रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं मानी जाती है। जिसके बिना मनुष्य का जीवन बहुत मुश्किल है। इसमें रोटी सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि रोटी के बिना तो मनुष्य जिन्दा भी नहीं रह सकता है। खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित किया जाना है कि हर व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित और पौष्टिक भोजन मिल सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में हर दस में से एक व्यक्ति दूषित भोजन का सेवन करने से बीमार पड़ जाता है। जो कि सेहत के लिए एक बड़ा खतरा है। कोरोना महामारी के संक्रमण को देखते हुए इस बार विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस संक्षिप्त रूप में मनाया जाएगा। जिसमें लोगों को सेहत से जुड़े मुद्दों पर ऑनलाइन एक-दूसरे के साथ बातचीत करने का मौका मिलेगा।
इस बार हम छठवां विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मना रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इससे खाद्य सुरक्षा लेकर लोगों में जागरुकता फैलाई जा सकती है और विश्व स्तर पर खाद्य पदार्थों से होने वाली बीमारियों को भी ध्यान में लाया जा सकता है। इस दिन को मनाने के पीछे खाद्य सुरक्षा के प्रति लोगो को जागरूक करने का उद्देश्य था। जो खराब भोजन का सेवन करने की वजह से गंभीर रोगों के शिकार बन जाते हैं।
भोजन की कमी व दूषित भोजन खाने से प्रतिवर्ष हजारों लोगों की जान चली जाती है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और खाद्य और कृषि संगठन को दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों का नेतृत्व करने और पौष्टिक खाने के प्रति लोगों को जागरुक करने की जिम्मेदारी दी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दिसंबर 2018 में पहली बार खाद्य और कृषि संगठन के सहयोग से विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाया था। इसके बाद पहली बार 7 जून 2019 में विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाया गया था। तब से हर वर्ष 7 जून को विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाया जाने लगा है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी पूर्व में अपने मन की बात कार्यक्रम में देश की जनता से बात करते हुए लोगों से खाने की बर्बादी रोकने की अपील की थी। उन्होने कहा कि ऐसा करना गरीबों के साथ अन्याय व समाजद्रोह है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि आपने कभी सोचा है कि हम जो जूठन छोड़ देते हैं। उससे हम कितने गरीबों का पेट भर सकते है? उन्होने कहा था कि इस पर सामाजिक जागरूकता बढनी चाहिए।
भारत में अनाज को अन्नदेव का दर्जा प्राप्त है। यही कारण है कि हमारे देश में भोजन झूठा छोडना या उसका अनादर करना पाप माना जाता है। मगर आधुनिकता के चक्कर में हम अपने पुराने संस्कार भूल गए हैं। हमारे यहां शादियों, उत्सवों या त्यौहारो में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इसके उपरांत भी हम इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में फेंक है। कई बार तो घरों के आसपास फेंके गए भोजन से उठने वाली दुर्गंध एवं सड़ांध वहां रहने वालों के लिए परेशानी खड़ी कर देती हैं। शादियों में खाने की बर्बादी को लेकर भारत सरकार भी चिंतित है। खाद्य मंत्रालय ने कहा है कि वह शादियों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार कर रहा है। इस बारे में विवाह समारोह अधिनियम, 2006 कानून भी बनाया गया है। हालांकि इस कानून का कड़ाई से कहीं भी पालन नहीं किया जाता है।
भारत में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है उसका एक तिहाई बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे करोड़ो लोगों की खाने की जरूरत पूरी हो सकती है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में बढ़ती सम्पन्नता के साथ ही लोग खाने के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं। खर्च करने की क्षमता के साथ ही खाना फेंकने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। विश्व खाद्य संगठन के अनुसार देश में हर साल पचास हजार करोड़ रूपये का भोजन बर्बाद चला जाता है। एक ऑकलन के मुताबिक बर्बाद होने वाले भोजन की धनराशि से पांच करोड़ बच्चों की जिदगी संवारीं जा सकती है।
विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य अपव्यय को रोके बिना खाद्य सुरक्षा सम्भव नहीं है। इस रिपोर्ट में वैश्विक खाद्य अपव्यय का अध्ययन पर्यावरणीय दृष्टिकोण से करते हुए बताया है कि भोजन के अपव्यय से जल,जमीन और जलवायु के साथ साथ जैव-विविधता पर भी बेहद नकारात्मक असर पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक हमारी लापरवाही के कारण पैदा किए जाने वाले अनाज का एक तिहाई हिस्सा बर्बाद कर दिया जाता है। देश में एक तरफ करोड़ो लोग खाने को मोहताज है। वहीं लाखों टन खाना प्रतिदिन बर्बाद किया जा रहा है।
हमारे देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ रुपये होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारे देश में 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बर्बाद हो जाता है। क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास पर्याप्त भंडारण की सुविधा नहीं है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है। साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण नष्ट हो जाता है। उतनी राशि से गांवो में पांच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं।
आजकल कई शहरो में समाजसेवी लोगो ने मिलकर रोटी बैंक बना रखा हैं। रोटी बैंक से जुड़े कार्यकर्ता शहर में घरो से व विभिन्न समारोह स्थलों से बचे हुये भोजन को एकत्रित कर जरूरत मंद गरीबों तक पहुंचाते हैं। इससे जहां भोजन की बर्बादी रुकती हैं वहीं जरूरतमंदों को भोजन भी उपलब्ध होता है। इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अभियान सोंचे, खाए और बचाए भी एक अच्छी पहल है। इसमें शामिल होकर की भोजन की बर्बादी रोकी जा सकती है। वर्तमान समय में समाज के सभी लोगों को मिलकर भोजन की बर्बादी रोकने के लिये सामाजिक चेतना लानी होगा। तभी भोजन की बर्बादी रोकने का अभियान सफल हो पायेगा।
खाने की बर्बादी रोकने की दिशा में देश में महिलाएं बहुत कुछ कर सकती हैं। महिलाओं को अपने घर के बच्चों में बचपन से यह आदत डालनी होगी कि जितनी भूख हो उतना ही खाना लो। एक-दूसरे से बांट कर खाना भी भोजन की बर्बादी को बड़ी हद तक रोक सकता है। भोजन की बर्बादी रोकने के लिए हमें अपनी आदतों को सुधारने की जरूरत है। धार्मिक लोगों एवं स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।
लेखक:- रमेश सर्राफ धमोरा
देश लोकतंत्र का महापर्व मनाकर फुरसत हो चुका है। अब नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह को देखने का इंतजार है। इस बार का आम चुनाव कई मायने में खास रहा। सात चरणों में हुए चुनाव के दौरान देश ने अपार गर्मी झेली। मतदाता तेज धूप में नेताओं के भाषण सुनते रहे। चार जून को नतीजे आए। इन नतीजों ने कुछ हद तक चौंकाया भी। पहली बार एग्जिट पोल के अनुमान धराशायी हो गए। जनादेश आने से एक दिन पहले तीन जून को भारत निर्वाचन आयोग ने नई दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन में अपने कीर्तिमान भी गिनाए।
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने सगर्व कहा कि पहली बार आम चुनाव में 31 करोड़ महिलाओं ने मताधिकार का प्रयोग किया। इस बार घर से ही वोटिंग करने का भी रिकॉर्ड बना है। साथ ही इस बार चुनाव में 31 करोड़ 20 लाख महिलाओं सहित 64 करोड़ 20 मतदाताओं के हिस्सा लेने के साथ विश्व रिकॉर्ड बना है। यह आंकड़ा जी-7 देशों के मतदाताओं का 1.5 गुना जबकि यूरोपीय संघ के 27 देशों के मतदाताओं का 2.5 गुना है। लोकसभा चुनाव-2024 पर कुमार ने काफी कुछ कहा। उन्होंने कहा कि यह उन आम चुनावों में से एक है, जिसमें हमने हिंसा नहीं देखी। उन्होंने सुखद संदेश दिया कि अब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी।
यह सनद किया जाए कि भारत निर्वाचन आयोग ने अठारहवीं लोकसभा के लिए नवनिर्वाचित सदस्यों की सूची राष्ट्रपति को सौंप दी है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार, निर्वाचन आयुक्त (द्वय) ज्ञानेश कुमार और डॉ. सुखबीर सिंह संधू छह जून को शाम साढ़े चार बजे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने पहुंचे। उन्होंने राष्ट्रपति को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के संदर्भ में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अधिसूचना की एक प्रति सौंपी। इसमें लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों के नाम शामिल हैं। इसके बाद तीनों राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आशीर्वाद लेने उनके समाधि स्थल राजघाट पहुंचे। राजघाट पर राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद आयोग का बयान आया। उसे केंद्र सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने जारी किया।
पीआईबी की वेबसाइट पर आयोग का अविकल बयान-''हम यहां राष्ट्र द्वारा हमें सौंपे गए पवित्र कार्य, 18वीं लोकसभा के आम चुनाव सम्पन्न कराने के बाद राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए खड़े हैं। हम भारत के लोगों की इच्छा को लगभग अहिंसक तरीके से उत्प्रेरित करने के बाद अपने दिल में विनम्रता लिए हुए यहां खड़े हैं।''
''लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है'', यह वह स्पष्ट प्रतिबद्धता थी जिसके साथ 16 मार्च, 2024 को 18वीं लोकसभा के चुनावों की घोषणा की गई थी। चुनावी प्रक्रिया को हिंसा से मुक्त रखने की इस प्रतिज्ञा के पीछे हमारी प्रेरणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे। उन्होंने इंसान के बीच समानता की वकालत की और सभी के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों की वकालत की।
महात्मा के विचारों में, वयस्क मताधिकार '' सभी प्रकार के वर्गों की सभी उचित आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम बनाता है''। मतदान केन्द्रों पर उत्सव के मूड में लंबी कतारें और मतपत्र के माध्यम से अपने भविष्य का फैसला करने का दृढ़ संकल्प महात्मा के पोषित आदर्शों और भारत की सभ्यतागत विरासत का प्रमाण था।
आयोग ने पूरे दिल, दिमाग और पूरी ईमानदारी के साथ यह सुनिश्चित करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है कि सबसे आम भारतीय का मताधिकार किसी भी कीमत पर नकारा न जाए, बल्कि इसे सख्ती से सक्षम बनाया जाए, कि दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रतियोगिता लोकतांत्रिक अधिशेष पैदा करे, और हमारे विशाल परिदृश्य में शामिल करोड़ों लोगों के गहन कार्यों में किसी भी रूप में हिंसा की थोड़ी सी भी छाया पड़ने की अनुमति न हो। जम्मू-कश्मीर और मणिपुर समेत भारत के सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने अपने परिपक्व आचरण से एक मिसाल कायम की है जो भविष्य के लिए शुभ संकेत है। शांति और विकास का रास्ता गोली नहीं बल्कि मतपत्र है।
हम इस शपथ के साथ अपनी बात समाप्त करते हैं कि भारत के निर्वाचन आयोग की राष्ट्र के प्रति सेवा, जो अब अपने 76वें वर्ष में है, अडिग समर्पण के साथ जारी रहेगी। हमने अफवाहों और निराधार संदेहों के साथ चुनावी प्रक्रिया को दूषित करने के सभी प्रयासों को खारिज कर दिया, जो अशांति भड़का सकते थे। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपार आस्था रखने वाले आम आदमी की 'इच्छा' और 'बुद्धि' की जीत हुई है। हम नैतिक और कानूनी रूप से स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव आयोजित करके हमेशा इसी भावना को बनाए रखने के लिए बाध्य हैं। जय हिंद!'' आयोग के इस अविकल बयान के बाद इसे भी संसदीय इतिहास में दर्ज किया जाना चाहिए कि इस बार आम चुनाव में 65.79 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।
लेखक:- मुकुंद
हर सुहागिन महिला अपने सुहाग की रक्षा के लिए ईश्वर से कामना करती है। पति की लंबी आयु की दुआ करने के साथ-साथ वह उसकी तरक्की के लिए कई उपवास भी रखती है। ऐसे में वट सावित्री व्रत का महत्व अधिक बढ़ जाता है। ये उपवास हर सुहागिन महिला के लिए खास होता है। वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिनें पूरे विधि-विधान से पूजा करती है। इस दौरान कुछ महिलाएं निर्जला उपवास भी रखती है। इस दिन वट वृक्ष की पूजा का खास महत्व है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अनूठे इतिहास में कई पहली बार शामिल हैं1968 में स्वीडन द्वारा मानवता के पर्यावरणीय प्रभाव
पर एक सम्मेलन के लिए प्रस्तावित, यह 1972 में 4 साल की योजना और 30 मिलियन डॉलर के निवेश के बाद सामने आया,
जिसका नेतृत्व कनाडा के मौरिस स्ट्रॉन्ग ने किया 1974 में "केवल एक पृथ्वी" के नारे के साथ उद्घाटन समारोह ने एक नए
वैश्विक आंदोलन को चिह्नित किया।
कल्याण में प्रकृति की जटिल भूमिका के प्रति गहरी समझ को बढ़ावा देता है।
अपरिहार्य संसाधनों के बारे में शिक्षित करता है।
ड्राइविंग एक्शन:हमारी वायु, भूमि और जल को खराब करने वाले मुद्दों पर प्रकाश डालकर, यह हमारे अस्तित्व के लिए
खतरों से निपटने के लिए सहयोगात्मक प्रयासों को प्रेरित करता है अंत में, विश्व पर्यावरण दिवस हमें ग्रह की रक्षा करने
करने के लिए सार्थक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
"पर्यावरण हमारे लिए एक उपहार है इसे बचाएं और सुरक्षित्त रखने का संकल्प लें”
पर्यावरण जीवों और उनके जीवन का आधार और एक अनिवार्य घटक है। उसके बिना जीवन अकल्पनीय है । हमारा जीवन-चक्र पर्यावरण में स्थित है और पर्यावरण द्वारा ही आयोजित होता है। हम उसी में जन्म लेते हैं, जीते हैं और मृत्यु के बाद उसी में विलीन हो जाते हैं। हम वनस्पतियों और अन्य प्राणियों की ही तरह पर्यावरण के अंग होते हैं परंतु अपने अहंकार में हम अपनी इस मौलिक सदस्यता को भूल कर अपने को पर्यावरण से अलग तत्व के रूप में देखते हैं। हम मनुष्य और पर्यावरण की दो अलग – अलग कोटियाँ या श्रेणियां बना लेते हैं जो भिन्न मान ली जाती हैं। इनके बीच का रिश्ता भी उपभोक्ता (कंज्यूमर) और उपभोग्य वस्तु ( कंज्यूमेबल ऑब्जेक्ट) मान बैठे हैं। पर्यावरण हमारे लिए एक संसाधन होता गया है जिनमें कुछ नवीकरणीय भी होते हैं और कुछ समाप्त हो कर उस रूप में वापस नहीं मिलते। अपनी संपदाओं के कारण धरती को वसुंधरा कहते हैं। वह हमारे लिए सुख के स्रोत उपलब्ध कराती है।
पर्यावरण में मौजूद विविध पदार्थों, ऊर्जा के श्रोतों ( जैसे – कोयला, पेट्रोल आदि), जल संसाधनों, भिन्न-भिन्न गुणवत्ता के भूमि रूपों (जहां किस्म-किस्म के अन्न, फल, लकड़ी, औषधि और अन्य पदार्थ पैदा होते हैं) को लेकर हम बड़े प्रसन्न होते हैं । पर पर्यावरण की इस सम्पदा को सिर्फ निष्क्रिय निर्जीव वस्तुओं के संसाधन के रूप में मान बैठना भ्रम है। इसलिए ऐसा सोचना ठीक तो है परन्तु यह आधी सच्चाई है। पर्यावरण को सिर्फ संसाधन मान बैठना न सही है न वांछित। पर्यावरण से हमारा पारस्परिक रिश्ता है। वह हमें रचता है और हमसे अपेक्षा है कि हम उसकी रक्षा करें। इस तरह पृथ्वी पर एक जीवन-चक्र चलता सदैव चलता रहता है।
इन सबको देखते हुए ही धरती को माता कहा गया– माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या: । पृथ्वी सभी प्राणियों का बिना भेद-भाव के माता की तरह भरण-पोषण करती है। आज इसे भुला कर हम निर्मम भाव से इस पर्यावरण को अपने अविवेकपूर्ण आचरण द्वारा तरह-तरह से आघात पहुंचा कर लगातार उसका हृदय छलनी कर रहे हैं और शरीर नष्ट-भ्रष्ट कर रहे हैं । ऐसा करते हुए अपने ही पैरों पर ही कुल्हाड़ी चला रहे हैं। पेड़ कटते जा रहे हैं, वन जलाए जा रहे हैं, कंक्रीट के जंगल उग रहे हैं, और रासायनिक खाद से धरती की उर्वराशक्ति नष्ट हो रही है । हमारी भौतिकवादी दृष्टि कितनी दूषित हो चुकी है कि हम प्रकट सत्य का भी प्रत्यक्ष नहीं कर पाते हैं और न वह क्षति ही महसूस कर पाते हैं जिसकी भरपाई संभव ही नहीं है । ग्रीन गैस का उत्सर्जन जिस तरह हो रहा है और कार्बन डाई आक्साइड जिस तरह बढ़ रहा है वह सब जीवन के विरुद्ध है। पर्यावरण की ओर से हमें लगातार चेतावनी मिल रही है और हम हैं कि उसे अनसुना करते रहे हैं। ग्लेशियर का पिघलना, अति वर्षा, सूखा, बाढ़ और गर्मी का अत्याधिक बढ़ना ऐसे ही संकेत हैं।
आज धरती और पर्यावरण की सीमाओं को बिना पहचाने उसका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। ऐसा करते हुए हम यह अकसर भूल जाते हैं कि हमारा आहार, हमारी सांसें और हमारे कार्य-कलाप सब कुछ पर्यावरण से ही उधार लिया हुआ है। यदि पर्यावरण इसमें कोई कोताही करता है तो परिस्थिति विकट हो जाती है। कुछ ही दिनों पहले कोविड – 19 की महामारी के दौरान हम सबने विश्व भर में यह बात अपनी आंखों देखी कि पर्यावरण के साथ रिश्ता कितना नाजुक होता है। उस दौरान ऑक्सीजन की कालाबाजारी तक हुई थी। मनुष्य की पर्यावरण के साथ रिश्तों में भागीदारी का सबसे घातक पक्ष प्रदूषण है जो वायु, जल, पृथ्वी सब में तेज़ी से फैलता जा रहा है। विकास के साथ तरह–तरह के कूड़ा-कचरा की मात्रा भी तेज़ी से बढ़ रही है जिसके निस्तारण की कोई माकूल व्यवस्था हम नहीं कर सके हैं।
हमारी धरती हमारा भविष्य है। हम लोगों को पर्यावरण संरक्षित करने की कोशिश करनी होगी। धरती और उसकी परिस्थितिकी को बचाना हमारा पहला कर्तव्य बनता है। जैव विविधता को बचाना और जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से बचाना मनुष्यता की रक्षा के लिए ज़रूरी है । धरती हमें जीने का अवसर देती है उसकी रक्षा और हरी-भरी दुनिया के लिए हर स्तर पर प्रयास ज़रूरी है। साइकिल का उपयोग, सार्वजनिक वाहन का उपयोग, वस्तुओं का यथा सम्भव पुनः उपयोग, वृक्षारोपण, और स्थानीय सामग्री का अधिकाधिक उपयोग आदि कुछ छोटी पहल भी हरित आर्थिकी (ग्रीन इकॉनमी) का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक होगी।
लेखक:- गिरीश्वर मिश्र
