एड्स से निजात के लिए हमें सिर्फ सतर्कता और जागरुकता पर ही निर्भर नहीं होगा, इसके आगे भी सोचना पड़ेगा। आगे सोचने का मतलब, एड्स की वैक्सीन, दवा या टीके के अविष्कार की ओर कदम बढ़ना? क्योंकि दिनों दिन ये लाइलाज बीमारी भयाभय रूप लेता जा रही है। प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में एचआईवी पॉजिटिव केस सामने आते हैं जिनमें हजारों की संख्या में मौत के मुंह में समा जाते हैं। ये सच है, एड्स से डरावनी बीमारी शायद आज भी दूसरी कोई और नहीं? जिसका मात्र नाम सुनते ही लोगों की रूह कांप जाती हैं। लोग भगवान से दुआ करते हैं, उन्हें कोई भी हारी-बीमारी क्यों न हो जाए, पर एड्स न हो?
एड्स समाज की सबसे बड़ी कलंकित बीमारी है। कलंकित इसलिए क्योंकि इस बीमारी के चलते समाज में असमानता फैल रही है जो सभ्य समाज में कतई स्वीकार्य नहीं? यही कारण है, एचआईवी लक्षण पता होने पर पॉजिटिव व्यक्ति से समाज एक तरह से नकार ही देता है। एड्स हो जाने के बाद समाज के अलावा सगे-संबंधी भी दूरी बना लेते हैं। तब दुखी होकर पीड़ित एकांतवास जीवन जीने को मजबूर हो जाता है। जबकि, देखा जाए तो एड्स की बीमारी मौत का तत्काल कारण नहीं बनती। एड्स रोगी लंबा जीवन जीते हैं। इसे स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी कहें, या हुकूमतों की लापरवाही? दशकों बीत जाने के बाद भी एड्स वायरस पर विजय प्राप्त नहीं हो सकी और न ही आजतक कोई मुकम्मल दवा या वैक्सीन बन सकी। एड्स से बचाव के लिए हम आज भी मात्र सतर्कता और जागरूकता पर ही निर्भर हैं, जो नाकाफी हैं। दरकार,अब वैक्सीन और दवा की है।
पहले के रिसर्च में यह तो तय हो चुका है कि एचआईवी एड्स की बीमारी जानलेवा है। चपेट में आने वाले मरीज की मौत होना निश्चित है। क्योंकि, एचआईवी के वायरस अपनी स्थित को बहुत तेजी के साथ बदलते हैं। एचआईवी का वायरस मरीज के प्रतिरक्षा सिस्टम पर सीधा प्रहार करता है। वायरस अपनी मौजूदगी को नित बदलता रहता है। हिंदुस्तान के अलावा पूरे संसार की बात करें, तो एड्स पीड़ितों की संख्या इस समय लाखों-हजारों में नहीं, बल्कि करोड़ों-अरबों में हैं। पिंड छुड़ाने के लिए देश-विदेश की हुकूमत लाखों नाकाम कोशिशें करती हैं। हालांकि रिसर्च-औषधियों के शोध लगातार जारी हैं। पर, सफलता हाथ नहीं लग रही। कई मुल्क इस वैक्सीन पर शोध कर रहे हैं। हां, इतना जरूर है, ‘इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव और द स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीच्यूट’ ने इतनी सफलता जरूर हासिल कर ली है कि एचआईवी संक्रमितों की मरने-जीने की स्टेज बता सकती है।
वैसे, चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एड्स भी मात्र एक वायरस ही है। लोगों में भ्रम है कि एड्स छूने से, साथ खाने से या हाथ मिलाने से फैलता है। जबकि, यह कोरा मिथक है। एड्स इनमें से किसी भी कारण से नहीं फैलता। साथ ही यह एक ही टॉयलेट प्रयोग करने से, छींकने या खांसने या फिर गले मिलने से भी नहीं फैलता। एड्स के फैलने के दूसरे कारण होते हैं। जैसे, संक्रमित खून चढ़ाना, एचआईवी पॉजिटिव महिला या पुरुष के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करना, साथ ही एक से अधिक पार्टनरों के साथ सेक्स करना आदि मुख्य कारण हैं। इस बीमारी का जबसे पता चला है, तभी से संक्रमितों की संख्या में कमी के बजाय बढ़ोतरी हुई है। आज पूरे संसार में ‘विश्व एड्स वैक्सीन दिवस’ मनाया जा रहा है। जो एचआईवी वैक्सीन जागरुकता के लिए निर्धारित है जिसकी बहुत जरूरत है।
बहरहाल, बढ़ते संक्रमित मामलों को देखते हुए दरकार इसी बात की है कि एचआईवी वैक्सीन की तत्काल आवश्यकता को पूरा किया जाए। कुछ वर्ष पूर्व अमेरिकी शोधकर्ताओं ने एचआईवी से निपटने के लिए वैक्सीन बनाने का दावा किया था जिसमें जानवरों का प्रयोग किया था। तब बताया गया था कि एचआईवी वायरस की प्रतिरक्षा के लिए जानवरों के रक्त एंटीबॉडी प्रोड्यूस करते हैं जिनके जरिए एचआईवी को रोका जा सकता है। हालांकि उनके इस दावे पर डब्ल्यूएचओ ने सवाल खड़े किए। मामला ज्यादा तूल पकड़ा तो फिर बात आगे नहीं बढ़ी। केंद्र सरकार ने सन-2030 तक एड्स के मामलों पर नियंत्रण पाने के लिए लक्ष्य बनाया है। वहीं, एड्स कंट्रोल सोसायटी के अनुसार कोरोना वायरस की भांति जरूरी चिकित्सीय व्यवस्था का प्रबंध बनाया है। अगर ऐसा होता है तो काबिलेतारीफ होगा, बड़ी सफलताओं में गिना जाएगा। लेकिन, ऐसे में सवाल उठता है, क्या अगले 6 साल में सरकार ये लक्ष्य पूरा कर पाएगी? हिंदुस्तान में प्रति वर्ष अस्सी से नब्बे हजार केस सामने आते हैं। पिछले साल 2021 में 87,500 एचआईवी के मामले दर्ज हुए। वहीं, बीते तीन साल में 69,000 लोगों की जान गई। महाराष्ट्र और दिल्ली से प्रति वर्ष 3 से 4 हजार के बीच नए केस आते हैं। इन दो राज्यों में संक्रमितों की संख्या दूसरे राज्यों से कहीं ज्यादा है। रेड लाइट एरिया से इनमें बड़ी भूमिका निभाती हैं।
केंद्रीय एड्स कंट्रोल सोसायटी के अनुसार एचआईवी के मरीज ज्यादातर 15 से 49 साल की उम्र के बीच ज्यादा होते हैं। 2020 में दिल्ली के कुल 32,130 एचआईवी के मरीजों को ऐंटी रेट्रोवायरल थेरेपी पर रखा गया था। वहीं, कोरोनाकाल में एड्स मरीजों की संख्या में और इजाफा हुआ था। पूरी दुनिया में एड्स से मरने वालों का आंकड़ा अब और भयभीत करने लगा है। वायरस या बीमारी कोई भी हो उसे चिकित्सा तंत्र को गंभीरता से लेना चाहिए, हल्के में नहीं? क्योंकि चिकित्सीय सिस्टम की जरा सी चूक या लापरवाही किसी के मौत का कारण बन सकती है। एड्स जैसी बीमारी की कोई दवा नहीं है। दवा है तो सिर्फ जागरुकता और स्वयं का बचाव? जिसमें हमें किसी तरह की कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए। फिर भी एड्स का निवारण सिर्फ सतर्कता और जागरुकता नहीं होना चाहिए। इसपर कामयाबी पाने के लिए वैक्सीन या टीके का निर्माण होना ही चाहिए।
लेखक: डॉ. रमेश ठाकुर
2024 में विश्व दूरसंचार और सूचना सोसायटी दिवस (डब्ल्यूटीआईएसडी) के लिए चुनी गई थीम "सतत विकास के लिए डिजिटल नवाचार" है।
इस दिन की उत्पत्ति इस दिन से होती है, जिसने 17 मई, 1865 को अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) की स्थापना को चिह्नित किया था। 2006 में, संयुक्त राष्ट्र ने 17 मई को इस दिन के रूप में घोषित किया था। विश्व स्तर पर लोगों को जोड़ने में आईटीयू की भूमिका को मान्यता देते हुए पहला उत्सव 17 मई 2006 को हुआ।
मूल रूप से, विश्व दूरसंचार दिवस, 1969 में शुरू हुआ, वैश्विक संचार चुनौतियों पर केंद्रित था। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी विकसित हुई, संयुक्त राष्ट्र ने उत्सव को विश्व दूरसंचार और सूचना सोसायटी दिवस तक बढ़ा दिया। इसका उद्देश्य इस बारे में जागरूकता बढ़ाना है कि इंटरनेट और अन्य प्रौद्योगिकियां समाज और अर्थव्यवस्थाओं को कैसे लाभ पहुंचा सकती हैं और, महत्वपूर्ण रूप से, डिजिटल विभाजन को पाट सकती हैं।
यहां हम प्रसिद्ध हस्तियों द्वारा विश्व दूरसंचार और सूचना सोसायटी दिवस 2024 के कुछ प्रसिद्ध उद्धरण प्रदान कर रहे हैं
"यह डिजिटल युग है और हम गैजेट के बिना एक दिन की कल्पना भी नहीं कर सकते, दूरसंचार के विकास के बिना जीवन कैसा होता इसकी कल्पना करना तो दूर की बात है।"
“यदि दूरसंचार न होता तो हम अभी भी एक-दूसरे को पत्र लिख रहे होते। विश्व दूरसंचार दिवस की शुभकामनाएँ”।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विगत मंगलवार को पवित्र वाराणसी में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपना पर्चा भरने से एक दिन पहले जब काशी में रोड शो निकाला तो उनके साये की तरह साथ रहने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी थे। रोड शो के सारे मार्ग में काशी की जनता ने मोदी-योगी का जिस उत्साह से अभूतपूर्व स्वागत किया उसने स्वतः कई ठोस संकेत दे दिए। वैसे भी लोकसभा चुनाव के समर में सारे देश की निगाहें उत्तर प्रदेश पर लगी हुई हैं। सब जानने को उत्सुक हैं कि आगामी 4 जून को यूपी किस पार्टी को दिल्ली की सत्ता की चाबी सौंपेगा।
सियासी गलियारे में वैसे भी यह कहावत पुरानी है कि दिल्ली के सिंहासन का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। यानी जिस पार्टी के पास यूपी में सबसे अधिक सीटें होंगी, प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का उसका रास्ता उतना ही आसान होगा। यही वजह है कि यूपी की 80 सीटों पर जीत हासिल करने के लिए राजनीतिक दल 2024 लोकसभा चुनावों में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे।
अलबत्ता सियासी पैंतरेबाजी से उलट राजनीतिक विश्लेषक यही मान रहे हैं कि इस बार यूपी में लोकसभा चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित नहीं होंगे। भाजपा 2019 लोकसभा चुनावों का प्रदर्शन बखूबी दोहराएगी। मोदी और योगी की जोड़ी एक बार फिर करिश्माई प्रदर्शन करेगी। दरअसल, मोदी-योगी की जोड़ी जीत की गारंटी बन चुकी है, जिसके आगे विपक्षी तेवर भी ढीले नजर आते हैं। विपक्ष के पास इस जोड़ी की कोई काट नहीं।
भाजपा अगर यूपी में लोकसभा की सभी 80 सीटों पर जीत के लक्ष्य के साथ चुनावी मैदान में ताल ठोंक रही है, तो उसके पीछे भी इसी जोड़ी का भरोसा है। प्रधानमंत्री कई बार सार्वजनिक मंचों से योगी के विकास मॉडल की तारीफ कर चुके हैं। प्रधानमंत्री इसी मॉडल के जरिए यूपी की सभी सीटों पर जीत का दावा भी कर रहे हैं। जैसा कि अमरोहा की अपनी चुनावी जनसभा में प्रधानमंत्री ने कहा भी कि ‘लिखकर ले लीजिए। सात साल से यूपी में योगी की सरकार है। 2019 लोकसभा चुनाव के समय उन्हें दो ही साल काम करने का मौका मिला था। अब तो सात साल हो गए हैं। योगी ने दिखा दिया है कि गर्वनेंस क्या होता है। कानून व्यवस्था क्या होती है। विकास क्या होता है और इसलिए योगी के नेतृत्व में इस बार रिकॉर्ड टूटेगा। इस बार 2014 और 2019 का रिकॉर्ड टूटेगा और यूपी इतिहास रचेगा।’
यूपी के चुनावी सफर में 2014 का लोकसभा चुनाव मील का पत्थर साबित हुआ। इसी साल यूपी में भाजपा का सियासी वनवास पूरा हुआ। उस समय भाजपा के सामने कोई गठबंधन नहीं था। भाजपा ने करीब 43 फीसदी वोट हासिल करते हुए 80 में से 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी। समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीती। जबकि, कांग्रेस मात्र 2 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी। बसपा का तो खाता भी नहीं खुला था।
2019 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर और योगी के कार्यों के दम पर बीजेपी ने चुनावी दंगल में पुनः ताल ठोंकी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दो साल का कार्यकाल पूरा कर चुके थे। नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और बसपा साथ आए। रालोद ने भी साथ दिया। हालांकि चुनाव परिणाम पुनः भाजपा के पक्ष में ही रहा। भाजपा ने करीब 50 फीसदी वोट शेयर के साथ 61 सीट जीती। बसपा 10 सीट, सपा 5 सीट और कांग्रेस के खाते में महज एक सीट आई|
योगी ने 2019 के बाद एक मजबूत और कड़े फैसले लेने वाले मुख्यमंत्री की छवि बनाई और जिसकी परिणिति उत्तरप्रदेश में बुलडोजर के रूप में सामने आई। जो कहीं न कहीं 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा का चुनावी सिंबल सा बन गया। मुख्यमंत्री ने राज्य में कानून व्यवस्था के मोर्चे पर अपने प्रदर्शन के चलते चुनाव को आभासी जनमत संग्रह बना दिया था। भाजपा ने चुनावों में ऐतिहासिक वापसी की और तीन दशकों से चल रहा समाजवादी पार्टी की साइकिल का पहिया पूरी तरह रुक गया। यूपी में भाजपा का वोट प्रतिशत भी 2014 के बाद से लगातार 40 फीसद के ऊपर ही बना हुआ है।
विगत दो लोकसभा चुनावों के मुकाबले 2024 चुनाव में स्थिति बिल्कुल अलग है। सपा ने इस बार कांग्रेस से हाथ मिला लिया है जबकि बसपा अकेले ताल ठोंक रही है। रालोद भी इस बार भाजपा के साथ है। एनडीए ने जातीय समीकरण बैठाने के लिए अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुभासपा जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ भी गठबंधन किया है।
भाजपा इस लोकसभा चुनाव में यूपी में बेहतर स्थिति में है तो इसमें केंद्र की मोदी सरकार की उपलब्धियों के साथ योगी मॉडल का अहम योगदान है। केंद्र में जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजनाओं को जमीनी स्तर पर उतारा। जिस तरह गरीब, युवा, महिला और किसानों के जीवन में खुशहाली लेकर आए उसी तरह योगी ने यूपी में सुशासन का राज कायम काम किया। योगी के सुशासन को अगर आंकड़ों के पैरामीटर पर देखें तो यह जानकर संतुष्टि होती है कि सात साल के कार्यकाल में एक भी दंगे नहीं हुए। जबकि पहले के मुख्यमंत्रियों के समय औसतन हर तीसरे-चौथे दिन एक दंगा होता था। यह किसी से छिपा नहीं है कि पहले पेशेवर माफिया और अपराधी सत्ता के संरक्षण में दहशत फैलाते थे।
योगी राज में माफियाओं पर लगाम लगी। यूपी में जनता अब भयमुक्त है, अपराधियों के मन में कानून का खौफ है। पुलिस अपराधियों, माफियों और दंगाइयों पर कहर बनकर टूटी है। उत्तर प्रदेश अपराध मुक्त, भयमुक्त एवं दंगामुक्त हुआ है। प्रदेश में पुलिस के डर से बड़े-बड़े अपराधी और माफिया प्रदेश छोड़कर या तो भाग गए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिए हैं।
यूपी में विकास योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में केंद्र सरकार ने भी भरपूर साथ दिया। यही वजह है कि केंद्र की योजनाओं यूपी में खूब फलीभूत हुई। जिस कारण यूपी की अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार हुए। वर्ष 2016-17 के मुकाबले राज्य का सकल घरेलू उत्पाद(जीएसडीपी) दोगुनी होकर 25 लाख करोड़ तक पहुंच गया। राज्य सरकार ने 2027 तक प्रदेश की अर्थ व्यवस्था को वन ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है। प्रदेश का बजट 2016-17 में जहां 3.46 लाख करोड़ रुपये का था वहीं 2024-25 में यह दोगुने से भी अधिक 7.36 लाख करोड़ रुपये का हो गया। विकास के इन्हीं आंकड़ों की बदौलत भाजपा यूपी में मिशन 80 का लक्ष्य हासिल करने का दावा कर रही है। लोकसभा चुनावों में कौन बाजी मारेगा यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन इतना तय है कि मोदी-योगी की जोड़ी पर यूपी की जनता का विश्वास बना हुआ दिख रहा है।
लेखक: - आर.के. सिन्हा
