सॉस सामान्यत: सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाने वाला संगृहीत पदार्थ हैं। बच्चों के लिये कम मसालेदार व बड़ों के लिए तीखे चटपटे दोनों ही प्रकार के स्वाद का आनंद लिया जा सकता हैं। तो आइए आज व्हाइट सॉस के बारे में जानें :
सामग्री -
1 टेबल स्पून मक्खन, 1 टेबल स्पून मैदा, 1 टी कप दूध, 1 चुटकी नमक,
विधि -
1. एक कांच के बाऊल में मक्खन रखें। इसे 100त्न पर 15 सेकेंड माइक्रोवेव करें।
2. मैदा डालकर चम्मच से अच्छी तरह मिलायें और 15 सेकेंड माइक्रोवेव करें।
3. दूध डालकर अच्छे से चलायें और 20 सेकेंड माइक्रोवेव करें।
4. गाढ़ी हो जाने पर नमक व काली मिर्च मिक्स करें। ठंडा कर उपयोग करें।
किडनी स्टोन की समस्या युवाओं को तेजी से अपनी चपेट में ले रही है. इसे हिंदी में गुर्दे की पथरी कहा जाता हैं. किडनी में जब डिसॉल्व मिनरल्स इकट्ठा हो जाते हैं और शरीर से बाहर नहीं निकल पाते, तब स्टोन बन जाता है. शुरुआत में लोगों को इसके लक्षण नजर नहीं आते और जब स्टोन का साइज बढ़ जाता है, तब दर्दनाक स्थिति पैदा हो जाती है. किडनी स्टोन का सही तरीके से इलाज न कराया जाए तो यूरिनरी प्रॉब्लम, यूरिन इंफेक्शन और किडनी डैमेज भी हो सकती है. इसे लेकर लापरवाही बिल्कुल न बरतें.
अब सवाल उठता है कि किडनी स्टोन किन वजहों से हो सकता है. मेडिकल न्यूज़ टुडे के अनुसार किडनी स्टोन होने की कई वजह हो सकती हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह गलत लाइफस्टाइल और खानपान की बिगड़ी हुई आदतें मान सकते हैं. यहां तक कि ज्यादा नमक खाने से भी यह परेशानी हो सकती है. मेडिकल हिस्ट्री, अत्यधिक वजन, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हाई यूरिक एसिड की वजह से भी किडनी स्टोन हो सकता है. आज आपको बताएंगे कि किन तरीकों को अपनाकर आप जिंदगी भर किडनी स्टोन की समस्या से दूर रह सकते हैं.
कम खाएं नमक- हार्वर्ड हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादा मात्रा में नमक खाने से किडनी स्टोन की समस्या ट्रिगर हो सकती है. ज्यादा नमक खाने से आपकी यूरिन में कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाएगी, जिससे स्टोन का खतरा भी बढ़ जाता है. एक दिन में लोगों को 2300 mg से ज्यादा नमक नहीं खाना चाहिए. जो लोग किडनी स्टोन से जूझ रहे हैं, उन्हें रोज़ 1500 mg नमक ही खाना चाहिए. इससे आपको काफी राहत मिलेगी.
खूब पिएं पानी- किडनी स्टोन से बचने के लिए लोगों को हर दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए. पानी पीने से किडनी में जमे एक्स्ट्रा मिनरल्स बाहर निकल जाते हैं और किडनी स्टोन का खतरा कम हो जाता है. अगर आप पानी में नींबू है या कुछ खट्टा रस मिला लें, तो भी किडनी स्टोन बनने से रोक सकते हैं. हर दिन आपको कम से कम 3 से 4 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए.
कैल्शियम रिच फूड्स खाएं- कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करने से आप किडनी स्टोन की समस्या से बच सकते हैं. दूध, दही, पनीर, सोयाबीम, बादाम और हरी पत्तेदार सब्जियों में बड़ी मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है. ऐसे फूड्स का सेवन करने से आपकी यूरिन में कैल्शियम जमने की संभावना कम हो जाएगी और किडनी स्टोन का खतरा घट जाएगा.
चिकन और अंडा अवॉइड करें- रेडमीट, चिकन, अंडा और सीफूड का ज्यादा सेवन करने से यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ सकती है और किडनी स्टोन का खतरा भी बढ़ जाता है. इससे बचने के लिए हाई प्रोटीन फूड्स को अवॉइड करना चाहिए. नॉनवेज से दूरी बना लेनी चाहिए और हेल्दी फूड का सेवन करना चाहिए.
चॉकलेट खाने की आदत करें कम- आपको जानकर हैरानी होगी कि ज्यादा चॉकलेट, चाय और अखरोट खाने से भी किडनी स्टोन का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आपको इन चीजों से दूरी बनानी चाहिए और हेल्दी चीजों का सेवन करना चाहिए. अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो किडनी स्टोन की समस्या से बच सकते हैं.
मुलेठी (Mulethi) को भारत में जड़ी-बूटी माना जाता है, इसलिए आयुर्वेद में इसके गुणों का डिटेल में वर्णन किया गया है. कुछ देशों में मुलेठी का प्रयोग विशेष प्रकार के आहार में भी किया जाता है. इसे इम्युनिटी बूस्टर माना जाता है और यह शरीर को एलर्जी और संक्रमण से तो बचाती ही है, साथ ही गले को साफ और लंग्स को स्वस्थ भी रखती है. भारत और अन्य देशों में हजारों वर्षों से यह प्रयोग में लाई जा रही है.
बहुउपयोगी है मुलेठी
अजब-गजब है मुलेठी (Liquorice) और उसका स्वाद. इसे जड़ी-बूटी माना जाए, लेकिन इसका उपयोग कई तरह से होता है. आप हैरान होंगे कि इस बूटी का इस्तेमाल शराब बनाने में भी किया जाता है. भारत में इसे आयुर्वेदिक औषधि माना जाता है, जिसका घरेलू प्रयोग भी होता है. अगर गला खराब है, फेफड़ों में से आवाज आ रही है तो मुलेठी का डंठल या उसका पाउडर चूसने की सलाह दी जाती है. लेकिन आयुर्वेद ने इसे यहीं तक सीमित नहीं किया है, उसके अनुसार मुलेठी बहु-उपयोगी है और इसका उपयोग कई दवाओं में भी होता है.
दूसरी ओर चीन व कुछ पश्चिमी देशों में कैंडी, मिठाई, च्यूइंगम, आइसक्रीम आदि में इसका फ्लेवर मिलाकर उसे स्वादिष्ट बनाया जाता है. तंबाकू में भी इसकी जड़ को मिलाया जाता है, जिससे वह अलग तरह की मिठास व सुकून देती है. कुछ स्पेशल कोल्ड ड्रिंक्स में भी इसका फ्लेवर नया ही स्वाद पैदा करता है.
भारत के प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका वर्णन
मुलेठी का हजारों वर्षों से विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा रहा है. कई प्राचीन ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है. मिस्र, चीन और भारत में हजारों वर्षों से विभिन्न पारंपरिक दवाओं व लोक उपचार का हजारों वर्ष लंबा इतिहास है. वहां इसके डंठल, जड़ों व अर्क का प्रयोग बताया गया है. सातवीं-आठवीं ईसा पूर्व लिखे गए भारतीय आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ से लेकर 15वीं-16वीं शताब्दी में लिखे बए आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘भावप्रकाश’ में मुलेठी के लाभ-हानि का विस्तार से वर्णन है. ग्रंथ के अनुसार यह प्रकृति से शीतल, पचाने में भारी, स्वाद में मधुर है. यह आंखों की समस्याओं के लिए भी लाभकारी है बल्य (ताकत प्रदाता) गुण के कारण यह ताकत बढ़ाने में भी मदद करता है.
इसका सेवन शुक्राणु (Sperm) और वीर्य (Semen) की गुणवत्ता में सुधार करने में भी मदद करता है. भारतीय जड़ी-बूटियों, फलों व सब्जियों पर व्यापक रिसर्च करने वाले जाने-माने आयुर्वेद विशेषज्ञ आचार्य बालकिशन के अनुसार औषधीय दृष्टि से देखें तो मुलेठी कई रोगों में लाभकारी है. यह वात और पित्त दोष को कम करती है. त्वचा रोगों और बालों के लिए फायदेमंद हैं. आमतौर पर इसका इस्तेमाल सर्दी-जुकाम या खांसी में आराम पाने के लिए किया जाता है. लेकिन इसके सेवन के और भी लाभ हैं. इसका मुख्य इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में किया जाता है.
शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा देती है
मुंबई यूनिवर्सिटी के पूर्व डीन व वैद्यराज दीनानाथ उपाध्याय के अनुसार आयुर्वेद में लंबे समय से मुलेठी का प्रयोग किया जा रहा है. उसका कारण यह है कि इसमें शरीर को स्वस्थ रखने वाले कई गुण है. यह इम्युनिटी बूस्टर (रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली) है, जो शरीर को एलर्जी और संक्रमण से तो बचाती ही है, साथ ही गले को साफ और लंग्स को स्वस्थ भी रखती है. इसका सेवन श्वसन पथ को साफ रखता है, तभी भारत के शास्त्रीय गायक इसका लगातार सेवन करते हैं.
मुलेठी में रेचक के गुण भी पाए जाते हैं, इसलिए यह पेट रोगों के लिए भी लाभकारी मानी जाती है. इसका सामान्य उपयोग अपच, एसिडिटी, सीने में जलन और कब्ज से बचाव करते हैं. इसमें सूजन रोधी गुण भी पाए जाते हैं, जिस कारण यह गठिया रोग भी लाभकारी होती है. सबसे बड़ी बात यह है कि इसका सेवन सामान्य बीमारियों से बचाए रखता है. मुलेठी का स्वाद ऐसा होता है कि इसका ज्यादा सेवन नहीं किया जा सकता है, लेकिन अगर ज्यादा खा ली तो यह सिरदर्द तो करेगी ही, गले को भी चोक कर सकती है.
चिया बीज क्या होता है ?
चिया सीड्स ओमेगा 3 फैटी एसिड और ‘अन्य जैव सक्रिय पोषक यौगिकों’ के लिए भी जाने जाते हैं और इसके साथ साथ इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है जोकि विभिन्न स्वास्थ्य समाधान प्रदान करने के लिए जाने जाते हैं |
शोध अध्ययनों से पता चलता है कि इस सुपरफूड में विटामिन सी, ई, नियासिन, थियामिन, एंटीऑक्सिडेंट, राइबोफ्लेविन पाए जाते हैं जोकि एक इंसान के स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।
चिया के बीज के फायदे
चिया बीजों को उनके पोषक तत्वों के कारण कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने के लिए जाना जाता है। चिया बीज के उपयोग अनेक है जो हमारी स्वस्त के लिए लाभ दायक है चिया सीड्स के सेवन के कुछ प्रमुख स्वास्थ्य लाभ इस प्रकार हैं:
पाचन में सुधार
चिया के बीज में फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता हैं, इसलिए ये किसी भी तरह के खाने को आसानी से पचाने की क्षमता रख्ते है। खाना खाने के बाद इनका इस्तेमाल पाचन किर्या के लिए काफी लाभदायक रहता है। इसके साथ साथ यह आंतों से संबंधित समस्याओं जैसे आंतों की सूजन और कब्ज को ठीक करता है। चिया के बीज खाने के बाद जिलेटिन जैसे पदार्थ बनाते हैं। यह पदार्थ घुलनशील फाइबर की उपस्थिति के कारण बनता है। यह प्रीबायोटिक्स बैक्टीरिया को आंत में बढ़ने में मदद करके पाचन स्वास्थ्य में सुधार करता है। हर 100 ग्राम चिया सीड्स में 40 ग्राम के डायटरी फाइबर होते हैं जो स्वस्थ भोजन के पाचन को सहारा देने के लिए पर्याप्त है | जब किसी इंसान की पाचन किर्या ठीक हो जाती है तो उसकी बहुत सारी बीमारिया तो वैसे ही दूर हो जाती हैं और चिया के बीज के इस्तेमाल के बाद आपको शौच बिना तनाव के आसानी से हो जाएगा।
तनाव और उच्च रक्तचाप को कम करता है
चिया बीज मैग्नीशियम का एक बड़ा स्रोत है, जो शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करने में मदद करता पाया गया है। कोर्टिसोल एक हार्मोन है जो तनाव और उच्च रक्तचाप पैदा करने से जुड़ा है। इस प्रकार, चिया के बीज कोर्टिसोल को कम करते हैं और इस प्रकार तनाव और उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद करते हैं।
थकान दूर करता है
चिया के बीज में ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में होता है। इसलिए इसके इस्तेमाल के बाद इंसान चुस्त दुरुस्त रहता है, और अपने दिन भर के काम बिना ज़्यादा थके निबटा लेता है। इसमें मौजूद मिनरल्स और विटामिन्स हमे काम करने की शक्ति प्रदान करते हैं। चिया सीड्स का सेवन करने से वर्कआउट में सुधार होता है। इसलिए कई जिम वाले महंगे एनर्जी ड्रिंक्स के विकल्प के तौर पर चिया सीड्स खाते हैं। यह भोजन में सभी अवांछित चीनी को साफ कर सकता है।
वजन घटाने में मदद करते है।
चिया सीड्स आपको ताकत देने के साथ साथ आपका वज़न कम करने में भी मदद करते हैं। क्योंकी चिया के बीज में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो पेट और आंतो में जमा चर्बी को पिग्ला या जला देते है। इसकी मदद से आपका वज़न भी नहीं बढ़ता है और आपको ज़्यादा भूक भी नहीं लगती है। चूंकि ये बीज कैलोरी में कम और हाई -डेंसिटी लेपोप्रोटीन में उच्च होते हैं | हाई -डेंसिटी लेपोप्रोटीन एक अच्छा कोलेस्ट्रॉल है जो रक्त से कोलेस्ट्रॉल को अवशोषित करता है और इसे वापस यकृत में ले जाता है। इससे शरीर में चर्बी का जमा होना कम हो जाता है। चिया के बीज को किसी भी पेय के साथ मिला कर इस्तेमाल करने से ये इंसान की भूक को शांत कर देते हैं जिससे इंसान को ज़्यादा भूक नहीं लगती है, और खाने की कमी भी महसूस नहीं होती है और चिया के बीज आपको सुभे ज़रूरी पोषक तत्व भी दे देते हैं। जिससे आपके अंदर ताकत बनी रहती है। यह आंत क्षेत्र में वसा ऊतक को कम करने में मदद करता है। इसलिए यह वजन प्रबंधन आहार के लिए महत्वपूर्ण भोजन में से एक है।
हृदय रोगों का खतरा कम करते है।
चिया के बीजं दिल की बीमारी के लिए भी बहुत ही उपयोगी हैं। विभिन्न अध्ययनों से यह पाया गया है कि चिया बीज हाई -डेंसिटी लेपोप्रोटीन (एचडीएल) कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाते हैं। यह एचडीएल एक अच्छा कोलेस्ट्रॉल है क्योंकि यह लौ -डेंसिटी लेपोप्रोटीन (एलडीएल) को हटाने में मदद करता है | इससे शरीर मै चर्बी नहीं जमा होती और वज़न सही बना रहता है | इसके कारन ब्लड वेसल्स मै ब्लॉकेज का खतरा भी कम हो जाता है | यह बढ़ा हुआ अच्छा कोलेस्ट्रॉल रक्तप्रवाह में ओमेगा -6 फैटी एसिड को कम करके हृदय रोग को रोकता है। इस प्रकार, हृदय प्रणाली पर तनाव कम से कम होता है। हालांकि, आपको किसी भी हृदय रोग से बचने के लिए चिया सीड्स के साथ संतुलित भोजन लेने में सतर्क रहना चाहिए।
दंत स्वास्थ्य में सुधार करते है।
कैल्शियम से भरपूर चिया सीड्स दांतों के स्वास्थ्य को अच्छे तरीके से बनाए रखने में मदद करते हैं। चिया में विटामिन ए और फॉस्फोरस की मौजूदगी से दांत मजबूत और आकर्षक होते हैं। बीजों में मौजूद जिंक दांतों के आसपास के प्लाक को साफ़ और सही करने में मदद करता है । और इसी तरह यह टैटार के गठन को भी रोकता है। चिया सीड के आपके दांतों को कीटाणुओं और सांसों की दुर्गंध से भी दूर रखते हैं।
गठिया को कम करता है
चिया सीड्स में भरपूर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है जो एक बेहतरीन एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट है। अल्फा-लिनोलेनिक एसिड या एएलए ओमेगा-3 जोड़ों और धमनियों में सूजन और दर्द को कम करता है। अध्ययनों से पता चलता है कि एक दिन में 4 ग्राम चिया बीज गठिया को नियंत्रित और रोक सकते हैं। चिया सीड्स में कैल्शियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस बोन मिनरल डेंसिटी को बनाए रखने में मदद करते हैं। इसका मान आपकी हड्डियों की मजबूती को दर्शाता है। इस प्रकार, यह हड्डियों को मजबूत करने में मदद करता है।
गर्भावस्था के दौरान मदद करता है
यह गर्भवती महिलाओं के लिए सर्वोत्तम आहार पूरक के रूप में कार्य करता है। गर्भवती महिलाओं को थकान, रक्त शर्करा में वृद्धि और विटामिन और खनिज की कमी जैसी विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का अनुभव हो सकता है। चूंकि चिया के बीज में अधिक विटामिन, खनिज और सूक्ष्म पोषक तत्व होते हैं, इसलिए प्रत्येक दिन थोड़ी मात्रा में लेने से मैग्नीशियम, फास्फोरस और कैल्शियम की कमी का इलाज करने में मदद मिलती है। चिया ऊर्जा के स्तर को भी बढ़ाता है और कार्ब्स और शुगर रूपांतरण की प्रक्रिया को धीमा करता है। ओमेगा -3 फैटी एसिड की उपस्थिति भ्रूण में मस्तिष्क के विकास में सुधार करती है। सबसे बढ़कर, इसकी समृद्ध फाइबर सामग्री गर्भवती महिलाओं को स्वतंत्र रूप से शौच करने में मदद करती है।
मधुमेह के प्रबंधन में मदद करता है
मधुमेह में सबसे बड़ी समस्या खाने के तुरंत बाद शर्करा के स्तर का अचानक बढ़ना है। चिया सीड्स में मौजूद स्टार्च और कार्ब्स अन्य भोजन की तुलना में धीरे-धीरे रक्तप्रवाह में छोड़े जाते हैं।[3] यह क्रमिक रिलीज शरीर की कोशिकाओं को दिए गए समय में पोषक तत्वों को अवशोषित करने में मदद करता है। यह इस प्रकार रक्त शर्करा को नियंत्रित करने के लिए शरीर की इंसुलिन निर्भरता को कम करता है। इसलिए यह मधुमेह के रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद है। विस्तृत लाभ अगले भाग में समझाया गया है।
डायबिटीज में चिया के बीज का महत्त्व
उपरोक्त खंड चिया बीज के सामान्य लाभों के बारे में था। यह खंड विशेष रूप से इस बात का विवरण देता है कि मधुमेह के रोगियों के लिए चिया के बीज कैसे फायदेमंद होते हैं। डायबिटीज में चिया के बीज बहुत ही ज़्यादा फायदा पोहचाते हैं।
रक्त शर्करा का स्तर नियंत्रण करना
चिया सीड में कार्ब्स की मात्रा अधिक होती है, इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है। चिया सीड्स का जीआई केवल 4 है, जो इसे मधुमेह के लिए एक आदर्श भोजन बनाता है। कम जीआई वाले कार्बोहाइड्रेट धीरे-धीरे पचते हैं और अवशोषित होते हैं, जिससे रक्त शर्करा का स्तर नियंत्रण में रहता है|
उपयोग
चिया-नींबू डिटॉक्स ड्रिंक यह वजन घटाने के लिए बेहद फायदेमंद है।
एक बड़ा चम्मच चिया सीड्स लें और इसे पानी से भरी बोतल में भिगो दें। इसमें नींबू का पतला टुकड़ा डालें। डिटॉक्स ड्रिंक को एक घंटे तक रखें और फिर इसका सेवन करें।
चिया के बीज को मरीज़ को किसी भी ऐसी चीज़ के साथ इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जिससे के उसका ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाये।
चिया सलाद
अपने फल या सब्जी के सलाद पर चिया बीज छिड़कें। यह सलाद को फाइबर से भरपूर बनाता है और इस प्रकार आपको अपने रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में मदद करता है।
ओटमील के साथ चिया सीड्स
ओटमील (दलिया) सबसे अच्छा मधुमेह के रोगियों का नाश्ता है। दलिया में थोड़ी मात्रा में चिया बीज छिड़कें और अपने रक्त शर्करा के स्तर को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करें।
चिया बीज पानी
2 से 3 बड़े चम्मच चिया सीड्स को पानी में मिलाकर दिन में एक बार पिएं। इससे कब्ज की समस्या कम हो जाएगी।
लेकिन चिया सीड्स का सेवन करने से पहले अपने डायटीशियन से सलाह लेना जरूरी है। व्यक्ति द्वारा आवश्यक कार्ब की सही मात्रा, और पोषण संबंधी ज़रूरतें उम्र और स्वास्थ्य कारकों के आधार पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न होती हैं। इसलिए चिया सीड्स का सेवन करने से पहले डायटीशियन से सलाह जरूर लें।
दुष्प्रभाव
चिया सीड्स के सेवन से कुछ लोगों में कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं, खासकर जब बड़ी मात्रा में सेवन किया जाता है या जब उन्हें परागकणों जैसी कुछ चीजों से एलर्जी होती है। आइए जानते हैं चिआ बीज के नुक्सान या कुछ साइड इफेक्ट्स के बारे में।
1. इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। जोकि आपके पेट के लिए और पाचन किर्या के लिए फायदेमंद होता है। लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा फाइबर के सेवन से पेट में सूजन, उल्टी और दस्त हो सकते हैं। इसलिए सीमित मात्रा में सेवन करें। एक सामान्य खुराक की सिफारिश है 0.7 औंस (20 ग्राम या लगभग 1.5 बड़े चम्मच) चिया बीज प्रति दिन दो बार।
2. कुछ लोगों को चिया सीड्स के सेवन के बाद सूजन, सिरदर्द और खुजली जैसी एलर्जी का अनुभव होता है। गंभीर एलर्जी प्रतिक्रियाएं एनाफिलेक्सिस का कारण बन सकती हैं।
3. मधुमेह रोगियों को चिया बीज का सेवन उचित मात्रा में करना चाहिए। उच्च फाइबर सामग्री के कारण अत्यधिक खपत रक्त शर्करा के स्तर को कम कर सकती है।
4. अधिक मात्रा में चिया सीड्स के सेवन से दम घुटने का खतरा हो सकता है। इसका सेवन उचित तरीके से करना चाहिए। चिया के बीज सेवन करने पर पानी सोख लेते हैं और इस तरह फूल जाते हैं। इस प्रकार एक बार में अत्यधिक सेवन से घुटन हो सकती है।
5. अधिक मात्रा में चिया बीजों के सेवन से मधुमेह और रक्तचाप के इलाज के लिए कुछ दवाओं के साथ परस्पर क्रिया हो सकती है। इसलिए चिया सीड्स का सेवन सही मात्रा में करना चाहिए।
सदियों से विभिन्न प्रकार की सब्जियों का इस्तेमाल स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी किया जाता रहा है। इनमें से कई सब्जियां तो आम हैं, लेकिन कुछ के बारे में कम ही लोग जानते हैं। इन्हीं में से एक है ‘आर्टिचोक’। दरअसल, यह सब्जी नहीं बल्कि एक अपरिपक्व फूल की कली है, जिसका इस्तेमाल सब्जी के रूप में किया जाता है। माना जाता है कि यह सब्जी कई रोगों के लक्षण दूर करने के साथ ही स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकती
1. पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करे:
पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए आर्टिचोक का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी संबंध में एनसीबीआई (नेशनल सेंटर ऑफ बायोटेक्नोलॉजी इनफार्मेशन) की वेबसाइट पर एक शोध भी प्रकाशित हुआ है। इस शोध के मुताबिक आर्टिचोक के पत्ते के अर्क में मौजूद बाइल (लिवर द्वारा निकलने वाला तरल पदार्थ) को बढ़ावा देना वाला प्रभाव पाचन में मदद कर सकता है। साथ ही यह इरिटेबल बोवेल सिंड्रोम के लक्षण, जैसे पेट दर्द और अपच की समस्या को दूर करने में लाभदायक हो सकता है ।
दरअसल, इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम यानी आंत संबंधी समस्या भी पाचन संबंधी समस्याओं में से एक है । माना जाता है कि आर्टिचोक में मौजूद फाइबर पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करने में मदद कर सकता है । पाचन से जुड़ी परेशानी को दूर करने के लिए आर्टिचोक का सेवन काढ़ा या चाय के रूप में किया जा सकता है।
2. कैंसर को बढ़ने से रोके:
आर्टिचोक को लेकर किए गए अध्ययनों के मुताबिक इसका अर्क स्तन कैंसर की कोशिकाओं पर नकारात्मक प्रभाव डालकर, कैंसर सेल्स को फैलने से रोक सकता है। दरअसल, इसमें पॉलीफेनोल नामक केमिकल कंपाउंड होता है, जो कैंसर कोशिकाओं की गतिविधि को धीमा कर सकता है । आर्टिचोक में मौजूद पोलीफेनोलिक कंपाउंड की वजह से ही इसमें कीमोप्रेंटिव गतिविधि भी पाई जाती है । कीमोप्रेंटिव गुण कैंसर के फैलने की गति को कम करने के साथ ही इसकी पुनरावृत्ति यानी एक बार कैंसर होने के बाद दोबारा कैंसर होने की आशंका को धीमा कर सकता है ।
3. लिवर स्वास्थ्य में सुधार:
आर्टिचोक का सेवन लिवर के लिए भी फायदेमंद हो सकता है। दरअसल, इसके सेवन से लिवर एंजाइम्स में सुधार हो सकता है। इसमें फ्लेवोनोइड्स और कैफॉइलक्विनिक) एसिड मौजूद होते हैं, जो हेपेटोप्रोटेक्टिव गतिविधि और हाइपोलिपिडेमिक प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं। हेपेटोप्रोटेक्टिव गुण लिवर को डैमेज होने से बचाता है और साथ ही यह नॉनअल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस -NASH में भी फायदा पहुंचा सकता है। दरअसल, नॉनअल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस वो बीमारी होती है, जिसमें बिना अल्कोहल के सेवन के ही लिवर में फैट जमने लगता है, जिससे लिवर में सूजन और संक्रमण होता है । एनसीबीआई की वेबसाइट पर प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक आर्टिचोक सबसे ज्यादा लाभकारी प्रभाव लिवर पर ही दिखाता है। आर्टिचोक की जड़ों और पत्तियों के अर्क का इस्तेमाल लिवर को स्वस्थ रखने के लिए किया जा सकता है। यह लिवर की कोशिकाओं को दोबारा बनने में भी मदद कर सकता है ।
4. हृदय स्वास्थ्य:
आर्टिचोक, विश्व में उगाए जाने वाले सबसे प्राचीन पौधों में से एक है। इसके पौधे के विभिन्न हिस्सों (पत्तियों, फलों और जड़ों) के अर्क का उपयोग समय-समय पर औषधीय रूप में किया जाता रहा है। यही वजह है कि आर्टिचोक के फायदे में हृदय स्वास्थ्य भी शामिल है। इटली में की गई एक स्टडी के मुताबिक हृदय संबंधी रोगों की रोकथाम के लिए आर्टिचोक के वैकल्पिक इस्तेमाल को लेकर जागरूकता जरूरी है । दरअसल, यह कोलेस्ट्रॉल को कम करके हृदय रोग को रोकने में मदद कर सकता है । इसमें मौजूद फ्लेवोनाइड्, हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया (कोलेस्ट्रॉल का अधिक स्तर) को कम कर सकता है और एंटीऑक्सीडेंट गुण एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनी में जमने वाले प्लाक) से बचा सकता है। इन दोनों समस्याओं का संबंध हृदय रोग से है ।
5. डायबिटीज:
आर्टिचोक की पत्तियों के इथेनॉल अर्क में एंटीहाइपरग्लिसेमिक गुण पाया जाता है। यह गुण ग्लूकोज के लेवल को कम करके डायबिटीज के स्तर को घटा सकता है। एनसीबीआई की वेबसाइट पर मौजूद एक शोध के दौरान आर्टिचोक की पत्तियों का अर्क (200 से 400 मिलीग्राम प्रति किलो वजन) एक निर्धारित समय तक जब चूहों को दिया गया, तो उनका ग्लूकोज लेवल 42.84 से 37.91 प्रतिशत तक घटा। माना जाता है कि इसमें मौजूद एंटी-डायबिटिक प्रभाव टेरपेनॉइड, फिनोल, फ्लेवोनोइड्स, टैनिन और कार्डियक ग्लाइकोसाइड जैसे यौगिक की वजह से है। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण मधुमेह की वजह से होने वाले ऑर्गन डैमेज से भी बचाव कर सकते हैं ।
6. सीसा की विषाक्तता से बचाए :
लेड यानी सीसा, एक ऐसा पर्यावरणीय प्रदूषक, जो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसकी वजह से लिवर, किडनी और अन्य अंगों से संबंधित गंभीर रोग हो सकते हैं। यही वजह है कि लेड विषाक्तता से शरीर को बचाना जरूरी है। ऐसे में आर्टिचोक उपयोगी साबित हो सकता है। दरअसल, इसमें मौजूद फेनोलिक्स और फ्लेवोनोइड यौगिक की वजह से इसे रक्त और टिश्यू में मौजूद लेड की मात्रा को दूर करने में सहायक माना गया है। दरअसल, सीसा की विषाक्तता के कारण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है। यह स्ट्रेस लिवर, किडनी, मस्तिष्क और अन्य अंगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। ऐसे में माना जाता है कि लेड के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए एंटीऑक्सीडेंट गुण प्रभावी हो सकता है। यह गुण आर्टिचोक में भी होता है, इसलिए इसे सीसा की विषाक्तता से बचाव करने का अच्छा उपाय माना जा सकता है ।
7. कोलेस्ट्रोल :
आर्टिचोक का सेवन करने से लिपिड प्रोफाइल में सुधार किया जा सकता है, जिससे कोलेस्टॉल के स्तर को नियंत्रित रखा जा सकता है। इसमें खासकर ट्राइग्लिसराइड्स और कुल कोलेस्ट्रॉल के स्तर में सुधार करने की क्षमता पाई गयी है। माना जाता है कि इसमें मौजूद घटक ल्यूटोलिन और क्लोरोजेनिक एसिड, कोलेस्ट्रोल को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।
8. ब्लड प्रेशर:
एनसीबीआई की वेबसाइट पर मौजूद एक रिसर्च पेपर के मुताबिक ब्लड प्रेशर के कुछ रोगियों को जब आर्टिचोक का जूस दिया गया, तो 12 हफ्ते तक इसका सेवन करने के बाद रोगियों के उच्च रक्तचाप में कुछ हद तक कमी पाई गयी। ऐसे में माना जा सकता है कि इसका सेवन हाई बीपी के रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकता है (11)। वहीं दूसरी ओर आर्टिचोक में पोटेशियम की मात्रा भरपूर होती है, जिसे बीपी और हृदय संबंधी रोगों से बचाव के लिए लाभदायक माना जाता है ।
9. त्वचा स्वास्थ्य व स्किन एजिंग :
आर्टिचोक में मौजूद पॉलीफेनोल त्वचा के लिए लाभदायक हो सकता है। यह सूर्य की हानिकारक किरणों के साथ ही मुक्त कणों के दुष्प्रभाव से भी त्वचा को बचाने में मदद कर सकता है। शायद यही वजह है कि इसका इस्तेमाल कॉस्मेटिक्स में बतौर एंटी-एजिंग तत्व के रूप में किया जाता है। यह त्वचा के रूखेपन को दूर करने के साथ ही त्वचा की इलास्टिसिटी बनाए रखने में मदद कर सकता है ।
स्किन एजिंग का एक कारण कोलेजन मेटाबॉलिज्म (एक तरह के प्रोटीन का चयापचय) में गड़बड़ी भी है। ऐसे में आर्टिचोक का लंबे समय तक इस्तेमाल कर कोलेजन मेटाबोलिज्म को बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटी इंफ्लामेटरी गुण त्वचा एडिमा (सूजन) से भी बचाने में मदद कर सकता है इसे पेस्ट के रूप में त्वचा पर लगाने के साथ ही आहार में भी शामिल किया जा सकता है।
आर्टिचोक के पौष्टिक तत्व
शरीर को आर्टिचोक का लाभ इसमें मौजूद पोषक तत्वों की वजह से ही मिलते हैं। यही वजह है कि हम तालिका के माध्यम से नीचे आर्टिचोक में मौजूद पोषक तत्वों के बारे में बता रहे हैं |
आर्टिचोक का उपयोग
आर्टिचोक का लाभ तो आप जान ही चुके हैं। अब इसके उपयोग के बारे में जान लेना भी जरूरी है। कई लोग आर्टिचोक के फायदे से वाकिफ होते हुए भी इसका इस्तेमाल नहीं कर पाते, क्योंकि वो इस बात से अंजान होते हैं कि इसका कौन सा हिस्सा खाया जाता है और कौन सा नहीं। ऐसे में हम नीचे आपको आर्टिचोक का उपयोग और सेवन योग्य हिस्से के बारे में बता रहे हैं।
खाने योग्य हिस्सा:
· आर्टिचोक के पत्तों को हटाने के बाद जो बीच का हिस्सा बचता है, उसे खाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। आर्टिचोक के इस हिस्से को हार्ट भी कहा जाता है।
· इसके अलावा, इसके पत्तों को भी इस्तेमाल में लाया जाता है। लेकिन उसे पूरा खाने के बजाए, दांतों से खींचकर उसके मुलायम हिस्से को खाकर पत्ते को फेंक दिया जाता है।
· आर्टिचोक के शुरुआती कुछ पत्तों को निकालने के बाद ही अन्य पत्तों का सेवन किया जाना चाहिए।
आर्टिचोक का उपयोग:
· आर्टिचोक को उबालकर चटनी या चीज़ में डीप करके खाया जा सकता है।
· इसे ग्रिल करके और भूनकर भी आहार में शामिल किया जाता है।
· इसका इस्तेमाल स्टफ्ड ब्रेड या अन्य भरवा रेसिपी जैसे आलू भरवा के लिए किया जा सकता है।
· आर्टिचोक को पकाने की सबसे लोकप्रिय विधि स्टिमिंग है।
· इसे स्मूदी बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
· आर्टिचोक की पत्तियों से काढ़ा और चाय भी बना सकते हैं।
· इसके पाउडर का सेवन सीधे या पानी में घोलकर किया जा सकता है।
· आर्टिचोक को गोली के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है।
कितनी मात्रा में सेवन करें:
· आर्टिचोक को इस्तेमाल करने की वैसे तो कोई खास मात्रा निर्धारित नहीं है, लेकिन इस पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार इसके सेवन की मात्रा का अनुमान लगाया जा सकता है
· हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया और अपच के लिए इसके सूखे पत्तों के पाउडर से बना पानी वाला घोल का एक से दो ग्राम तक सेवन किया जा सकता है।
· वयस्क इसके क्रूड ड्रग्स की खुराक 5 से 10 ग्राम तक ले सकते हैं।
· हर्बल चाय के लिए दिनभर में इसके सूखे पत्तों का 6 ग्राम तक इस्तेमाल किया जा सकता है।
· आर्टिचोक का उपयोग कैसे किया जाए, यह बताने के बाद अब हम नीचे आर्टिचोक के नुकसान के बारे में बता रहे हैं।
आर्टिचोक के नुकसान –
आर्टिचोक के फायदे के साथ ही इसका अत्यधिक मात्रा में सेवन स्वास्थ्य को नुकसान भी पहुंचा सकता है। नीचे हम कुछ आम आर्टिचोक के नुकसान के बारे में बता रहे हैं
· गैस की समस्या।
· पेट में ऐंठन के साथ मामूली दस्त।
· एलर्जिक रिएक्शन।
· मतली और हार्ट बर्न।
· गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान इसका उपयोग न करने की सलाह दी जाती है।
· एंटीकोआगुलंट्स दवाइयों का प्रभाव कम कर सकता है, जैसे फेनप्रोकोमोन और वारफरिन)। ये दवाइयां रक्त के थक्कों को रोकने का काम करती हैं।
· कमजोरी महसूस होना।
· भूख में कमी या अत्यधिक भूख लगना।
बुद्धि, स्मरण शक्ति के अलावा ब्राह्मी का प्रयोग कई स्वास्थ्य समस्याओं के लिए किया जाता है। आर्युवेद में इस औषधि का काफी महत्व है। ब्राह्मी हरे और सफेद रंग की होती है। इसका स्वाद फीका होता है और इसकी तासीर शीतल होती है। यह पौधा भूमि पर फैलकर बड़ा होता है।
कब्ज में फायदेमंद
ब्राह्मी में मौजूद औषधीय गुण कब्ज की समस्या को दूर करने में मददगार होते हैं। इसका नियमित सेवन करने से कब्ज की पुरानी से पुरानी समस्या दूर हो जाती है। ब्राह्मी में रक्तशोधक गुण पाये जाते हैं जिससे यह पेट की समस्या से बचाते हैं।
कार्यक्षमता बढ़ाए
ब्राह्मी के पौधे के सभी भाग उपयोगी होते हैं। जहां तक हो सके ब्राह्मी को ताजा ही प्रयोग करना चाहिए। ब्राह्मी का प्रभाव मुख्यत: मस्तिष्क पर पड़ता है। यह मस्तिष्क के लिए टॉनिक है ही, उसे शान्ति भी देती है। लगातार मानसिक कार्य करने से थकान हो जाने पर जब व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है तो ब्राह्मी के उपयोग से आश्चर्यजनक लाभ होता है।
एकाग्रता बढ़ाए
जिन बच्चे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते हैं या उनमें एकाग्रता की समस्या है तो उन्हें 200 मिली गर्म दूध में 1 चम्मच ब्राह्मी का चूर्ण हर रोज खाने के लिए दें। इससे उनकी स्मरण शक्ति में वृद्धि होती तथा उनका पढ़ाई में मन भी लगने लगता है।
खांसी और बुखार दूर करे
ब्राह्मी 2.5 ग्राम, शंखपुष्पी -2.5 ग्राम ,बादाम क़ी गिरी पांच ग्राम, छोटी इलायची का पाउडर -2.5 ग्राम, इन सब को पानी में अच्छी तरह घोलकर छान लें और मिश्री मिलाकर सुबह शाम आधा से एक गिलास पीएं...इससे खांसी, बुखार में लाभ तो मिलता ही है।
भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान इस कदर व्यस्त है कि अपनी सेहत के लिए भी समय नहीं निकाल पाता। फलस्वरूप, आप आसानी से कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। इन सभी मुसीबतों से पीछा छुड़ाने का एक बेहतरीन विकल्प है योग और मेडिटेशन यानी कि ध्यान लगाना। इसे करने के कई तरीके हैं, जिसके लिए न तो आपको अपनी दिनचर्या में बड़ा बदलाव करना होगा और न ही कोई खास तैयारी करनी होगी।
मेडिटेशन (ध्यान) कैसे करें
ध्यान लगाना हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है, लेकिन कई लोगों में मेडिटेशन को लेकर सवाल उठता है कि आखिर मेडिटेशन कैसे करें। बता दें मेडिटेशन करने के तरीके में कुछ खास नियम शामिल हैं। इन्हें ध्यान रखना बहुत जरूरी है। इन्हें अपनाकर आप मेडिटेशन की शुरुआत कर सकते हैं
बैठने की प्रक्रिया- सबसे पहले आप वज्रासन, सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं। बैठने की स्थिति में ध्यान रहे कि आपकी रीढ़ सीधी रहे, ताकि आप सही से सांस ले सकें। वहीं, अगर आप किसी वजह से इन आसनों में बैठ पाने में समर्थ नहीं हैं, तो कुर्सी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
सांस लेना- आराम की अवस्था को हासिल करने के बाद अपने सांस लेने की प्रक्रिया पर ध्यान दें। अपने शरीर को प्राकृतिक रूप से सांस लेने के लिए प्रेरित करें। इसके बात धीरे-धीरे गहरी सांस लें और फिर उसे उसी प्रकार बाहर निकालें। ध्यान के लाभ को हासिल करने के लिए इस क्रिया को पूरे मन से कई बार दोहराएं।
किसी एक बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करें- तीसरे चरण में अब अपना ध्यान किसी एक बिंदु पर केंद्रित करने का प्रयास करें। इसके लिए आप अपनी आत्मा या अंतर्मन पर ध्यान केंद्रित करें। इसके लिए आप एक से पांच तक गिनती करें। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराएं। वहीं, आप किसी ऐसी चीज या विचार पर भी ध्यान केंद्रित करने का प्रयास कर सकते हैं, जो आपको सुख का अनुभव देता हो।
सकारात्मक रवैया अपनाएं- अगर आप पहली बार मेडिटेशन कर रहे हैं, तो संभव है कि आपका मन बार-बार अन्य विचारों की ओर जाएगा। इस कारण जरूरी होगा कि मन में संतुलन की अवस्था को बनाने की कोशिश करें और मन को भटकने न दें। अगर मन किसी कारण भटक जाए, तो उसे दोबारा केंद्रित करने का प्रयास करें।
भ्रम जाल से बचाव- नींद आना, खुजली का होना, भावनाओं का अनुभव, दिवास्वप्न (जागते हुए सपने देखना), कई प्रकार के विचारों का लगातार आना और जाना आदि कुछ ऐसे भ्रम जाल हैं, जो मेडिटेशन को तोड़ने का काम करते हैं। इसलिए, जरूरी होगा कि आप अपने मन को समझाएं कि यह केवल आपको विचलित करने वाले कारक है, जो आपके मेडिटेशन के रास्ते में रोड़ा बन सकते हैं। इनसे बचने का प्रयास करें और मन को एकाग्र करें। इन सभी बाधाओं को पार करने के बाद ध्यान की चरम सीमा को हासिल कर सकते हैं। यहां तक पहुंचने के लिए नियमित अभ्यास की जरूरत होती है।
मेडिटेशन के प्रकार –
मेडिटेशन के प्रकारों की बात करें, तो इसे करने के कई तरीके हैं, जिन्हें अनेक भागों में विभाजित कर दिया गया है। इनमें से कुछ खास के बारे में हम आपको बताने का प्रयास करेंगे
1. आध्यात्मिक मेडिटेशन
2. आध्यात्मिक ध्यान आपको मोह-माया से अलग दुनिया को देखने में मदद करता है। इसके निरंतर उपयोग से आप अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में समर्थ होते हैं। इससे विचारों और अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए नई मानसिक ऊर्जा का आप में संचार होता है।
2. विपश्यना मेडिटेशन
ध्यान का यह तरीका सबसे प्राचीन माना गया है। बताया जाता कि ध्यान के इस तरीके को करीब 2500 साल पहले महात्मा बुद्ध ने प्रचारित और प्रसारित किया गया था। मेडिटेशन का यह प्रकार आज व्यापक रूप से उपयोग में लाया जाता है। इसकी सहायता से मनुष्य अपने मन के भीतर झांक कर खुद को समझने की कोशिश करता है। इसकी सहायता से मनुष्य अपने विचारों व भावनाओं को नियंत्रित करने के साथ सही और गलत में फर्क करने की क्षमता को विस्तार देने में समर्थ होता है।
3. जेन मेडिटेशन
मेडिटेशन का यह प्रकार चीनी बौध धर्म द्वारा प्रचारित और प्रसारित किया गया। बता दें कि ध्यान का यह तरीका माइंडफुलनेस मेडिटेशन के अंतर्गत आता है, जिसमें दिमाग को एकाग्र करने पर खास ध्यान दिया जाता है। ध्यान की इस मुद्रा में आपको सुखासन मुद्रा में बैठकर और हाथों को आपस में मिलाते हुए बैठना होता है। ध्यान की इस स्थिति में आपको मुख्य रूप से अपने दैनिक कार्यों पर ध्यान लगाने की आवश्यकता होती है। ध्यान का यह प्रकार आपको दिमागी रूप से विकसित और समृद्ध बनाने में सहायक माना जाता है।
4. शिव मेडिटेशन
शिव ध्यान आध्यात्मिक ध्यान का ही एक प्रकार है। इसमें आप एक आध्यात्मिक ऊर्जा को केंद्र बिंदु मानकर अपना ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करते हैं। यह प्रक्रिया आपको चेतन मन के परे ले जाकर अपने अचेतन मन में झांकने के लिए प्रेरित करती है। इससे दुनिया को समझने और उसे अनुभव करने के नजरिए में बदलाव महसूस होता है।
5. राजयोग मेडिटेशन
ध्यान के इस प्रकार का उल्लेख सबसे पहले श्रीमद्भगवत गीता में किया गया था। वहीं, 19वीं शताब्दी में स्वामी विवेकानंद ने इस प्रकार को प्रचारित और प्रसारित किया। ध्यान का यह प्रकार आपको शांत रहने और खुद का निरीक्षण करने में मदद करता है। इससे आपके व्यक्तित्व में गंभीरता का भाव पनपता है। इस योग की खास बात यह है कि इसमें किसी प्रकार के मंत्रों का उपयोग नहीं किया जाता। योग की इस प्रक्रिया में आप अपनी आंखें खुली रख कर ध्यान लगा सकते हैं।
6. ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन
मेडिटेशन के इस प्रकार में मनुष्य अपने भीतर यानी अचेतन मन में झांकने का प्रयास करता है। इसके लिए किसी खास मंत्र का उपयोग भी किया जा सकता है। यह आपको भौतिक बाधाओं (दुख, सुख, खुशी और गम) से दूर ले जाकर अपने अस्तित्व का एहसास कराता है। जो आपको यह समझने में मदद करता है कि भौतिक चीजों का दुनिया में कोई भी मोल नहीं हैं।
7. मंत्र मेडिटेशन
मंत्र मेडिटेशन ध्यान का एक ऐसा प्रकार है, जो ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन के अंतर्गत ही आता है। इसमें अपने ध्यान को केंद्रित करने के लिए मंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। ध्यान रहे यहां मंत्रों से अर्थ किसी धार्मिक परिवेश से जुड़ा हुआ नहीं है। यहां मंत्र का अर्थ किसी शब्द, वाक्य, गाने या कुछ और जिसे बोलने से आपको खुशी या संतुष्टि का एहसास हो सकता है, उससे से है।
8. मूवमेंट मेडिटेशन
मेडिटेशन का यह प्रकार माइंडफुलनेस मेडिटेशन के अंतर्गत आता है। बता दें कि ध्यान के इस प्रकार में किसी एक कार्य को लक्ष्य मानकर प्रयास किया जा सकता है। इसे हठ योग भी कहा जा सकता है। मेडिटेशन की यह प्रक्रिया किसी विशेष कार्य की पूर्ति होने तक उस पर आपका ध्यान केंद्रित करने में आपकी मदद करती है। ध्यान के इस प्रकार की खास बात यह है कि इसे चलते-फिरते किया जा सकता है।
9. फोकस मेडिटेशन
ध्यान का यह प्रकार विपश्यना मेडिटेशन के अंतर्गत ही आता है। इसमें व्यक्ति किसी मूर्ती, वस्तु या फिर अपनी अंतरात्मा पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रक्रिया को नियमित अपनाने से इंसान का दिमागी विकास होता है। साथ ही किसी काम को केंद्रित होकर करने की क्षमता पैदा होती है।
इसके प्रकारों को जानने के बाद हम मेडिटेशन के लाभ के बारे में विस्तार से जानेंगे।
मेडिटेशन के फायदे
मेडिटेशन के लाभ कई होते हैं, जिनमें से कुछ के बारे में हम आपको कुछ बिन्दुओं के माध्यम से समझाएंगे ।
तनाव में कमी- नियमित रूप से मेडिटेशन करने से तनाव कम होता है और दिमागी शांति का अनुभव होता है।
चिंता और अवसाद में कमी- मेडिटेशन के उपयोग से चिंता और अवसाद से भी छुटकारा पाने में सफलता हासिल की जा सकती है।
दिमागी विकास- मेडिटेशन दिमागी विकास के लिए भी काफी लाभकारी माना जाता है। कारण यह है कि इसकी सहायता से तनाव, चिंता और अवसाद जैसे दिमागी विकारों से छुटकारा मिलता है। इनसे बचाव के साथ दिमाग के कार्य करने की क्षमता प्रबल हो जाती है।
दर्द से छुटकारा- ध्यान करने की क्रिया शरीर में रक्त प्रवाह को संतुलित करती है और दिमाग को शांत करती है। इस कारण इसकी मदद से आत्मिक और भौतिक (शारीरिक) दोनों प्रकार के दर्द से छुटकारा मिल जाता है।
ब्लड प्रेशर- मेडिटेशन ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने का भी एक उत्तम उपाय माना जाता है। कारण यह है कि इसका उपयोग दिमागी शांति प्रदान करता है। साथ ही शरीर में रक्त प्रवाह को भी नियंत्रित करने का काम करता है। ये दोनों ही ब्लड प्रेशर से संबंधित जोखिम कारक हैं, इसलिए इसके नियमित उपयोग से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी सहायता मिलती है।
ह्रदय स्वास्थ्य- मेडिटेशन को ह्रदय स्वास्थ्य से संबंधित सभी जोखिम कारकों जैसे :- तनाव, चिंता और ब्लड प्रेशर को कम करने में सहायक माना गया है ।
नींद में सुधार : माइंडफुलनेस मेडिटेशन को नींद में सुधार के लिए फायदेमंद माना जाता है। वहीं, इस संबंध में किए गए एक शोध में इस बात की पुष्टि की गई है कि इसका उपयोग नींद से संबंधित समस्याओं को दूर करने में लाभदायक माना जा सकता है ।
फायदों को जानने के बाद अब उपयोग में लाई जाने वाली कुछ जरूरी मेडिटेशन टिप्स के बारे में बताएंगे।
मेडिटेशन (ध्यान) के टिप्स
1. सही समय
मेडिटेशन के लिए समय का अपना एक अलग महत्व होता है। यही वजह है कि मेडिटेशन करने के लिए सूर्योदय के समय को सबसे अच्छा माना जाता है। कारण यह है कि सुबह के समय आपका शरीर तनाव मुक्त और नई ऊर्जा से भरपूर होता है। इसलिए, अगर आप मेडिटेशन करने की सोच रहे हैं, तो सुबह 6 से 7 बजे के बीच का समय चुनाव के लिए बेहतर माना जा सकता है ।
2. शांत वातावरण
मेडिटेशन करने के लिए दिमाग का शांत होना बहुत जरूरी है, क्योंकि अगर आपका ध्यान अन्य चीजों में लगा रहेगा, तो मन को एकाग्रचित कर पाने में आप सक्षम नहीं हो पाएंगे। इसलिए, शांत वातावरण यानी एकांत का होना बहुत जरूरी है , नहीं तो मेडिटेशन करने में आपको दिक्कत महसूस होगी। साथ ही व्यापक परिणाम भी हासिल नहीं हो पाएंगे। इसलिए, जरूरी है कि मेडिटेशन को शुरू करने से पहले आप यह सुनिश्चित कर लें कि इसके लिए आपने जिस जगह का चुनाव किया है, वह शोर-शराबे से मुक्त हो।
3. आरामदायक कपड़ों का चयन
मेडिटेशन में कपड़ों का चुनाव भी अहम भूमिका निभाता है। कारण यह है कि अगर आप चुस्त कपड़ों का चयन करते हैं, तो वह आपके ध्यान को भटकाने का काम कर सकते हैं। इसलिए, यह जरूरी है कि इस दौरान हल्के और आरामदायक कपड़ों को इस्तेमाल में लाया जाए ।
4. वार्म अप
अब आती है मेडिटेशन के लिए अंतिम पड़ाव की बात। बता दें सही समय, शांत दिमाग और सही कपड़ों का चयन करने के बाद मेडिटेशन शुरू करने से पहले हल्का वार्म अप (15 से 20 मिनट) जरूर करें । इससे पूरे शरीर में खून का संचार होना शुरू हो जाएगा, जो मेडिटेशन की प्रक्रिया में मददगार साबित होता है। इसके बाद आप मेडिटेशन के कई तरीकों में से किसी एक का चुनाव कर इस प्रक्रिया को अंजाम दे सकते हैं। मेडिटेशन के नियमों को जानने के बाद अब हम आपको इसके प्रकारों के बारे में बताएंगे।
5. पेट खाली होना
विशेषज्ञों के मुताबिक मेडिटेशन खाली पेट ही करना चाहिए । इससे आप अपने शरीर की सारी ऊर्जा का इस्तेमाल ध्यान केंद्रित करने में कर पाएंगे। साथ ही यह आपको बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद करेगा।
6. गहरी सांस
मेडिटेशन के दौरान आपको गहरी सांस लेनी चाहिए और फिर उसे धीरे-धीरे बाहर छोड़ना चाहिए। साथ ही आपको इस प्रक्रिया को करने में अपने पूरे ध्यान को लगाने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा करने से मन शांत होता है और ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है।
मेडिटेशन टिप्स जानने के बाद अब हम इससे संबंधित कुछ सावधानियों के बारे में बात करेंगे।
मेडिटेशन के लिए कुछ सावधानियां –
मेडिटेशन के दौरान आपको कुछ सावधानियों का भी ध्यान रखना चाहिए, जिसके बारे में हम आपको कुछ बिन्दुओं के माध्यम से समझाएंगे |
अगर आप अपने मेडिटेशन को एक निश्चित समय के लिए करना चाहते हैं, तो आप ऐसी घड़ी को सामने रखें, जो किसी प्रकार की आवाज न करे, क्योंकि आवाज या अलार्म वाली घड़ी ध्यान लगाने में बाधा पैदा कर सकती है।
भारी मात्रा में खाना खाने के बाद मेडिटेशन नहीं करना चाहिए।
व्यायाम के फौरन बाद मेडिटेशन करने से बचना चाहिए।
नींद से जागने के तुरंत बाद या नींद के एहसास में मेडिटेशन नहीं करने की सलाह दी जाती है।
आयुर्वेद में इसे घृतकुमारी के रूप में महाराजा का स्थान दिया गया है एवं औषधि की दुनिया में इसे संजीवनी भी कहा जाता है।
3 जलने पर, अंग कहीं से कटने पर, अंदरूनी चोटों पर एलोवेरा अपने एंटी बैक्टेरिया और एंटी फंगल गुण के कारण घाव को जल्दी भरता है। यह रक्त में शर्करा के स्तर को बनाए रखता है। बवासीर, डायबिटीज, गर्भाशय के रोग, पेट की खराबी, जोड़ों का दर्द, त्वचा की खराबी, मुंहासे, रूखी त्वचा, धूप से झुलसी त्वचा, झुर्रियों, चेहरे के दाग-धब्बों, आँखों के काले घेरों, फटी एडियों के लिए यह लाभप्रद है। इसका गूदा या जैल निकालकर बालों की जड़ों में लगाना चाहिए। बाल काले, घने-लंबे एवं मजबूत होंगे।
4 यह मच्छर से भी त्वचा की सुरक्षा करता है। आजकल सौंदर्य निखार के लिए हर्बल कॉस्मेटिक प्रोडक्ट के रूप में बाजार में एलोवेरा जैल, बॉडी लोशन, हेयर जैल, स्किन जैल, शैंपू, साबुन, फेशियल फोम, और ब्यूटी क्रीम में हेयर स्पा में ब्यूटी पार्लरों में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। कम से कम जगह में, छोटे-छोटे गमले में एलोवेरा आसानी से उगाया जा सकता है।
5 एलोवेरा जैल या ज्यूस मेहंदी में मिलाकर बालों में लगाने से बाल चमकदार व स्वस्थ होंगे। एलोवेरा के कण-कण में सुंदर एवं स्वस्थ रहने के कई-कई राज छुपे पड़े हैं। यह संपूर्ण शरीर का कायाकल्प करता है। बस, जरूरत है तो रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी से थोड़ा सा समय अपने लिए चुराकर इसे अपनाने का।
अगर आपको दूर या पास का कम दिखाई दे, गाड़ी ड्राइव करने में समस्या हो या आप दूसरे व्यक्ति के चेहरे के भावों को न पढ़ पाएं तो समझिए की आप की आंखों में मोतियाबिंद विकसित हो रहा है।
लेकिन अत्याधुनिक तकनीकों ने मोतियाबिंद के ऑपरेशन को बहुत आसान और प्रभावी बना दिया है। हाल में प्राप्त विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 2003 से भारत में मोतियाबिंद के कारण होने वाली नेत्रहीनता में 25 प्रतिशत की कमी आई है। इसका कारण है मोतियाबिंद सर्जरी के प्रति लोगों में जागरूकता।
लेंस आंख का एक स्पष्ट भाग है जो लाइट या इमेज को रेटिना पर फोकस करने में सहायता करता है। रेटिना आंख के पिछले भाग पर प्रकाश के प्रति संवेदनशील उतक है।सामान्य आंखों में, प्रकाश पारदर्शी लेंस से रेटिना को जाता है। एक बार जब यह रेटिना पर पहुंच जाता है, प्रकाश नर्व सिग्नल्स में बदल जाता है जो मस्तिष्क की ओर भेजे जाते हैं।
रेटिना शार्प इमेज प्राप्त करे इसके लिए जरूरी है कि लेंस क्लियर हो। जब लेंस क्लाउडी हो जाता है तो लाइट लेंसों से स्पष्ट रूप से गुजर नहीं पाती जिससे जो इमेज आप देखते हैं वो धुंधली हो जाती है।इसके कारण दृष्टि के बाधित होने को मोतियाबिंद या सफेद मोतिया कहते हैं।
नजर धुंधली होने के कारण मोतियाबिंद से पीड़ित लोगों को पढ़ने, नजर का काम करने, कार चलाने (विशेषकर रात के समय) में समस्या आती है।
मोतियाबिंद क्यों होता है इसके कारणों के बारे में स्पष्ट रूप से पता नहीं है, लेकिन कुछ फैक्टर्स हैं जो मोतियाबिंद का रिस्क बढ़ा देते हैं;
· उम्र का बढ़ना
· डायबिटीज
· अत्यधिक मात्रा में शराब का सेवन
· सूर्य के प्रकाश का अत्यधिक एक्सपोजर
· मोतियाबिंद का पारिवारिक इतिहास
· उच्च रक्तदाब
· मोटापा
· आंखों में चोट लगना या सूजन
· पहले हुई आंखों की सर्जरी
· कार्टिस्टेरॉइड मोडिकेशन का लंबे समय तक इस्तेमाल
· धुम्रपान
अधिकतर मोतियाबिंद धीरे-धीरे विकसित होते हैं और शुरूआत में दृष्टि प्रभावित नहीं होती है, लेकिन समय के साथ यह आपकी देखने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसके कारण व्यक्ति को अपनी प्रतिदिन की सामान्य गतिविधियों को करना भी मुश्किल हो जाता है। मोतियाबिंद के प्रमुख लक्षणों में:
· दृष्टि में धुंधलापन या अस्पष्टता
· बुजुर्गों में निकट दृष्टि दोष में निरंतर बढ़ोतरी
· रंगों को देखने की क्षमता में बदलाव क्योंकि लेंस एक फ़िल्टर की तरह काम करता है
· रात में ड्राइविंग में दिक्कत आनाजैसे कि सामने से आती गाड़ी की हैडलाइट से आँखें चैंधियाना
· दिन के समय आँखें चैंधियाना
· दोहरी दृष्टि (डबल विज़न)
· चश्मे के नंबर में अचानक बदलाव आना
हालांकि इसके बारे में कोई प्रमाणित तथ्य नहीं हैं कि कैसे मोतियाबिंद को रोका जा सकता है या इसके विकास को धीमा किया जा सकता है। डॉक्टरों का मानना है कि कईं रणनीतियां मोतियाबिंद की रोकथाम में सहायक हो सकती हैं, जिसमें सम्मिलित हैः
· चालीस वर्ष के पश्चात नियमित रूप से आंखों की जांच कराएं
· सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणें मोतियाबिंद विकसित करने में सहायता कर सकती हैं। जब भी बाहर धूप में निकलें सनग्लासेस लगाएं यह यूवी किरणों को ब्लॉक कर देता है
· अगर आपको डायबिटीज या दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं हैं जिससे मोतियाबिंद का खतरा बढ़ जाता है उनका उचित उपचार कराएं।
अपना वजन सामान्य बनाएं रखें
· रंग-बिरंगे फलों और सब्जियों को अपने भोजन में शामिल करें। इनमें बहुत सारे एंटी-ऑक्सीडेंट्स होते हैं जो आंखों को स्वस्थ्य रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
· धुम्रपान छोड़ें और शराब का सेवन कम से कम करें
जब चश्मे या लेंस से आपको स्पष्ट दिखाई न दे तो सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचता है। सर्जरी की सलाह तभी दी जाती है जब मोतियाबिंद के कारण आपके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित होने लगती है। सर्जरी में जल्दबाजी न करें, क्योंकि मोतियाबिंद के कारण आंखों को नुकसान नहीं पहुंचाता है, लेकिन अगर आपको डायबिटीज है तो इसमें देरी न करें।
मोतियाबिंद के इलाज के लिए ऑपरेशन ही एकमात्र विकल्प है। इस ऑपरेशन में डॉक्टर द्वारा अपारदर्शी लेंस को हटाकर मरीज़ की आँख में प्राकृतिक लेंस के स्थान पर नया कृत्रिम लेंस आरोपित किया जाता है, कृत्रिम लेंसों को इंट्रा ऑक्युलर लेंस कहते हैं, उसे उसी स्थान पर लगा दिया जाता है, जहां आपका प्रकृतिक लेंस लगा होता है।
सर्जरी के पश्चात मरीज़ के लिए स्पष्ट देखना संभव होता है। हालांकि पढ़ने या नजर का काम करने के लिए निर्धारित नंबर का चश्मा पहनने की ज़रूरत पड़ सकती है। पिछले कुछ वर्षोंके दौरान मोतियाबिंद सर्जरी रिस्टोरेटिव से रिफ्रैक्टिव सर्जरी में बदल चुकी है, यानी कि अब यह न सिर्फ मोतिया का इलाज करती है बल्कि धीरे-धीरे चश्मे पर निर्भरता को भी समाप्त करती जा रही है। आधुनिक तकनीकों द्वारा मोतियाबिंद की सर्जरी में लगाए जाने वाले चीरे का आकार घटता गया है, जिससे मरीज़ को सर्जरी के बाद बेहतर दृष्टि परिणाम एवं शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
इस सर्जरी के लिए अस्पताल में रूकने की जरूरत नहीं होती। आप जागते रहते हैं, लोकल एनेसथेसिया देकर आंखों को सुन्न कर दिया जाता है। यह लगभग सुरक्षित सर्जरी है और इसकी सफलता दर भी काफी अच्छी है।
इस प्रक्रिया में, लेंस या तो अल्ट्रा साउंड तरंगों से तोड़ दिया जाता है, इस प्रक्रिया को फैकोइमलसिफिकेशन या फैको कहते हैं, फिर उसे खोखली छोटी सी नली के द्वारा निकाल लिया जाता है, या इसे एक पीस के रूप में ही निकाल लिया जाता है। सामान्य लेंस कैप्सयूल जो लेंस के आसपास होते हैं उनके साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं की जाती है।
इस तकनीक में, लेंस और लेंस कैप्सयूल दोनों को निकाल दिया जाता है। यह तकनीक अब बहुत ही कम मामलों में इस्तेमाल की जाती है।
यह सर्जरी फोरसेप्स या मुड़ी हुई निडल की सहायता से की जाती है। इसमें वैक्यूम का इस्तेमाल करके लेंस को सक करके निकाल लिया जाता है। लेकिन इसमें जो आईओएल (इंट्रा ऑक्युलर लेंस) इम्प्लांट किया जाता है वो उतना स्टेबल नहीं होता, जितना उसे होना चाहिए।
माइक्रोइंसीजन सर्जरी की कमियों को दूर करने के लिए रोबोटिक या फेमटोसेकंड कैटरेक्ट सर्जरी विकसित की गई है। इसमें लेज़र बीम का इस्तेमाल किया जाता है। यह मंहगी होती है और इसमें समय भी अधिक लगता है। इसके परिणाम बहुत बेहतर मिलते हैं। यह सर्जरी सौ प्रतिशत ब्लेड फ्री है। इसमें टांके नहीं लगाए जाते, और यह लगभग दर्द रहित सर्जरी है।
इसमें कैटरेक्ट सर्जरी के लिए जेप्टो कैप्सूलोटॉमी डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है। यह फेमटोसेकंड कैटरेक्ट सर्जरीकी तुलना में सस्ती होती है। जिनकी पुतलियां छोटी (या कॉर्नियल ओपेसिटीज़) है, उनके लिए फेमटो सेकंड लेज़र का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में जेप्टो कैप्सूलोटोमी डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है। यह डिवाइस सर्जरी को आसान बना देता है, इसलिए अधिक जटिल सर्जरियों में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
जब मोतियाबिंद आपके दैनिक कार्यों में दिक्कत पैदा करने लगे तो आपको सर्जरी करा लेनी चाहिए, मोतिये के पकने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से सर्जरी ज़्यादा जटिल हो जाती है।
ज़्यादातर दोनों आँखों की सर्जरी एक साथ नहीं की जाती है। अगर एक आँख में सर्जरी के बाद सुधार अच्छा हो तो दूसरी आँख की सर्जरी अगले दिन भी की जा सकती है। यह मरीज़ और डॉक्टर दोनों की सहूलियत पर निर्भर करता है।
· आपके लेंस और चश्मे बिल्कुल सही नंबर के हों
· अगर पढ़ने के लिए आपको अतिरिक्त प्रकाश की जरूरत पड़ रही हो तो पढ़ने के लिए मैग्नीफाइंग ग्लास का इस्तेमाल करें।
अपने घर की प्रकाश व्यवस्था ठीक कर लें, अधिक रोशनी वाले बल्ब लगाएं
· जब आप बाहर जाएं तो सन-ग्लासेस का इस्तेमाल जरूर करें
· रात में गाड़ी न चलाएं
सर्जरी के बाद जल्द ही आप चलने, पढ़ने, लिखने और टीवी देखने जैसे कार्य कर सकते हैं। हालांकि सर्जरी के बाद पहले हफ्ते के दौरान थकाने वाले कार्य न करना बेहतर है। देखने की क्षमता में सुधार पर ही निर्भर होगा कि आप ड्राइविंग कब शुरू कर सकते हैं। खाने पीने में कोई परहेज़ नहीं होता है।
कुछ मामलों में मरीज़ को सर्जरी के तुरंत बाद साफ़ दिखने लगता है। हालांकि, ज़्यादातर मरीजों को एक या दो दिन बाद साफ़ नज़र आने लगता है।
अक्सर आपने लोगों को खाली पेट कच्चा आंवला खाते हुए देखा होगा. बता दें कि कच्चा आंवला ना केवल पाचन तंत्र को मजबूत बना सकता है बल्कि इसके सेवन से हड्डियां भी मजबूत हो सकती हैं।
आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि यदि आप खाली पेट आंवले का सेवन करते हैं तो इससे क्या-क्या फायदे हो सकते हैं।
खाली पेट आंवला खाने से
व्यक्ति को पाचन तंत्र से संबंधित समस्याएं नहीं होती है. दरअसल आंवले के अंदर फाइबर पाया जाता है जो न केवल पेट की समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है ।बल्कि यदि सुबह के वक्त सेवन किया जाए तो कब्ज और एसिडिटी कि समस्या से भी व्यक्ति को राहत मिल सकती है।
इम्यूनिटी को भी मजबूत
खाली पेट आंवले का सेवन किया जाए तो इससे इम्यूनिटी को भी मजबूत बनाया जा सकता है। जी हां, आंवले के अंदर विटामिन सी पाया जाता है जो न केवल शरीर से टॉक्सिंस को बाहर निकाल सकता है बल्कि फंगल इंफेक्शन और बैक्टीरिया से भी लड़ने में मददगार है।
त्वचा खूबसूरत
त्वचा और बालों के लिए भी आंवला बेहद उपयोगी है .यदि आप खाली पेट आंवले का सेवन करते हैं तो इससे ना केवल बालों को काला घना और चमकदार बनाया जा सकता है। बल्कि आंवले के सेवन से त्वचा खूबसूरत दिखाई दे सकती है।
