"स्व के लिए पूर्णाहुति : श्रीयुत माधवराव सदाशिव गोलवलकर जी" (परम श्रद्धेय गुरु जी पुण्यतिथि पर आत्म मंथन) Date : 08-Jun-2024 "यह हिंदू राष्ट्र है, इस राष्ट्र का दायित्व हिंदू समाज पर ही है। भारत का दुनिया में सम्मान या अपमान हिंदुओं पर ही निर्भर है, हिंदू समाज का जीवन वैभवशाली होने से इस राष्ट्र का गौरव बढ़ने वाला है। यह निश्चय पूर्वक समझकर उस सत्य को संघ ने प्रतिपादित किया है, कितने वर्षों से हम यह करते आए हैं, तथा किसी के मन में इस विषय में कुछ भ्रांति रहने का कारण नहीं है-गुरुजी।" परम श्रद्धेय आदरणीय "गुरुजी" के उक्त विचारों को तथाकथित सेक्यूलर और भ्रमित हिन्दू समाज को भली-भाँति समझना होगा और अब तो लोक सभा के चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो ही गया है कि हिन्दू धर्म और समाज के विरुद्ध किस तरह से क्रिस्लामी (क्रिश्चियन और इस्लाम) और कांग्रेस के सभी सहयोगी लामबंद हुए हैं!!!सनातन के विनाश की बात करने वाले लोगों ने किस तरह तथाकथित सेक्यूलर हिन्दुओं को बहकाकर अपनी कामयाबी हासिल की है उसका उदाहरण अयोध्या (फैजाबाद) से अच्छा क्या हो सकता है!!!सदियों से यही होता आ रहा है, कि हिन्दू सस्ते प्रलोभनों से बिखर जाता है और सत्ता हिन्दू विरोधी शक्तियों के हाथ चली जाती है। हिन्दुओं का क्या गुनाह है? हिन्दुओं का गुनाह यह है कि जरुरत ज्यादा वसुधैव कुटुम्बकम् का राग अलापना, अहिंसा परमो धर्म : का दर्शन बुलंद करना, अतिथि देवो भव के आदर्श बघारना?क्या सबका साथ और सबका विकास का विचार रखना? कभी कभी लगता है कि ये सब दर्शन हिन्दुओं पर बहुत भारी पड़े हैं! सबने इसी कारण हिन्दुओं को मंदिर का घंटा समझकर खूब बजाया है और अभी बजा रहे हैं? हिन्दू अपने ही देश में ठगा गया है और सबसे दुखद पहलू यह है कि यह ठगी तथाकथित सेक्यूलर हिन्दुओं ने की है और बाद में अपकारी शक्तियों ने इनकी भी तरीके से बैंड बजाई है। एतदर्थ गुरुजी के विचारों को आत्मसात कर हिन्दू समाज को सतर्क होकर एकजुट रहने की आवश्यकता है, तभी भारत और हिन्दू समाज का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा। "गुरुजी" के अमृत विचार-: अनुशासन पर विचार: 1. मानव स्वयं पर अनुशासन के कठोरतम बंधन तब बड़े आनन्द से स्वीकार करता है, जब उसे यह अनुभूति होती है कि उसके द्वारा कोई महान कार्य होने जा रहा है। आत्मविश्वास पर विचार: 2. मनुष्य के आत्मविश्वास में और अहंकार में अंतर करना कई बार कठिन होता है। घृणा पर विचार: 3. मानव के हृदय में यदि यह भाव आ जाय कि विश्व में सब-कुछ भगवत्स्वरूप है तो घृणा का भाव स्वयमेव ही लुप्त हो जाता है। जीवन पर विचार: 4. हमारी मुख्य समस्या है – जीवन के शुद्ध दृष्टिकोण का अभाव और इसी के कारण शेष समस्याएँ प्रयास करने पर भी नहीं सुलझ पातीं। निर्भयता/निडरता पर विचार: 5. मनुष्य के लिए यह कदाचित अशोभनीय है कि वह मनुष्य- निर्मित संकटों से भयभीत रहे। प्रगति पर विचार: 6. इस बात से कभी वास्तविक प्रगति नहीं हो सकती कि हम वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त किये बिना अंधों की भांति इधर-उधर भटकते फिरें। भारत/देश पर विचार: 7. भारत – भूमि इतनी पावन है कि अखिल विश्व में दिखाई देनेवाला सत तत्व यहीं अनुभूत किया जाता है, अन्यत्र नहीं। शक्ति पर विचार: 8. सच्ची शक्ति उसे कहते हैं जिसमें अच्छे गुण, शील, विनम्रता, पवित्रता, परोपकार की प्रेरणा तथा जन –जन के प्रति प्रेम भरा हो. मात्र शारीरिक शक्ति ही शक्ति नहीं कहलाती। समाज पर विचार: 9. सेवाएँ अपने चारों ओर परिवेष्टित समाज के प्रति भी अर्पित करनी चाहिए। सेवा पर विचार: 10. सेवा करने का वास्तविक अर्थ है – हृदय की शुद्धि; अहंभावना का विनाश; सर्वत्र ईश्वरत्व की अनुभूति तथा शांति की प्राप्ति। स्वतन्त्रता/स्वाधीनता पर विचार: 11. स्वतन्त्रता तो उसी को कहेंगे जिसके अस्तित्व में आने पर हम अपनी आत्मा का, राष्ट्रीय आत्मा का दर्शन करने में तथा स्वयं को व्यक्त करने में सामर्थ्यवान हों। - लेखक - डॉ आनंद सिंह राणा