उत्पादक और कपड़े सज्जनता कि कसौटी माने जाते हैं| पर जिस देश में मैं आया हूँ, वहाँ कपड़ों से नहीं, मनुष्य के चरित्र से उसकी पहचान की जाती हैं |” यह सुनकर वह महिला बड़ी ही लज्जित हुई| Read More
"स्वाधीनता के राष्ट्र नायक सुभाष बाबू को जीते जी क्यों मारा गया ?" Date : 20-Aug-2024 नेताजी सुभाष चंद्र बोस के तथाकथित बलिदान दिवस पर शत् शत् नमन है-सुभाष बाबू के विरुध्द गाँधीजी और उनकी समर्थक कांग्रेस लाॅबी के षड्यंत्र से षड्यंत्र भी शर्मिंदा है - "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा" - काश! आपको मिले नेतृत्व में भारत पल्लवित और पुष्पित होता तो कोलकाता जहाँ माँ दुर्गा का माहात्म्य है , एक महिला मुख्यमंत्री ममता दीदी हैं, वहाँ डॉ. मौमिता देवनाथ के साथ ये दुष्कर्म और वीभत्स हत्या न होती फिर न्याय के लिए भटकना न पड़ता , परंतु नेताजी आपके न रहने पर भारत में एक ऐंसे व्यक्ति को सत्ता प्राप्ति की आड़ में राष्ट्र का रोल मॉडल बना डाला, जिसने केवल हिन्दुओं को अहिंसा का पाठ पढ़ाकर - पढ़ाकर हिन्दुओं की दुर्दशा करवा दी जबकि दूसरी ओर इसी व्यक्ति ने प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया और तो और सार्जेंट बनकर सैनिक भर्ती कराए तब इनकी अहिंसा कहाँ चली गई थी?यह व्यक्ति मुसलमानों की हिन्दुओं पर की गई हिंसा और बलात्कार को जायज बताता है, और केवल हिन्दुओं को अहिंसा का पाठ पढ़ाता है ? त्रिपुरी अधिवेशन में चुनाव के उपरांत भारत का नेतृत्व गाँधी जी और उनकी समर्थक कांग्रेस लाॅबी के हाथ से निकल गया क्योंकि अकेले सुभाष चंद्र बोस ने पट्टाभि सीतारमैय्या सहित इन सबको 203 मतों से धराशायी करते हुए भारत का नेतृत्व प्राप्त कर लिया परंतु फिर सुभाष बाबू को तबाह करने के लिए गांधी जी, कांग्रेस और अंग्रेजों ने मिलकर ऐंसे षड्यंत्र रचे हैं कि षड्यंत्र भी शर्मसार हो जाएगा। अब ये चित्र दुर्लभ हैं, और ऐंसी इच्छा शक्ति भी दुर्लभ है कि 105 डिग्री बुखार में स्ट्रेचर में लेटे - लेटे त्रिपुरी अधिवेशन में आए और फिर विष्णुदत्त नगर पहुंच कर अचेत होने तक भाषण भी दे - तो ये सुभाष चन्द्र बोस के अलावा और कौन हो सकता है? कैंसे स्वीकार करें?सुभाष बाबू कि आज आपका महा बलिदान दिवस है | क्या आप विमान हादसे में? या किसी गहरी साजिश का शिकार हुए?क्या आपकी आजाद हिंद सेना से सभी थर्रा गये थे? इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने क्यों स्वीकार किया था कि हमारा भारत छोड़ने का प्रमुख कारण आजाद हिंद सेना थी? आजाद हिंद सेना के कारण ब्रिटिश भारत की सेनाओं में विद्रोह के स्वर क्यों गूंजने लगे थे? सच तो ये है कि महात्मा गाँधी के आंदोलनों की असफलता से लोग विशेषकर युवा ऊब गये थे और वो अब सुभाष बाबू के साथ जाना चाहते थे.. शेष प्रश्नों के उत्तर आप समझ ही गये होंगे.. परंतु आज उनके तथाकथित बलिदान दिवस पर शत् शत् नमन करते हुए |जबलपुर में उनके सर्वशक्तिमान स्वरुप की स्वर्णिम यादें इतिहास संकलन समिति महाकोशल प्रांत की ओर से प्रस्तुत कर रहा हूँ |क्यों था त्रिपुरी अधिवेशन1939 (जबलपुर) स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का भूकंप? तत्कालीन विश्व की राजनीति का सबसे घातक बयान था "पट्टाभि की हार मेरी(व्यक्तिगत)हार है"..महात्मा गाँधी..गाँधी जी जान गये थे की देश की युवा पीढ़ी और नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस के हाथ में चला गया है अब क्या किया जाए? इसलिए उक्त कूटनीतिक बयान दिया गया.. अब त्रिपुरी काँग्रेस अधिवेशन में पट्टाभि की हार को गाँधी जी ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था.. इसलिए कांग्रेस की कार्य समितियों ने सुभाष चंद्र बोस के साथ असहयोग किया (यह अलोकतांत्रिक था परंतु गांधी जी का समर्थन था और यही तानाशाही भी) साथ ही सुभाष बाबू को गांधी जी के निर्देश पर काम करने के लिए कहा गया, जबकि अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस थे। सुभाष बाबू का विचार था कि अब अंग्रेजों को 6माह का अल्टीमेटम दिया जाए कि वो भारत छोड़ दें.. इस बात पर गांधी जी और उनके समर्थकों के हांथ - पांव फूल गए, उधर अंग्रेजों भी भारी तनाव में आ गए और अंग्रेजों ने गांधी जी और कांग्रेस पर दवाब डाला की सुभाष बाबू का असहयोग किया जाए.. इसलिए एक गहरी साजिश के चलते सुभाष बाबू का विरोध किया गया और अंतत:सुभाष बाबू ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया... सुभाष बाबू ने कहा था कि द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ होने वाला इसलिए यही सही समय है जब अंग्रेजों से आरपार की बात की जाए परंतु गांधी जी और उनके तथाकथित चेलों ने विरोध किया.. सच तो ये है कि सुभाष बाबू की बात मान ली गई होती तो देश 7वर्ष पहले 1940 तक स्वाधीन हो जाता और विभाजन की विभीषिका नहीं देखनी पड़ती.. इस्तीफे के बाद भी सुभाष बाबू चरमोत्कर्ष हुआ, उन्होंने 60 हजार योद्धाओं के साथ आजाद हिंद सेना का निर्माण किया और भारत की ओर कूच किया |आजाद हिंद सेना के जवानों से हुए दुर्व्यवहार से बरतानिया सेना भी स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष कर दिया, जिसके दवाब में अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए बाध्य हुए..| लेखक - डॉ. आनंद सिंह राणा Read More
19 अगस्त : राइफलमैन जसवंत सिंह रावत Date : 19-Aug-2024 जसवंत सिंह रावत भारतीय सेना में एक भारतीय सैनिक थे, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन में सेवा की। रावत को युद्ध के दौरान एक महत्वपूर्ण चौकी की वीरतापूर्ण रक्षा के लिए जाना जाता है, जिस पर चीनी सेना द्वारा भारी हमला किया गया था। संख्या में बहुत कम होने के बावजूद, उन्होंने कथित तौर पर जमकर लड़ाई लड़ी और यथासंभव लंबे समय तक अपनी स्थिति बनाए रखी। उनके साहस और बलिदान ने उन्हें भारतीय सैन्य इतिहास में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बना दिया है, और उन्हें वीरता और समर्पण के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। 17 नवंबर 1962 को, वह डेल्टा कंपनी का हिस्सा बने थे, जो चीनी आक्रमण के खिलाफ नूरानांग के पास एक चौकी का बचाव कर रही थी। उन्होंने एक चीनी मीडियम मशीन गन (MMG) को वश में करने के लिए स्वेच्छा से काम किया जब उनकी कंपनी ने पीछे हटने का फ़ैसला किया, तो उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया और सेला और नूरा नाम की दो स्थानीय लड़कियों की मदद से अपनी पोस्ट पर रुके, जिन्होंने उन्हें गोला-बारूद और भोजन मुहैया कराया। वह एक बंकर से दूसरे बंकर में जाते रहे, दुश्मन पर गोलीबारी करते रहे और एक बड़ी सेना का आभास देते रहे। उन्होंने 72 घंटे तक दुश्मन को रोके रखा और 300 से ज़्यादा चीनी सैनिकों को मार गिराया। उन्हें भारतीय सेना और स्थानीय लोगों द्वारा एक नायक और किंवदंती के रूप में सम्मानित किया जाता है। उनकी पोस्ट पर एक स्मारक बनाया गया है, जिसका नाम जसवंत गढ़ है। सेना द्वारा उन्हें एक सेवारत अधिकारी के रूप में माना जाता है, जहाँ उनकी पोस्ट पर एक झोपड़ी, एक बिस्तर, जूते, पत्र और पाँच जवान तैनात हैं। जिस स्थान पर उनकी मृत्यु हुई, वहाँ एक बौद्ध मंदिर भी बनाया गया है। सेला दर्रा और सेला सुरंग का नाम सेला के नाम पर रखा गया है, जो उनकी मदद करने वाली लड़कियों में से एक थी। भारी कठिनाइयों का सामना करते हुए साहस और निस्वार्थता के बारे में चर्चा करते समय उनकी कहानी का अक्सर उल्लेख किया जाता है। Read More
19 अगस्त : संस्कृत की समकालीन प्रासंगिकता Date : 19-Aug-2024 ज्ञान की भारतीय परम्परा के स्रोत के रूप में संस्कृत भाषा और साहित्य प्रेरणा और गौरव का विषय है। ज्ञान की साधना को जीवन के क्लेशों से छुटकारा दिलाने के उपाय के रूप में स्थापित करते हुए पुरुषार्थों से मनुष्य जीवन को समग्रता में जीने का प्राविधान किया गया है। इसी से लिए ज्ञान को पवित्र माना गया है न कि दूसरों पर नियंत्रण का ज़रिया। संस्कृत विद्या के विस्तृत प्रांगण में सृष्टि और मनुष्य जीवन से जुड़े सभी पक्षों को शामिल किया गया है। वेद, वेदांग, उपनिषद, स्मृतियों, पुराणों, महाकाव्यों ही नहीं गणित, ज्योतिष, व्याकरण, योग, आयुर्वेद, वृक्षायुर्वेद, धातु विज्ञान तथा नाना विद्याओं जैसे व्यावहारिक विषयों का विकास विपरीत परिस्थितियों में भी होता रहा। इस ज्ञान-कोष को आक्रांताओं के विद्वेष का सामना करना पड़ा और नालंदा जैसे विश्वविख्यात ज्ञान केंद्र को नष्ट कर दिया गया। वाचिक पद्धति अध्ययन अध्यापन से बहुत कुछ बच गया और उसे अगली पीढ़ी अनेक विषयों के प्रतिपादन में संक्षिप्त, सांकेतिक तथा संयत सूत्र पद्धति का उपयोग किया गया। बादरायण का ब्रह्म सूत्र,आपस्तम्ब का धर्म सूत्र, वात्स्यायन का काम सूत्र, गौतम का न्याय सूत्र, पतंजलि का योग सूत्र और पाणिनिरचित व्याकरण का मानव मेधा का अप्रतिम प्रमाण ‘अष्टाध्यायी’ विविध विषयों का व्यवस्थित प्रतिपादन करते हैं। थोड़े से अक्षरों में निबद्ध सूत्र की विशद व्याख्या की जाती है। भाष्य और टीका की परम्परा शुरू हुई। पाणिनि के अष्टाध्यायी के सूत्रों पर कात्यायन ने वार्तिक लिखे। अष्टाध्यायी के अनेकानेक विस्तार हुए और वरदराजाचार्य की लघुकौमुदी, भट्टोजिदीक्षित की सिद्धांतकौमुदी, पतंजलि का महाभाष्य, भर्तृहरि का वाक्यपदीय, नागेश भट्ट का शब्देन्दुशेखर और परिभाषेन्दुशेखर आदि व्याख्या ग्रंथ रचे गए। विश्लेषण की गहनता और विचार की स्वाधीनता के ये निकष आज भी स्पृहणीय हैं।दुर्भाग्य से संस्कृत विद्या पर संकुंचित होने का आरोप लगाया जाता है। सत्य यह है भारत के विविध मतों की प्रचुरता है। वह वैचारिक उदारता और सहनशीलता का अनोखा उदाहरण है। अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, भेदाभेद, शुद्धाद्वैत, अचिंत्य भेदाभेद जैसे विभिन्न रूपों शंकराचार्य, निम्बार्काचार्य, मध्वाचार्य, रामानुजाचार्य और वल्लभाचार्य आदि के द्वारा वेदांत का प्रतिपादन सृष्टि, जीवन और जगत की समग्र विविध व्याख्याओं को उपस्थित करते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा के बौद्धिक परिवेश में प्रवेश करने पर ज्ञान के प्रति निश्छल उत्सुकता और अदम्य साहस के प्रमाण पग-पग पर मिलते हैं। इसमें आलोचना और परिष्कार का कार्य भी सतत होता रहा है । सैद्धांतिक अमूर्तन , खंडन-मण्डन की एक पारदर्शी एवं सार्वजनिक विमर्श की व्यवस्था को दर्शाती है । प्रत्येक शास्त्र की विषय वस्तु, उद्देश्य, प्रासंगिकता और इसके जिज्ञासु को सुनिश्चित किया गया था। ज्ञान अबाधित होना चाहिए और छल प्रपंच से रहित होना चाहिए । उसे प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द आदि विभिन्न स्वीकृत प्रमाणों पर जाँच परख कर स्वीकार करना चाहिए। ज्ञानार्जन में श्रवण, मनन और निदिध्यासन का अवलम्बन किया जाता है । संस्कृति के जीवित प्रवाह स्वरूप संस्कृत में उपलब्ध भारतीय मनीषा को प्रतिष्ठित करना मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। दुर्भाग्य से संस्कृत को अनुष्ठानों के लिए आरक्षित कर जीवन- संस्कार, पूजन और उद्घाटन से जोड़ दिया गया। हम इस अमूल्य विरासत का मूल्य भूल गए। शिक्षा, परिवार, राज नय , व्यवसाय, वाणिज्य, स्वास्थ्य , प्रकृति, जीवन, जगत और ईश्वर को ले कर उपलब्ध चिन्तन बेमानी रहा । हम नाम तो सुनते रहे पर बिना श्रद्धा के क्योंकि मन में संदेह और दुविधा थी। पश्चिमी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक घुसपैठ ने हमारी विश्व दृष्टि को ही बदलना शुरू किया। आज अतिशय भौतिकता और उपभोक्तावाद से सभी त्रस्त हो रहे हैं। भारत में अकादमिक समाजीकरण की जो धारा बही उसमें हमारी सोच परमुखापेक्षी होती गई और हमारे लिये ज्ञान का संदर्भविन्दु पश्चिमी चिन्तन होता गया। ज्ञान के लिये हम परोपजीवी होते गए । हम उन्हीं के सोच का अनुगमन करते रहे । ज्ञान की राजनीति से बेखबर हम नए उन्मेष से वंचित होते गए । पश्चिम के अनुधावन से मौलिकता जाती रही । भारत के शास्त्रीय चिन्तन को समझना और उसका उपयोग सैद्धांतिक विकास व्यावहारिक समाधान में लाभकारी होगा। योग और आयुर्वेद को ले कर ज़रूर उत्सुकता बढ़ी है पर अन्य क्षेत्र अभी भी उपेक्षित हैं। संस्कृत के लिये अवसर से न केवल ज्ञान के नए आयाम उभरेंगे बल्कि संस्कृति से अपरिचय काम होगा, भ्रम भागेगा और हम स्वयं को पहचान सकेंगे। लेखक - गिरीश्वर मिश्र Read More
19 अगस्त : संस्कृतोत्सव Date : 19-Aug-2024 भाषा एक संचार साधन के रूप में जन्म लेकर बढ़ती आयी है। हर एक भाषा का हजारों वर्ष का इतिहास देखने को मिलता है। दुनिया में हजारों भाषाएँ हैं, उनमें कई भाषाओं के लिए लिपि भी नहीं है, ऐसी भाषाएँ केवल संभाषण के रूप में चलती आयी हैं। संस्कृत अत्यंत प्राचीन भाषा मानी जाती है। यह भाषा देव के मुख से निकली देवभाषा, गीर्वाण भाषा कही जाती है। उसकी प्राचीनता के संबंध में काल निश्चित करना संभव न होने पर भी प्राप्त जानकारी के अनुसार पाश्चात्यों ने ई.पू. 1500 तक इसकी प्राचीनता का अंदाजा लगाया है। यह भारतीयों के लिए गर्व का विषय है। यह मात्र प्राचीन ही नहीं, समृद्ध और वैज्ञानिक भी है और कई भाषाओं के लिए मातृस्वरूप है। हिंदी भाषा तथा कन्नड़, तेलुगु, मलयालम आदि क्षेत्रीय भाषाओं को समग्र रूप से जानने के लिए संस्कृत का ज्ञान अत्यंत पूरक है। अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए उस भौगोलिक प्रदेश की पृष्ठ्भूमि रहती है। लेकिन संस्कृत ऐसी भौगोलिक सीमाओं से परे राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर की भाषा भी है। उसमें निहित वेद, दर्शन, रामायण, महाभारत, शाकुंतल आदि ग्रंथ वैश्विक स्तर पर पूजनीय माने जाते हैं। इतना ही नहीं, संस्कृत भाषा से अनूदित साहित्य से क्षेत्रीय भाषाएँ समृद्ध हुई हैं। संस्कृत भाषा और साहित्य ने विश्व को महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्कृत भाषा व साहित्य में कला और विज्ञान से संबंधित विशिष्ट बातों का उल्लेख है। सरल शब्दों में कला प्रतिभाप्रधान है। प्राचीन भारत में हर एक ज्ञान शाखा को और कला को ब्रह्मज्ञान पाने का पूरक मार्ग माना जाता था। कई संस्कृत ग्रंथों में कलाओं की संख्या 64 होने से और रामायण, महाभारत, पुराणादि ग्रंथ, वात्सायन कामसूत्र में भी 64 कलाओं का उल्लेख है। कंसवध के बाद सांदीपनी महर्षि के पास गुरुकुल में विद्या सीखने जाने पर श्री कृष्ण ने केवल 64 दिनों में 64 कलाएँ, 14 विद्याएँ सीखीं, ऐसा उल्लेख है। ऐसे ही काव्य, विज्ञान, अर्थशास्त्र, गणित, न्यायालय के निर्णय, आयुर्वेद और प्रस्तुत समय में प्रसिद्ध संस्थाओं के ध्येयवाक्यों को भी संस्कृत में देख सकते हैं। संस्कृत और काव्य : कवि की कृति को ‘काव्य’ कहते हैं। लेकिन लिखने वाला हर कोई कवि नहीं कहलाता। लिखा हुआ सब कुछ काव्य नहीं हो सकता। कवियों में पुराने जन्मों और अब के जन्म के उत्तम संस्कार, श्रेष्ठ गुरुओं के पास अध्ययन, उदात्त लोगों का निरंतर मार्गदर्शन, प्रवास, हर दिन पठन, चिंतन आदि होने चाहिए। तब जाकर वह कवि, महाकवि बन सकता है। वाल्मीकी जी दुनिया के प्रथम कवि माने जाते हैं। उनके द्वारा संसार को समर्पित रामायण ‘आदिकाव्य’ नाम से प्रसिद्ध है। सांकेतिक रूप से पाँच और कृतियाँ संस्कृत में महाकाव्य के रूप में प्रसिद्ध हैं। वे हैं- महाकवि कालिदास विरचित रघुवंश और कुमारसंभव, भारवी द्वारा रचित किरातार्जुनीय, माघ का शिशुपालवध और श्री हर्ष विरचित नैषधीयचरित। विश्वप्रसिद्ध पंचतंत्र के रचयिता विष्णुशर्मा, समकालीन कवि नागपुर के डा. श्रीधरभास्कर वर्णेकर द्वारा विरचित शिवराज्योदयम, ज्ञानपीठ पुरस्कृत संस्कृत महाकवि डा. सत्यव्रतशास्त्री विरचित रामकीर्तिमहाकाव्यम, बृहत्तर भारतम ऐसे कई महाकाव्य उल्लेखयोग्य हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत मैसूर के विद्वान डा. एच,वी.नागराजराव जी भारत के सुप्रसिद्ध संस्कृत महाकवि हैं, जिनके द्वारा रचित दसों शतक प्रसिद्ध हैं। संस्कृत और विज्ञान: संस्कृतविज्ञान में अत्यंत बड़ी मात्रा में उपलब्ध खगोलशास्त्र की ज्ञानराशि हमारे प्राचीनकाल से हमारे साथ ही है। यह अवधि ई.पू.6000 ई के ऋग्वेद के मंत्र से लेकर 14 वें दशक के सायणाचार्य जी की व्याख्या तक पसरी हुई है। वेदकाल के बाद ख्यात ऋषिसदृश कई प्रसिद्ध वैज्ञानिकों को हम देख सकते हैं। प्रमुख रूप से ईसा की 5 वीं सदी का आर्यभट, 7 वीं सदी का भास्कर-1, ईसा की 12 वीं सदी का भास्कर-2 आदि। ऐसा बताया जाता है कि सूर्यदेव के प्रकाश की किरणों की गति को 19वीं सदी के पाश्चात्य वैज्ञानिक मैखालसन और मार्ले नामक व्यक्तियों ने अन्वेषित किया। लेकिन प्राचीन भारत के वैज्ञानिक महर्षियों ने ई.पू. 6000 साल से पहले ही इसका अन्वेषण किया था, यह गर्व की बात है। संस्कृत और अर्थशास्त्र: अर्थशास्त्र अथर्ववेद का उपवेद है। यह राजनीति से संबंधित कई बातों की जानकारी देता है। आचार्य विष्णुगुप्त अर्थशास्त्र के प्रणेता है। चाणक्य, कौटिल्य, आदि उनके उपनाम हैं। जीवन निर्वाह के लिए जो आवश्यक है उसे कौटिल्य ने अर्थ कहा है। इस अर्थ के लाभ और संरक्षण के क्रम को अर्थशास्त्र विस्तृत रूप से जानकारी देता है। चाणक्य ने राज्य की रक्षा, किले, चार सांप्रदायिक विद्याएँ, चार राजकीय उपाय, छः प्रकार के विदेश नीति, मंडल व्यवस्था, राजा के दंडनाधिकार, मंत्रि परिषद की रचना, राजा द्वारा अपने पुत्र, पत्नी, बंधुओं की परीक्षा करने का विधान, राजा की मृत्यु पर मंत्री का कार्यभार, शत्रुओं का सामना करने के तंत्र, रक्षा के उपाय, गूढचर्या, विभिन्न विभागों के अध्यक्षों के कार्य, शिक्षा विधान आदि विचारों को कौटिल्य ने विस्तार से समझाया है। पहली बार कौटिल्य के अर्थशास्त्र ग्रंथ का संपादन करके मैसूर के रुद्रपट्टण के डा.आर.शामशास्त्री जी ने ग्रंथरूप में प्रकाशित किया। 1909 में इसे दुनिया में पहली बार मुद्रित करके प्रकाशित करने का गर्व मैसूर के प्राच्यविद्यासंशोधनालय का है। संस्कृत और गणित : एक समय था, जब गणित को संस्कृत भाषा में पढ़ाया जाता था। आज इसे सुनकर आश्चर्य होता है। किसी भी विषय को लय के द्वारा समझाने से मन को न केवल आह्लाद मिलता है, बल्कि वह ज्यादा समय तक मन में टिक भी जाता है, यह अनुभवजन्य सत्य है। इसलिए गणित जैसे कठिन विषय को भी लय, छ्न्दोबद्ध पदों के द्वारा न केवल सुस्पष्ट रूप से बल्कि सुलभ रीति से समझाया जाता था। हमारे स्कूलों-कालेजों में सिखाये जा रहे कई गणित प्रमेय पहले संस्कृत साहित्य में मौजूद थे, यह बात आज भी बहुत लोग नहीं जानते। इतिहास यह बताता है कि आज प्रौढशाला में सिखाया जानेवाला ‘पैथागोरस प्रमेय’ ईसा के 500 वर्षों से पहले ही अन्वेषित था। बताया जाता है कि उससे भी पहले ई.पू.600 सालों से पूर्व इस प्रमेय को संस्कृत के शुल्बसूत्रों में बताया गया था। शुल्ब सूत्र अपस्तंब, बोधायन, मानन, कात्यायन आदि पंडितों द्वारा बताया गया था। विज्ञान को न्यूटन से कई शतक पहले हमारे यहाँ प्रतिपादित करनेवाले थे द्वितीय भास्कराचार्य, जिनको हम कैल्कुलस के पितामह कह सकते हैं। त्रिकोन मति के विकास के लिए कारणीभूत प्रथम आर्यभट, द्वितीय आर्यभट, ब्रह्मगुप्त तथा माधव आदि का स्मरण करना अत्यंत आवश्यक है। संस्कृत और न्यायालय: आज न्यायालयों में कई संदर्भों में वकालत करते समय साक्षी को महत्व दिया जाता है। हर कोई भरोसेमंद साक्षी नहीं बन सकता। उसके लिए कई मानदण्ड हैं। जो साक्षी देता है, उसे सत्य ही बोलना है, वह भरोसेमंद व्यक्ति होना चाहिए, आत्मविश्वासी होना चाहिए, निर्भीत होना चाहिए ऐसे गुणों का उल्लेख किया जा सकता है। इसे कई हजार साल पहले हमारे संस्कृत ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया गया है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। याज्ञवल्क्य स्मृति में आनेवाले व्यवहाराध्याय में साक्षी के गुणधर्मों की विवेचना की गई है। इतना ही नहीं, याज्ञवल्क्य स्मृति के प्रसिद्ध व्याख्याता विज्ञानेश्वर लिखित मिताक्षर नामक ग्रंथ का अनुसरण करके ही सर्वोच्च न्यायालय में कई निर्णय प्रकट होते हैं, यह ध्यान देने योग्य बात है। `संस्कृत और आयुर्वेद : आयुर्वेद मात्र भारतीयों को नहीं, विदेशियों को भी अपनी ओर खींचनेवाली विशिष्ट पद्धति है। आयु यानी आयुष्य, वेद यानी विज्ञान। अपनी संपूर्ण जीवतावधि को स्वस्थ होकर बिताने के लिए पालन किए जानेवाले विधानों के निरूपण के बारे में आयुर्वेद में महत्व दिया गया है। कई हजार साल पहले भूमि पर लोगों में रोग दिखाई देने पर ऋषिमुनिगण भगवान की शरण में जाते हैं। बताया जाता है कि तब ब्रह्मदेव ने आयुर्वेद शास्त्र का विवरण दिया। गुरु शिष्य परंपरा में कई ऋषियों ने इसके बारे में अध्ययन करके ग्रंथों की रचना की है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वाग्भट के ग्रंथ, प्राचीन तथा प्रमुख आयुर्वेद विज्ञान के ग्रंथ माने जाते हैं। आयुर्वेद ग्रंथों की रचना संस्कृत में हुई है। संस्कृत से विविध भाषाओं में अनूदित ग्रंथ अध्ययन के लिए उपलब्ध हैं। भाषांतर ग्रंथों से आयुर्वेद का परिचय मिलता है, फिर भी विषय के यथावत ग्रहण के लिए संस्कृत का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। संस्कृत और पत्रिका: ‘सुधर्मा’ संस्कृत की एकमात्र दिन पत्रिका है। 1970 के जुलाई 15 को पंडित के.एन.वरदराज अय्यंगार जी ने मैसूर के श्रीमन्महाराजा संस्कृत पाठशाला की श्री गणपति सन्निधि में पत्रिका आरंभ की। वे खुद उस पत्रिका के संपादक तथा प्रकाशक थे। वे सतत 20 साल संस्कृत पत्रिका का प्रकाशन करके भाषा प्रेमियों की प्रशंसा के पात्र बने। तब पत्रिका का मूल्य मात्र पाँच पैसे थे। इतना ही नहीं, 1976 में केंद्र सरकार ने आकाशवाणी में संस्कृतवार्ता का प्रसारण आरंभ किया। इसके कारणीभूत थे श्री वरदराज अय्यंगार्। श्री के.वरदराज अय्यंगार जी के निधन के बाद उनके पुत्र विद्वान श्री के.वी.संपतकुमार जी ने संस्कृत भाषा के प्रचार और प्रसार को ‘सुधर्मा’ का ध्येयोद्देश मानते हुए कई उतार चढाव के बाद भी पत्रिका चलाते रहे। सारे विश्व में ‘सुधर्मा’ संस्कृत दिनपत्रिका के रूप में सफल हुई तथा उसने दुनिया को कई लेखकों का परिचय कराया। विद्वानों द्वारा रचित कई पुस्तकों का ‘सुधर्मा’ ने प्रकाशित किया है। संस्कृत भाषा से संबंधित पुस्तक मेला का आयोजन करके संस्कृत भाषा और कई प्रकाशकों को प्रोत्साहन दे रहा है। 2019 में पत्रिका ने सुवर्ण वर्षोत्सव का आचरण किया , यह हर्ष का विषय है। 2020 में ‘सुधर्मा’ पत्रिका के संपादक श्री के वी संपतकुमार तथा श्रीमति जयलक्ष्मी जी को केंद्र सरकार ने ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया है। 2021 में श्री संपतकुमार जी के निधन के बाद उनकी पत्नी जयलक्ष्मी जी ने आर्थिक संकष्टों के बावजूद भी पत्रिका के प्रसारण जारी रखा है, यह खुशी की बात होने पर भी पत्रिका के प्रसारण के लिए संस्कृत प्रेमियों की सहायता अत्यंत आवश्यक है। आज के दिनों में विद्यार्थी तथा इतर भाषाप्रेमी संस्कृत सीखने की ओर अत्यंत रुचि से प्रवृत्त हो रहे हैं। विदेशों में भी संस्कृत के बारे में आदर की भावना व्यक्त होकर उसको सीखने की तरफ लोगों का मुड़ना हम भारतीयों के लिए गर्व का विषय है। इस दिशा में सरकार देश के सभी विद्यालय, शोध संस्थान और निजी संघ-संस्थानों में भी श्रावण पूर्णिमा के संदर्भ में पिछले तीन दिन और अगले तीन दिन कुल मिलाकर एक सप्ताह भर संस्कृत सप्ताह मनाते हुए, इस सप्ताह में संस्कृत भाषा सीखने के लिए प्रोत्साहन दे रही है, यह हर्ष का विषय है। लेखिका - डॉ. करुणा लक्ष्मी. के. एस. 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18 अगस्त : पेशवा बाजीराव प्रथम ने इस्लामिक शक्तियों को ध्वस्त कर, हिंदुत्व का प्रभुत्व स्थापित किया Date : 18-Aug-2024 अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध(सन् 1720 से सन् 1740 तक) में विश्व के महानतम सेनापतियों की बात करें तो बाजीराव प्रथम, विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे। बाजीराव प्रथम ने छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदू पद पादशाही के सिद्धांत का समूचे भारत में विस्तार किया था। वह मुगलों के लिए काल थे। बाजीराव प्रथम का उद्देश्य पतन्नोमुख मुगल साम्राज्य पर हिन्दू राज्य की स्थापना करना था।इसलिए बाजीराव प्रथम ने कहा था कि "हमें इस जर्जर वृक्ष के तने पर आक्रमण करना चाहिए, शाखाएं तो स्वयं ही गिर जाएंगी।" (Let us strike at the trunk of withering tree, the branches will fall by themselves) गौरतलब है कि 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशक में ही मुगल साम्राज्य का औरंगजेब की मृत्यु के साथ मृत्यु नाद बज गया था और लड़खड़ाते हुए उत्तर मुगल कालीन शासकों ने सत्ता संभाली थी। छत्रपति शाहू की ओर से बाजीराव प्रथम ने संपूर्ण भारत में मुगलों और इस्लामिक शासकों से मुगलिया के नाम से चौथ और सरदेशमुख वसूल की।भारत में इस्लामिक सत्ता की बखिया उधेड़कर उन्हें ध्वस्त कर दिया। इस कड़ी में तत्कालीन भारत में मुगल सेना के सबसे बड़े सेनापति चिनकिलिच खान उर्फ आसफजाह निजामुल्मुल्क (निजाम) जिसे मुस्लिम बड़ा योद्धा समझते जाता थे, उसे हिन्दू महा महारथी बाजीराव प्रथम ने बिना युद्ध के ही दो बार जमकर ठोका था। उत्तर मुगल कालीन शासक मुहम्मद शाह रंगीला की रंग - रलियों से तंग होकर निजाम दक्षिण भारत भाग आया और उसने सन् 1724 में हैदराबाद की स्थापना की। निजाम चाहता था कि दक्षिण भारत में इस्लामिक साम्राज्य स्थापित हो जाए, परंतु बाजीराव प्रथम के होते हुए यह संभव नहीं था इसलिए बाजीराव प्रथम और निजाम के मध्य निर्णायक युद्ध होना अनिवार्य हो गया था । अचिरात् सन् 1726 में निजाम ने शंभाजी की सहायता से छत्रपति शाहू के विरुद्ध युद्ध आरंभ कर दिया। उस समय शाहू की स्थिति बहुत खराब हो गई। सन् 1727 में अविलंब बाजीराव कर्नाटक से वापस आया उस अवसर पर बाजीराव ने महान् सेनापति की योग्यता का परिचय दिया। एक वर्ष की छुटपुट युद्धों के पश्चात फरवरी सन् 1728 में बाजीराव ने पालखेड (पालखेड़) नामक स्थान पर निजाम को घेर लिया और निजाम को ऐसी कठिन परिस्थिति में डाल दिया कि उसने बिना युद्ध के संधि कर ली यह बाजीराव की महान विजय थी। मार्च सन् 1728 में मुंगी शेगांव (Mungishegaon) की संधि के द्वारा परास्त निजाम ने - 1.शाहू को महाराष्ट्र का एकमात्र शासक स्वीकार कर लिया । 2.चौथ और सरदेशमुख का वह धन जो पहले से बाकी था ,देने का वादा किया। 3. मराठा सरदारों को अपनी सीमाओं में रहने देना स्वीकार किया। परंतु निजाम पूर्णतया परास्त नहीं हुआ था उसने सेनापति त्रिम्बकराव दाभादे को बाजीराव के विरुद्ध सहायता दी और इस पराजय के पश्चात भी मराठों में फूट डालने का प्रयत्न करता रहा। सन 1737 में निजाम को पुनः दिल्ली बुलाया गया और उसे आसफजा का पद देकर मराठों के विरुद्ध भेजा गया। भोपाल के निकट निजाम ने अपनी सेना बिछा दी। उसके पास बहुत अच्छा तोपखाना और लगभग डेढ़ लाख की बहुत बड़ी सेना थी। परंतु सेनापति और कई अन्य सरदारों की सहायता के ना होते हुए भी अस्सी हजार सैनिकों को लेकर बाजीराव ने निजाम को घेर कर फसा लिया। इस अवसर पर निजाम की भूल से उसकी सेना में भुखमरी और बर्बादी फैल गई। स्वयं बाजीराव ने कहा था "वह एक बुजुर्ग और अनुभवी व्यक्ति है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि उसने अपने को इस बुरी स्थिति में कैसे फंसा लिया, यह संपूर्ण भारत में उसके सम्मान को नष्ट कर देगा।" (He is an old and experienced man. I can not comprehend how he got himself in this difficulty, it will ruin him in the opinion of all India) अंत में बाजीराव प्रथम की बात सही सिद्ध हुई, बिना युद्ध के निजाम को 7 जनवरी 1738 में दुरई - सराय (Durai sarai) की संधि के लिए बाध्य होना पड़ा। जिसके अनुसार बेबस निजाम को - 1. संपूर्ण मालवा और नर्मदा तथा चंबल नदी के बीच की समस्त भूमि बाजीराव को देनी पड़ी। 2. 50 लाख रुपया बाजी राव को देना पड़ा। इस युद्ध के पश्चात निजाम ने बाजीराव से पूर्ण पराजय मान ली। बाजीराव प्रथम भारत में विख्यात हो गये क्योंकि उन्होंने उस समय मुगलों के भारत के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ और प्रसिद्ध सेनापति को बिना युद्ध के बुरी तरह से धूल चटाई थी। बाजीराव का नाम उत्तर भारत के उत्तर मुगलकालीन तथाकथित बादशाह रंगीला और संपूर्ण भारत के मुस्लिम शासकों के लिए दहशत का पर्याय बन गया था। डॉ. एच. एन. सिन्हा ने ठीक ही लिखा है कि "एक बार फिर आधुनिक भारत के इतिहास में बाजीराव ने नई आशाएं जगायीं, अवनत हिन्दू - जाति के सम्मुख महान् संभावनाएं प्रस्तुत कीं और एक बार फिर उनके आंतरिक झगड़ों को समाप्त करने का प्रयत्न किया।" लेखक - डॉ. आनंद सिंह राणा Read More
अपनेपन का प्रतीक है रक्षाबंधन का पर्व Date : 18-Aug-2024 भारत में रक्षाबंधन के पवित्र पर्व को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इसे रिश्तों में मिठास, विश्वास और प्रेम बढ़ाने वाला पर्व माना गया है। इस दिन बहनें, भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उसकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। इस दौरान भाई भी अपनी बहन को रक्षा का वचन देता है और क्षमता के अनुसार उपहार देता है। रक्षाबन्धन का पर्व भाई-बहिन के स्नेह का प्रतीक देश का एक प्रमुख त्योहार है। रक्षाबन्धन पर्व में रक्षासूत्र यानी राखी का सबसे अधिक महत्व है। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी पर्व भी कहते हैं। इस दिन ब्राह्मण गुरु द्वारा भी राखी बांधी जाती है। हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बांधते समय पण्डित संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं। जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है। येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः तेन त्वाम प्रतिबद्धनामी रक्षे माचल माचलः इस श्लोक का अर्थ है जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बांधता हूं। तुम अपने संकल्प से कभी भी विचलित मत होना। रक्षाबंधन का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता। लेकिन भविष्य पुराण में इस पर्व का वर्णन मिलता है। जब देवताओं और दानवों में युद्ध शुरू हुआ। तब देवताओं पर दानव हावी होने लगे। देवराज इन्द्र ने घबरा कर देवताओं के गुरू बृहस्पति से मदद की गुहार की। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिये फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है। महाभारत में ही रक्षाबन्धन से सम्बन्धित कृष्ण और द्रौपदी का एक और वृत्तान्त भी मिलता है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाडकर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। कहते हैं परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबन्धन के पर्व में यहीं से प्रारम्भ हुई। महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं। तब भगवान कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिये राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर विपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। इस समय द्रौपदी द्वारा कृष्ण को तथा कुन्ती द्वारा अभिमन्यु को राखी बांधने के कई उल्लेख मिलते हैं। स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी राजा बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नापकर राजा बलि को पाताल लोक में भेज दिया। कहते कि पाताल लोक में राजा बलि ने भक्ति के बल पर भगवान विष्णु से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। महाराष्ट्र राज्य में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं। इस अवसर पर समुद्र के स्वामी वरुण देवता को प्रसन्न करने के लिये नारियल अर्पित करने की परम्परा भी है। राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी या लूंबा बांधने का रिवाज है। रामराखी सामान्य राखी से भिन्न होती है। इसमें लाल डोरे पर एक पीले छींटों वाला फुंदना लगा होता है। यह केवल भगवान को ही बाँधी जाती है। चूड़ा राखी भाभियों की चूडियों में बांधी जाती है। राजपूत योद्धा जब शत्रु से युद्ध करने जाते थे तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम का तिलक लगाने के साथ हाथ में रेशमी धागा भी बांधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हे विजयश्री के साथ वापस ले आयेगा। उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहते हैं। ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते हैं। अमरनाथ की अतिविख्यात धार्मिक यात्रा गुरु पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर रक्षाबन्धन के दिन सम्पूर्ण होती है। कहते हैं इसी दिन यहां का हिमानी शिवलिंग भी अपने पूर्ण आकार को प्राप्त होता है। इस उपलक्ष्य में इस दिन अमरनाथ गुफा में प्रत्येक वर्ष मेले का आयोजन भी होता है। नेपाल के पहाडी इलाकों में ब्राह्मण एवं क्षत्रीय समुदाय में रक्षा बन्धन गुरू के हाथ से बांधा जाता है। लेकिन दक्षिण सीमा में रहने वाले भारतीय मूल के नेपाली भारतीयों की तरह बहन से राखी बंधवाते हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने 1905 में बंगाल विभाजन का विरोध करने के लिए इस त्योहार को मनाने को प्रोत्साहित किया था। वह इस त्योहार के माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच एक मजबूत संबंध बनाना चाहते थे। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे के हाथों पर राखी बांधने के लिए प्रोत्साहित किया, जो भाईचारे और अपने समुदाय के लिए प्यार का प्रतीक है। इस त्योहार का जश्न ब्रिटिश शासकों और बंगाल के विभाजन और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मतभेदों के खिलाफ एक शक्तिशाली प्रयास था। रक्षाबन्धन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता का सांस्कृतिक उपाय रहा है। विवाह के बाद बहन पराये घर में चली जाती है। इस बहाने प्रतिवर्ष अपने सगे ही नहीं अपितु दूरदराज के रिश्तों के भाइयों तक को उनके घर जाकर राखी बांध कर अपने रिश्तों का नवीनीकरण करती रहती है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी एक सूत्रता के रूप में इस पर्व का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार जो कड़ी टूट गयी है उसे फिर से जागृत किया जा सकता है। रक्षा बंधन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति इतनी लचीली है कि इस में हर संस्कृति समाहित होती चली जाती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, सौराष्ट्र से असम तक देखें तो यहां के लोग प्रतिदिन कोई न कोई त्योहार मनाते मिलेंगे। इन त्योहारों के मूल में आपसी रिश्तों के बीच मधुरता घोलने एवं सरसता लाने की भावना रहती है। भाई-बहन के बीच प्यार, मनुहार व तकरार सामान्य सी बात है। लेकिन रक्षाबंधन के दिन बहन द्वारा भाई के हाथ में बांधे जाने वाले रक्षा सूत्र में भाई के प्रति बहन के असीम स्नेह और बहन के प्रति भाई के कर्तव्यबोध को पिरोया गया है। लेखक: रमेश सर्राफ धमोरा Read More
दामोदर गणेश बापट : प्राचीन परंपराओं और आधुनिक गणितीय अवधारणाओं को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई Date : 17-Aug-2024 प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित दामोदर गणेश बापट, जिन्होंने अपना जीवन कुष्ठ रोगियों के उपचार और सेवा के लिए समर्पित कर दिया | आपको बता दे की वे एक प्रमुख भारतीय गणितज्ञ भी थे, जो 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में गणित के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने भारतीय गणित की प्राचीन परंपराओं और आधुनिक गणितीय अवधारणाओं को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका काम गणित के विभिन्न क्षेत्रों में फैलता है, और उन्हें भारतीय गणित के विकास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति माना जाता है| "बापट ने पिछले साढ़े चार दशक से छत्तीसगढ़ राज्य के जांजगीर-चांपा जिले के सोठी गांव में भारतीय कुष्ठ निवारक संघ (बीकेएनएस) द्वारा संचालित आश्रम में कुष्ठ रोगियों के उपचार और सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। महाराष्ट्र के अमरावती जिले में जन्मे बापट अपने पिता के निधन के बाद 1970 में छत्तीसगढ़ के जशपुर (अब एक जिला) चले गए और आरएसएस से संबद्ध वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ गए। 1972 में चांपा में बीकेएनएस के माध्यम से कुष्ठ रोग के क्षेत्र में डॉ. सदाशिव कात्रे के काम से प्रभावित होकर बापट बाल कल्याण आश्रम में शामिल हो गए और तब से वे इसके साथ काम कर रहे हैं। बापट को 2018 में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। खास बात यह है की बापट ने अपना शरीर दान कर दिया था, इसलिए मरने उपरांत उनके पार्थिव शरीर को बाद में छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सीआईएमएस), बिलासपुर को सौंप दिया गया। श्री बापट ने जीवन भर कुष्ठ रोगियों की सेवा करके अनुकरणीय कार्य किया है, जो दूसरों के लिए सदैव प्रेरणादायी रहेगा।" Read More
17 अगस्त : लंदन में अंग्रेज अधिकारी वायली को गोली मारी थी Date : 17-Aug-2024 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी मदन लाल ढींगरा का बलिदान स्वत्व और स्वाभिमान रक्षा के लिये क्राँतिकारियों ने केवल भारत की धरती पर ही अंग्रेज अधिकारियों को गोली मारकर मौत की नींद नहीं सुलाया अपितु लंदन में भी क्रूर अंग्रेजों के सीने में गोली उतारी है । क्राँतिकारी मदन लाल ढींगरा ऐसे ही क्राँतिकारी थे जिन्होंने लंदन में भारतीयों का अपमान करने वाले अधिकारी वायली के चेहरे पर पाँच गोलियाँ मारकर ढेर कर दिया था । सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी मदनलाल धींगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को पंजाब प्राँत के अमृतसर नगर में हुआ था । परिवार की पृष्ठभूमि सम्पन्न और उच्च शिक्षित थी । पिता दित्तामल जी सिविल सर्जन थे और आर्यसमाज से जुड़े थे । पर स्थानीय अंग्रेज अधिकारियों के भी विश्वस्त माने जाते थे । जबकि माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं भारतीय संस्कारों में रची बसी थीं । वे आर्यसमाज के प्रवचन आयोजनों में नियमित श्रोता थीं। इस प्रकार मदनलाल ढींगरा को बचपन से ही अंग्रेज और भारतीय परंपरा दोनों का परिचय मिल गया था । लेकिन जब विद्यालय गये तो वहाँ उन्होंने भारतीय विद्यार्थियों के साथ अपमान जनक व्यवहार देखा जिसका प्रतिरोध किया । शिकायत घर पहुँची । पिता ने समन्वय बिठाकर शिक्षा प्राप्त करने की सलाह दी । इसी मानसिक द्वन्द में किसी प्रकार विद्यालयीन शिक्षा पूरी हुई और आगे पढ़ने केलिये लाहौर महाविद्यालय पहुँचे। जहाँ के वातावरण में वे समन्वय न बना सके । मदनलाल महाविद्यालय से निकाल दिये गये । वे पिता की पोजीशन में वाधा न बनना चाहते थे अतएव घर छोड़कर चले गये । जीवन यापन के लिये उन्होंने पहले क्लर्क की नोकरी की पर उन्हें वहाँ भी अपने स्वाभिमान पर आघात अनुभव हुआ और नोकरी छोड़कर मुम्बई आ गये जहाँ तांगा चलाने लगे । साथ ही एक कारखाने में भी नौकरी कर ली । जहाँ श्रमिकों के शोषण से उद्वेलित हुये और उन्होंने एक श्रमिक संगठन बना लिया । इस संगठन के माध्यम से वे प्रबंधकों द्वारा श्रमिकों के साथ सम्मान जनक व्यवहार करने का अभियान चलाने लगे । किन्तु बात न बनी । वे प्रबंधन की किरकिरे बने और निकाल दिये गये । कुछ दिन यूँ ही बीते अंततः परिवार ने उनसे संपर्क साधा और समझा बुझाकर आगे पढ़ने के लिये लंदन भेज दिया । मदनलाल जी 1906 में पढ़ने के लिये इंग्लैण्ड गये जहाँ यूनिवर्सिटी कालेज लन्दन की अभियांत्रिकी शाखा में प्रवेश लिया। यह वो समय था जब लंदन में पढ़ने वाले भारतीय विद्यार्थियों में राष्ट्र भाव अंगड़ाई ले रहा था । वे भारतीय विद्यार्थियों को हीन समझने की अंग्रेजी मानसिकता से उद्वेलित हो रहे थे । इन विद्यार्थियों में सुप्रसिद्ध राष्ट्रवादी विचारक विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा बड़े लोकप्रिय थे और एक प्रकार से समन्वय थे । समय के साथ मदनलाल ढींगरा इनके सम्पर्क में आये। और सावरकर जी द्वारा गठित संस्था अभिनव भारत से जुड़ गये । इसी क्रान्तिकारी संस्था में उन्होंने शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण लिया । लंदन का इण्डिया हाउस भारतीय विद्यार्थियों की क्रियाकलापों का केन्द्र हुआ करता था। मदनलाल ढींगरा इसी इंडिया हाउस में रहते थे । इन्ही दिनों खुदीराम बोस, कन्हाई लाल दत्त, सतिन्दर पाल और काशी राम जैसे क्रान्तिकारियों को मिले मृत्युदण्ड ने इन विद्यार्थियों को मानों विचलित कर दिया । इससे भारतीय युवाओं में रोष उत्पन्न हुआ । यह समाचार अंग्रेज अधिकारियों से छिपे न रहे । लंदन में पढ़ रहे भारतीय विद्यार्थियों की गतिविधियों को सीमित करने के कुछ आदेश भी निकले । इससे सावरकर जी और मदनलाल धींगरा जैसे क्राँतिकारी और उद्वेलित हुये । प्रतिशोध लेने केलिये अंग्रेज अधिकारी विलियम हट कर्जन वायली को मारने की योजना बनाई गई । इसके लिये इंडियन नेशनल एसोसिएशन के वार्षिक आयोजन का दिन निश्चित किया गया । वह 1 जुलाई 1909 की शाम थी । वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिये जैसे ही विलियम हट कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ सभागार में आया, मदनलाल ढींगरा ने उसके चेहरे पर पाँच गोलियाँ दाग दीं। और छठी गोली स्वयं को भी मारनी चाही किन्तु पकड़ लिये गये । बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया और मुकदमा चला । उन्होने पेशी के दौरान बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि- "मुझे प्रसन्नता है कि मेरा जीवन भारत राष्ट्र के स्वाभिमान रक्षा के लिये समर्पित हो रहा है" । यह मुकदमा केवल बाइस दिन में पूरा हो गया और 23 जुलाई 1909 को लंदन की बेली कोर्ट ने उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया जिसके अनुसार 17 अगस्त 1909 को लन्दन की पेंटविले जेल में उन्हें फाँसी दी गई। इस प्रकार भारत राष्ट्र के स्वत्व जागरण के लिये उन्होंने अपने जीवन का बलिदान कर दिया । लेखक - रमेश शर्मा Read More
शिक्षाप्रद कहानी:- सत्य की ज्योति Date : 17-Aug-2024 ऐसा माना जाता है कि महेंद्र सम्राट अशोक का पुत्र था | कोई-कोई इतिहासकार इसका खंडन भी करते हैं | अस्तु | महेंद्र विद्रोही हो गया था | वह अधिकार और एश्वर्य में इतना उन्मत्त हो गया था कि उसे धर्म राज्य के सिद्धांतों का तनिक भी ध्यान नहीं रह गया था | दिन दोपहर प्रजा पर मनमाना अत्याचार करना उसका तथा उसके सैनिकों और आश्रित अधिकारियों का कार्यक्रम हो चला था | ऐसा लगता था कि प्रजा उसके विरुद्ध ही विद्रोह करने वाली है | यह सारा समाचार महामंत्री राधवागुप्त ने सम्राट अशोक के धर्म सिंहासन के सम्मुख नत मस्तक होकर निवेदन किया था | यह समाचार सुनकर राजसभा में उपस्थित मंत्रिगन तथा अन्य सभासद विस्मित हो उठे | राजभवन में सन्नाटा छा गया | सम्राट के नेत्र क्रोध से लाल हो गये थे | अहिंसक सम्राट सबकुछ सह सकता था, पर प्रजा के अहित में तल्लीन रहने वालों को दंड देने में वह कभी आगा-पीछा नहीं करता था | महेंद्र का यह महान अपराध था | सम्राट के आदेश से महेंद्र को राजसभा में उपस्थित किया गया | वह अपराधी कक्ष में खड़ा हो गया | सम्राट ने कहा –“ मुझे तुमसे इस प्रकार के कुत्सित आचरण कि अपेक्षा नहीं थी | तुमने सम्राट चन्द्रगुप्त के राज्य सिंहासन को लांछित किया है | जानते हो इस अपराध का दंड ? जानते हो प्रजा की शांति को भंग का परिणाम ?” “मृत्यु...... मेरा आचरण वास्तव में प्रजा के लिए अहितकर हो चला था देव ! किन्तु मृत्यु दंड देने से पहले सात दिन के अवकाश की याचना करता हूँ | यह आपके राजकुमार की याचना नहीं पाटलिपुत्र के एक अपराधी नागरिक की याचना है |” महेंद्र ने कहा | छठे दिन कारागार के अधिकारी ने महेंद्र को स्मरण कराते हुए एक बार कहा- “अपराधी! आज छटा दिन है | कल तुम्हारे समस्त राग रंग समाप्त हो जायेंगे | महेंद्र उसके कथन को सुनकर अंधकारपूर्ण कालकोठरी की दीवार की ओर देखने लगा | एक दरार से उसने भगवती गंगा की धवलिमा का दर्शन किया, उस पर अस्तायमान सूर्य की लालिमा बिखर रही थी | वह झरोखे के समीप आ गया और सांध्य शांति में उसने अद्भुत प्रकाश देखा | “मुझको सत्य कि ज्योति प्राप्त हो गयी है | मैंने मृत्यु को जीत लिया है |” यह कहता हुआ वह आनंद से नाच उठा | उन सात दिनों में महेंद्र का काया पलट हो गया था | उसे बोध हो गया था | सम्राट को भी इसकी सूचना मिल गयी थी | वे कारागार में उसकी कोठरी में गए | “तुम अब वास्तव में मुक्त हो गये महेंद्र! “ सम्राट अशोक उसकी बातों से प्रसन्न थे | वे अंतिम विदा देने आये थे | सूर्य अस्त हो गया | प्रहरी ने एक टिमटिमाता दीपक सोपान पर रखकर भारत सम्राट का अभिवादन किया | महेंद्र बोला-“हाँ, मुझे अमरता मिल गयी है | सम्यक सम्बोधि की मुझे प्राप्ति हो गयी है | मैंने धर्म ज्योति देखी है |” यह कहकर वह सम्राट के चरणों में गिर गया | “पाटलिपुत्र का राजप्रासाद प्रतीक्षा कर रहा है महेंद्र! “ सम्राट अशोक ने उसे मुक्ति सन्देश सुनाया | “नहीं सम्राट ! अब तो पहाड़, वन, निर्जन स्थान ही मेरे आश्रम हैं | मैं धर्म की ज्योति से जनता को समुत्तेजित करूंगा | यह प्रजा के कल्याण का मार्ग है |” वह कारागार से निकलकर पहाड़ की ओर चला गया | “तुम धन्य हो श्रमण |” सम्राट अशोक सादर नतमस्तक था | गौरतलब है कि महेंद्र ने बाद में श्रीलंका सहित एशिया के विभिन्न देशों में धर्मं का प्रचार किया और अपना पूरा जीवन ही भ्रमण करते हुए बिताया | Read More