देश-दुनिया में नवंबर का माह तमाम अहम वजह से दर्ज है। आज के समय जरूर आवाज रिकॉर्ड करना और रिकॉर्डेड को आवाज सुनना बहुत ही आसान लगता है पर एक वक्त यह कल्पना से परे था।
थॉमस अल्वा एडिसन ने नवंबर, 1877 को दुनिया का पहला फोनोग्राफ बनाकर इसे संभव कर दिखाया। इस फोनोग्राफ में आवाज को रिकॉर्ड किया जा सकता था और बाद में सुना भी जा सकता था। यह वही एडिसन हैं जिन्हें बल्ब का आविष्कार करने का श्रेय भी जाता है। उनका ही फोनोग्राफ आगे चलकर दुनिया में ग्रामोफोन के नाम से मशहूर हुआ।
भारत के भीतर आधुनिक अधोसंरचना के निर्माण का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा हैं। भारत के सीमावर्ती राज्य उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में भी सड़क से लेकर बड़े पुल और बड़े हाईवे से लेकर पहाड़ो के भीतर से बड़ी बड़ी सुरंगे बनायीं जा रही हैं। किन्तु परिस्थितियों के बदलने में एक क्षण भी अधिक माना जाता हैं। ऐसा ही कुछ हुआ उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सिलक्यांरा और बड़कोट के बीच बन रही सुरंग के भीतर 12 नवंबर को सुबह 5 बजकर 30 मिनट के करीब सुरंग खुदाई के समय माल ढ़ोने वाले ट्रक से सपोर्ट के लिए लगी गर्डर पर टक्कर लगी और एकाएक सुरंग धंस गयी, बाहर के लोग बाहर रह गए तो, सुरंग के भीतर काम कर रहे लगभग 41 मजदूर सहित अधिकारी 60 मीटर मलवे के पीछे सुरंग में ही फंस गए। उनके राहत और बचाव का काम आज भी जारी हैं। लगभग 10 दिनों से अधिक हो गए हैं और अब जाकर उनसे सीधा संपर्क स्थापित हो पाया हैं। सभी फंसे लोगो को सुरक्षित निकलने में अभी और भी समय लग सकता हैं।
'ब्लैक ऐंड व्हाइट' बुद्धू बक्सा (टेलीविजन) अपने सहज प्रस्तुतिकरण के दौर से गुजरते हुए कब आधुनिकता के साथ कदमताल करते हुए सूचना क्रांति का सबसे बड़ा हथियार और हर घर की अहम जरूरत बन गया, पता ही नहीं चला। यह दुनिया-जहान की खबरें देने और राजनीतिक गतिविधियों की सूचनाएं उपलब्ध कराने के अलावा मनोरंजन, शिक्षा तथा समाज से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाओं को उपलब्ध कराने, प्रमुख आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए समूचे विश्व के ज्ञान में वृद्धि करने में मदद करने वाला एक सशक्त जनसंचार माध्यम है। यह संस्कृतियों और रीति-रिवाजों के आदान-प्रदान के रूप में मनोरंजन का सबसे सस्ता साधन है, जो तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए पूरी दुनिया के ज्ञान में असीम वृद्धि करने में मददगार साबित हो रहा है। मानव जीवन में टीवी की बढ़ती भूमिका तथा इसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 21 नवंबर को विश्व टेलीविजन दिवस मनाया जाता है।
संचार और वैश्वीकरण में टेलीविजन की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए इसके महत्वों को रेखांकित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व टेलीविजन दिवस मनाने की जरूरत महसूस की गई और आम जिंदगी में टीवी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए आखिरकार टीवी के आविष्कार के करीब सात दशक बाद वर्ष 1996 में विश्व टेलीविजन दिवस मनाने की घोषणा कर दी गई। दरअसल टीवी के आविष्कार को सूचना के क्षेत्र में एक ऐसी क्रांति का आविष्कार माना गया है, जिसके जरिये समस्त दुनिया हमारे करीब रह सकती है और हम अब घर बैठे ही दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली घटनाओं को लाइव देख सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहली बार 21 तथा 22 नवंबर 1996 को विश्व टेलीविजन मंच का आयोजन करते हुए टीवी के महत्व पर चर्चा करने के लिए मीडिया को प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया गया था। उस दौरान विश्व को परिवर्तित करने में टीवी के योगदान और टीवी के विश्व पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में व्यापक चर्चा की गई थी। उसी के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में 17 दिसंबर 1996 को एक प्रस्ताव पारित करते हुए प्रतिवर्ष 21 नवंबर को विश्व टेलीविजन दिवस मनाने का निर्णय लिया गया और तभी से प्रतिवर्ष 21 नवंबर को ही यह दिवस मनाया जाता रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन का आविष्कार 1927 में हुआ माना जाता है और उसके करीब 32 साल बाद इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन ने भारत में पहला कदम रखा। भारत में टीवी का पहला प्रसारण प्रायोगिक तौर पर दिल्ली में दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना के साथ 15 सितंबर 1959 को शुरू किया गया। उस समय टीवी पर सप्ताह में केवल तीन दिन ही मात्र तीस-तीस मिनट के कार्यक्रम आते थे लेकिन इतने कम समय के बेहद सीमित कार्यक्रमों के बावजूद भी टीवी के प्रति लोगों का लगाव बढ़ता गया और यह बहुत जल्द लोगों की आदत का अहम हिस्सा बन गया। दूरदर्शन का व्यापक प्रसार हुआ वर्ष 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के आयोजन के प्रसारण के बाद। दूरदर्शन द्वारा अपना दूसरा चैनल 26 जनवरी 1993 को शुरू किया गया और उसी के बाद दूरदर्शन का पहला चैनल डीडी-1 और दूसरा नया चैनल डीडी-2 के नाम से लोकप्रिय हो गया, जिसे बाद में डीडी मैट्रो नाम दिया गया। भले ही टीवी के आविष्कार के इन दशकों में इसका स्वरूप और तकनीक पूरी तरह बदल चुकी है लेकिन इसके कार्य करने का मूलभूत सिद्धांत अभी भी पहले जैसा ही है।
हालांकि किसी भी वस्तु के अच्छे और बुरे दो अलग-अलग पहलू भी हो सकते हैं। कुछ ऐसा ही सूचना एवं संचार क्रांति के अहम माध्यम टीवी के मामले में भी है। एक ओर जहां यह मनोरंजन और ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है और नवीनतम सूचनाएं प्रदान करते हुए समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, वहीं इसके नकारात्मक प्रभाव भी सामने आते रहे हैं। टेलीविजन की ही वजह से ज्ञान, विज्ञान, मनोरंजन, शिक्षा, चिकित्सा इत्यादि तमाम क्षेत्रों में बच्चों से लेकर बड़ों तक की सभी जिज्ञासाएं शांत होती हैं। अगर नकारात्मक पहलुओं की बात करें तो टीवी के बढ़ते प्रचलन के साथ-साथ इस पर प्रदर्शित होते अश्लील, हिंसात्मक, अंधविश्वासों का बीजारोपण करने तथा भय पैदा करने वाले कार्यक्रमों के कारण हमारी संस्कृति, आस्था और नैतिक मूल्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। टीवी पर विभिन्न कार्यक्रमों में लगातार हत्या और बलात्कार जैसे दृश्य दिखाने से बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है। मौजूदा समय में टीवी मीडिया की सबसे प्रमुख ताकत के रूप में उभर रहा है और मीडिया का हमारे जीवन में इस कदर हस्तक्षेप बढ़ गया है कि टीवी के वास्तविक महत्व के बारे में अब लोगों को पर्याप्त जानकारी ही नहीं मिल पाती।
देश में जहां दूरदर्शन की शुरुआत के बाद दशकों तक दूरदर्शन के ही चैनल प्रसारित होते रहे, वहीं 1990 के दशक में निजी चैनल शुरू होने की इजाजत मिलने के साथ एक नई सूचना क्रांति का आगाज हुआ। इन तीन दशकों में निजी चैनलों को लगातार मिलते लाइसेंस के चलते अब देशभर में टीवी पर करीब एक हजार चैनल प्रसारित होते हैं। इससे दूरदर्शन जैसे माध्यम कमजोर हो गए हैं और अब हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां सूचना व संचार माध्यमों ने हमें इस कदर अपना गुलाम बना लिया है कि इनके अभाव में जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते। हालांकि ढेर सारे टीवी चैनलों की बदौलत जहां ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा, सूचना आदि के स्रोत बढ़े हैं, वहीं चिंताजनक स्थिति यह है कि टीआरपी की बढ़ती होड़ में बहुत से निजी टीवी चैनल जिस प्रकार गलाकाट प्रतिद्वंद्विता के चलते समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की अनदेखी करते हुए दर्शकों के समक्ष कुछ भी परोसने को तैयार रहते हैं, उससे युवा पीढ़ी दिशाहीन हो रही है और जनमानस में गलत संदेशों का बीजारोपण होता है। इसीलिए मांग उठने लगी है कि दिशाहीन टीवी कार्यक्रमों के नकारात्मक प्रभावों पर अंकुश लगाने और अपसंस्कृति के प्रसार को रोकने के लिए इन पर कुछ कड़े कानूनी प्रतिबंधों का प्रावधान होना चाहिए।
योगेश कुमार गोयल
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने हालिया प्रयास में एक एंटीवायरल दवा का परीक्षण किया है जिससे डेंगू वायरस को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। वर्तमान टीकों की सीमाओं के मद्देनज़र यह प्रयास काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह एक विशेष किस्म का परीक्षण था जिसे मानव चुनौती परीक्षण कहते हैं। इसमें चंद स्वस्थ व्यक्तियों को पहले जानबूझकर वायरस से संक्रमित किया जाता है और फिर इलाज किया जाता है।
जेएनजे-1802 नामक इस दवा ने शुरुआती परीक्षणों में डेंगू संक्रमण को रोकने में काफी अच्छे परिणाम दिए हैं। 31 प्रतिभागियों पर इस दवा की उच्च खुराक वायरस के खिलाफ एक मज़बूत ढाल साबित हुई। इसमें से कुछ प्रतिभागी तो संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित रहे जबकि अन्य में वायरस की प्रतिलिपियां बनाने की दर काफी कम देखी गई। यह परिणाम अमेरिकन सोसायटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किए गए हैं।
गौरतलब है कि जेएनजे-1802 वायरस के दो प्रोटीनों के बीच एक ज़रूरी अंतर्क्रिया को रोकने का काम करती है। डेंगू वायरस की प्रतिलिपियां बनने के लिए यह अंतर्क्रिया अनिवार्य होती है। वर्तमान डेंगू टीकों की तुलना में यह नया तरीका काफी प्रभावी है।
पुराने टीकों के साथ समस्या थी कि महीनों तक इनकी कई खुराक लेना पड़ता था। और तो और, मनुष्यों को संक्रमित करने वाले चार अलग-अलग डेंगू सीरोटाइप के खिलाफ ये टीके समान रूप से प्रभावी भी नहीं थे। लेकिन जेएनजे-1802 प्रकोप के दौरान जल्द से जल्द सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है। वैज्ञानिकों के अनुसार भविष्य में यह डेंगू नियंत्रण का एक अमूल्य साधन बन सकता है।
फिलहाल इसका दूसरा चरण एक प्लेसिबो-तुलना चरण है जिसमें लैटिन अमेरिका और एशिया के लगभग 2000 वालंटियर्स शामिल हो रहे हैं। उम्मीद है कि इसके परिणाम 2025 तक मिल जाएंगेे।
इस अध्ययन में उपयोग किए गए डेंगू वायरस संस्करण का चयन भी काफी दिलचस्प है। यह वही स्ट्रेन है जिसने 1970 के दशक में इंडोनेशिया में हल्के शारीरिक लक्षण उत्पन्न किए थे। 2000 के दशक की शुरुआत में, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने इस संस्करण को कमज़ोर करके और इसमें विशिष्ट संशोधन करके इसे उम्मीदवार टीके के रूप में उपयोग किया था। लेकिन जब इसे गैर-मानव प्रायमेट्स को दिया गया, तो वायरस कमज़ोर साबित नहीं हुआ। इस कारणवश इस संस्करण को टीके के विकास में नहीं लिया गया। फिर भी, जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी की वैज्ञानिक एना डर्बिन और उनकी टीम ने इस संस्करण को एक चुनौती के रूप में देखा। इस संस्करण से पीड़ित लोगों में उन्होंने लगातार वायरस प्रतिलिपिकरण पाया जो प्राकृतिक वायरस के जितनी प्रतिलिपियां बनाता था। इसके संपर्क में आने वाले 90 से 100 प्रतिशत व्यक्तियों में एक विशिष्ट प्रकार की फुंसियां बनती हैं। इससे श्वेत रक्त कोशिका और प्लेटलेट की संख्या कम तो होती है लेकिन खतरनाक स्तर तक नहीं।
यहां एक आश्चर्य की बात यह है कि शोधकर्ताओं ने संक्रमित मच्छरों का उपयोग करने की बजाय वायरस को सीधे इंजेक्शन से देने का विकल्प क्यों चुना। इस मामले में डर्बिन ने स्पष्ट किया कि चयनित संस्करण मच्छरों के शरीर में कुशलतापूर्व प्रतिलिपियां नहीं बनाता था। यह बाह्य रोगियों पर अध्ययनों के लिए एक आदर्श था। इसके चलते मच्छरों द्वारा वायरस फैलाए जाने की चिंता नहीं रही। दूसरी बात यह है मच्छर द्वारा प्रसारित हो तो वायरस की सटीक मात्रा निर्धारित करना मुश्किल है। इंजेक्शन ने यह सुनिश्चित किया कि सभी प्रतिभागी संक्रमित हो गए हैं।
आने वाले समय में जेएनजे-1802 के विविध उपयोगों को समझने का प्रयास किया जा रहा है। यह यात्रियों, सैन्य कर्मियों, गर्भवती महिलाओं और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों के लिए रोकथाम के एक उपाय के रूप में काम कर सकता है। इसके अलावा, शोधकर्ता सक्रिय डेंगू संक्रमण के इलाज के लिए इस दवा की चिकित्सकीय क्षमता की खोज कर रहे हैं।
हालांकि अभी भी इस विषय में काफी काम बाकी है फिर भी इस अध्ययन के नतीजे एक ऐसे भविष्य की आशा प्रदान करते हैं जहां डेंगू का अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)
देश-दुनिया के इतिहास में 20 नवंबर की तारीख तमाम अहम वजह से दर्ज है। यह तारीख दुनिया में ऑटोमेटेड ट्रैफिक सिग्नल के लिए भी खास है। दरअसल 20 नवंबर, 1923 को अमेरिकी पेटेंट ऑफिस ने 46 साल के गैरेट मोर्गन को ऑटोमेटेड ट्रैफिक सिग्नल के लिए पेटेंट नंबर दिया था। इसका मतलब यह नहीं कि ट्रैफिक सिग्नल का अविष्कार मोर्गन ने किया। बल्कि उन्होंने स्टॉप और गो के बीच एक तीसरा विकल्प जोड़ा था। यह था जो ड्राइवर को गाड़ी बंद और शुरू करने से पहले सतर्क कर सके। यही विकल्प आगे जाकर यलो लाइट में तब्दील हुआ।
मोर्गन का जन्म अमेरिका के केंटकी में 1877 में हुआ था। 14 साल की उम्र में वह जॉब की तलाश में ओहियो चला गया। इधर-उधर काम करने के बाद मोर्गन ने 1907 में अपनी रिपेयर शॉप खोली। 1920 में मोर्गन ने 'द क्लीवलैंड कॉल' अखबार निकालना शुरू किया। उस समय ओहियो में काफी ट्रैफिक हुआ करता था। ट्रैफिक सिग्नल भी स्टॉप और गो कमांड पर स्विच होते थे। इससे ड्राइवरों को सिग्नल चालू और बंद होने का संकेत नहीं मिलता था और हादसे की स्थिति बनती थी। मोर्गन ने एक बार सिग्नल पर एक्सीडेंट होते देखा तो उनके दिमाग में सतर्क करने वाले इस तरह के सिग्नल का आइडिया आया। इसका काम स्टॉप और गो के पहले चेतावनी देना था।
चंद्रयान-3 जो 14 जुलाई 2023 शुक्रवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से दोपहर 2:35 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया था | इसकी सफलता के बाद इसरो द्वारा 'आदित्य-L1' को लॉन्च किया गया था |
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) ने देश के पहले सोलर मिशन को 'आदित्य-L1' नाम दिया है। यह इसरो द्वारा 2 सितंबर को चंद्रयान-3 की तरह इसे भी श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर लॉन्च किया गया था | इसे लॉन्च करने का उद्देश्य सूर्य के बारे में अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करना था |
आपको बता दें कि यह स्पेस क्राफ्ट सिर्फ L1 प्वाइंट (बिंदु) तक ही सफर करेगा |और इसरो के अनुसार, पृथ्वी से लार्ज्रेंज बिंदु 1 तक का सफर पूरा करने में लगभग चार महीने लगेंगे।
एल 1 बिंदु की हमारी धरती से दूरी करीब 15 लाख किलोमीटर है | जहां सूरज और पृथ्वी की ग्रेविटी एक दूसरे के समान होती है | इसीलिए यहां मौजूद कोई भी चीज बिना ईंधन खर्च किए अपनी जगह पर लंबे समय तक बनी रह सकती है |
नासा के द्वारा लॉन्च किया गया पार्कर सोलर प्रोब स्पेस क्राफ्ट सूरज के सबसे करीब पहुंचने वाला एक मात्र स्पेस क्राफ्ट है | पार्कर सोलर प्रोब को नासा ने 2018 में अंतरिक्ष में रवाना किया था | अब यह स्पेस क्राफ्ट सूर्य के करीब पहुंचने के साथ ही इस दुनिया का सबसे तेज गति से चलने वाला स्पेस क्राफ्ट भी है |
गुजरात का मांडल बेचराजी स्पेशल इन्वेस्टमेंट सेक्टर (एमबीएसआईआर) ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के सेक्टर में दुनिया के सबसे बड़े ऑटो मोबाइल हब के रूप में उभर रहा है। मारुति सुजुकी और होंडा जैसी वैश्विक कंपनियों के ऑटो मैन्युफैक्चरिंग प्लान्ट्स यहाँ संचालित हैं, जिससे यहाँ के स्थानीय व्यापार और रोजगार को बढ़ावा मिल रहा है।
स्थानीय निवासी रंजीतभाई ठाकोर जो पिछले 20 सालों से सीतापुर गाँव में चाय की दुकान चलाते हैं, वे एमबीएसआईआर के बारे में कहते हैं, “मांडल बेचराजी के स्पेशल इन्वेस्टमेन्ट रीजन बनने से पहले केवल ग्रामीण क्षेत्र के लोग ही उनकी दुकान में चाय पीने आया करते थे। एमबीएसआईआर बनने के बाद यहाँ कनेक्टिविटी बेहतर हो गई है और यहाँ औद्योगिक विकास होने की वजह से टी-स्टॉल पर आने वाले ग्राहकों की संख्या भी बढ़ गई है। पहले हमारी दैनिक आमदनी लगभग 3 से 4 हजार रुपये थी लेकिन एमबीएसआईआर के बनने के बाद हमारी आमदनी दुगुनी हो गई है।”
एमबीएसआईआर बनने से स्थानीय व्यवसायों के साथ-साथ किसानों को भी काफी फायदा हुआ है। इस बारे में बात करते हुए सीतापुर के किसान कनुदानभाई गढ़वी कहते हैं, “20 साल पहले सीतापुर गाँव को पिछड़ा माना जाता था। चार जिलों की सीमा से लगे सीतापुर में ज़मीन की कीमतें बमुश्किल 10,000 रुपये प्रति बीघे मिलती थीं। आज जो जमीन विशेष निवेश क्षेत्र बन रही हैं, उनकी कीमतें कई गुना बढ़ गई हैं, जिससे हमें काफी लाभ हुआ है। साथ ही, यहाँ मौजूद कंपनियों ने अपनी सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) गतिविधियों के हिस्से के रूप में, गांव में शौचालय और सामुदायिक हॉल को भी विकसित किया है। एमबीएसआईआर के कारण ही सीतापुर और आसपास के गांवों के लोगों को यहां स्थापित होने वाली कंपनियों में रोजगार मिल रहा है।”
मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार गुजरात वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट के दसवें संस्करण के आयोजन की ओर आगे बढ़ रही है। 20 साल पहले शुरू हुए वाइब्रेंट गुजरात समिट की सफल योजना के परिणामस्वरूप गुजरात को कई मेगा प्रोजेक्ट मिले हैं, जो गुजरात के भविष्य के विकास का नेतृत्व करेंगे। मांडल बेचराजी एसआईआर, ऐसा ही एक फ्यूचरिस्टिक मेगा प्रोजेक्ट है, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तब की थी, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। आज दुनिया के बड़े उद्योगपति गुजरात में निवेश कर रहे हैं। बहुचराजी के पास प्रसिद्ध कार मैन्युफैक्चरिंग कंपनी मारुति सुज़ुकी का नया मैन्युफैक्चरिंग प्लान्ट स्थापित होने से यहाँ के आसपास के क्षेत्रों में व्यापार और रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।
मांडल-बेचराजी स्पेशल इन्वेस्टमेन्ट रीजन (एमबीएसआईआर) कई बड़े इन्वेस्टमेन्ट्स के साथ ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। आज यहाँ मारुति सुजुकी और होंडा जैसी प्रसिद्ध कार कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स संचालित हैं। एमबीएसआईआर के तहत कुल 102 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल को औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुसार विकसित किया जा रहा है, जिसमें 9 गांव- हालीपुर, सीतापुर, उघरोज, उघरोजपुरा, भागापुरा, गीतापुर, उकरदी, चंदनकी और शिहोर शामिल हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में फेज-1 के तहत सड़क और कनेक्टिविटी से संबंधित काम पूरे हो चुके हैं। फेज-2 में स्ट्रीट लाइट, सीवर लाइन और स्वच्छ पेयजल जैसे काम अगले दो साल में पूरे कर लिये जाएंगे।
गणितज्ञों को कई संख्याएं बहुत दिलचस्प लगती हैं जबकि कुछ संख्याएं नीरस लगती हैं। तो यह देखना दिलचस्प होगा कि गणितज्ञों को संख्याएं क्यों सरस और नीरस लगती हैं।
जैसे, पसंदीदा संख्या पूछे जाने पर गणित का कोई विद्यार्थी शायद पाई (π), या यूलर्स संख्या (e) या 2 का वर्गमूल कहे। लेकिन एक आम व्यक्ति के लिए कई अन्य संख्याएं दिलचस्प हो सकती हैं। जैसे सात समंदर, सातवां आसमान, सप्तर्षि में आया सात। तेरह को बदनसीब संख्या मानना उसे दिलचस्प बना देगा। चतुर्भुज में चार, या पंचामृत के चलते पांच को लोकप्रिय कहा जा सकता है।
इस संदर्भ में एक किस्सा मशहूर है। प्रसिद्ध गणितज्ञ गॉडफ्रे हैरॉल्ड हार्डी का ख्याल था कि 1729 एक नीरस संख्या है। वे इसी नंबर की टैक्सी में बैठकर अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहे अपने गणितज्ञ साथी श्रीनिवास रामानुजन से मिलने पहंुचे और उन्हें बताया कि वे एक नीरस नंबर की टैक्सी में आए हैं। रामानुजन ने तत्काल इस बात खंडन करते हुए कहा था, “यह तो निहायत दिलचस्प संख्या है; यह वह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो संख्याओं के घन के योग से दो तरह से व्यक्त किया जा सकता है (1729 = 123 + 13 = 103 + 93)।”
है ना मज़ेदार - 1729 जैसी संख्या भी दिलचस्प निकली। तो सवाल यह उठता है कि क्या कोई ऐसी संख्या है, जिसमें कोई दिलचस्प गुण न हो। लेकिन गणितज्ञों ने ऐसा तरीका खोज निकाला है जिसकी मदद से किसी भी संख्या के दिलचस्प गुणों का निर्धारण किया जा सकता है। और 2009 में किए गए अनुसंधान से पता चला कि प्राकृत संख्याओं (धनात्मक पूर्ण संख्याओं) को तो स्पष्ट समूहों में बांटा जा सकता है - रोमांचक और नीरस।
संख्या अनुक्रमों का एक विशाल विश्वकोश इन दो समूहों की तहकीकात को संभव बनाता है। गणितज्ञ नील स्लोअन के मन में ऐसे विश्वकोश का विचार 1963 में आया था। वे अपना शोध प्रबंध लिख रहे थे और उन्हें ट्री नेटवर्क नामक ग्राफ में विभिन्न मानों का कद नापना होता था। इस दौरान उनका सामना संख्याओं की एक शृंखला से हुआ - 0, 1, 8, 78, 944....। उस समय उन्हें पता नहीं था कि इस शृंखला की संख्याओं की गणना कैसे करें और वे तलाश रहे थे कि क्या उनके किसी साथी ने ऐसी शृंखला देखी है। लेकिन लॉगरिद्म या सूत्रों के समान संख्याओं की शृंखला की कोई रजिस्ट्री मौजूद नहीं थी। तो 10 वर्ष बाद स्लोअन ने पहला विश्वकोश प्रकाशित किया - ए हैण्डबुक ऑफ इंटीजर सिक्वेंसेस। इसमें लगभग 2400 शृंखलाएं थीं और गणित जगत में इसका भरपूर स्वागत किया गया।
आने वाले वर्षों में स्लोअन को कई शृंखलाएं प्रस्तुत की गईं और संख्या शृंखलाओं को लेकर कई शोध पत्र प्रकाशित हुए। इससे प्रेरित होकर स्लोअन ने अपने साथी साइमन प्लाउफ के साथ मिलकर 1995 में दी एनसायक्लोपीडिया ऑफ इंटीजर सिक्वेंसेस प्रकाशित किया। इसका विस्तार होता रहा और फिर इंटरनेट ने आंकड़ों की इस बाढ़ को संभालना संभव बना दिया।
1996 में ऑनलाइन एनसायक्लोपीडिया ऑफ इंटीजर सिक्वेंसेस सामने आया जिसमें शृंखलाओं की संख्या को लेकर कोई पाबंदी नहीं थी। मार्च 2023 तक इसमें 3 लाख 60 हज़ार प्रविष्टियां थीं। इसमें कोई व्यक्ति अपनी शृंखला प्रस्तुत कर सकता है; उसे सिर्फ यह समझाना होगा कि वह शृंखला कैसे उत्पन्न हुई और उसमें दिलचस्प बात क्या है। यदि इन मापदंडों पर खरी उतरी तो उसे प्रकाशित कर दिया जाता है।
इस एनसायक्लोपीडिया में कुछ तो स्वत:स्पष्ट प्रविष्टियां हैं - जैसे अभाज्य संख्याओं की शृंखला (2, 3, 5, 7, 11...) या फिबोनाची शृंखला (1, 1, 2, 3, 5, 8, 13....)। किंतु ऐसी शृंखलाएं भी हैं - टू-बाय-फोर स्टडेड लेगो ब्लॉक्स की एक निश्चित संख्या (n) की मदद से एक स्थिर मीनार बनाने के तरीकों की संख्या। या ‘लेज़ी कैटरर्स शृंखला' (1, 2, 4, 7, 11, 16, 22, 29,...) या किसी केक को n बार काटकर अधिकतम कितने टुकड़े प्राप्त हो सकते हैं।
यह एनसायक्लोपीडिया दरअसल सारी शृंखलाओं का एक संग्रह बनाने का प्रयास है। लिहाज़ा, यह संख्याओं की लोकप्रियता को आंकने का एक साधन भी बन गया है। कोई संख्या इस संग्रह में जितनी अधिक मर्तबा सामने आती है, उतनी ही वह दिलचस्प है। कम से कम फिलिप गुग्लिएमेटी का यह विचार है। अपने ब्लॉग डॉ. गौलू पर उन्होंने लिखा था कि उनके एक गणित शिक्षक ने दावा किया था कि 1548 में कोई विशेष गुण नहीं हैं। लेकिन ऑनलाइन एनसायक्लोपीडिया में यह संख्या 326 बार प्रकट होती है। थॉमस हार्डी ने जिस संख्या 1729 को नीरस माना था वह इस एनसायक्लोपीडिया में 918 बार नज़र आती है।
तो गुग्लिएमेटी सचमुच नीरस संख्याओं की खोज में जुट गए। यानी ऐसी संख्याएं जो एनसायक्लोपीडिया में या तो कभी नहीं दिखतीं या बहुत कम बार दिखती हैं। संख्या 20,067 की यही स्थिति पता चली। इस वर्ष मार्च तक यह वह सबसे छोटी संख्या थी जो एक भी शृंखला का हिस्सा नहीं थी। इसका कारण शायद यह है कि इस एनसायक्लोपीडिया में किसी भी शृंखला के प्रथम 180 पदों को शामिल किया जाता है। अन्यथा हर संख्या धनात्मक पूर्ण संख्याओं की सूची में तो आ ही जाएगी। इस लिहाज़ से देखा जाए तो संख्या 20,067 काफी नीरस लगती है जबकि 20,068 की 6 प्रविष्टियां मिलती हैं। वैसे यह कोई स्थायी अवस्था नहीं है। यदि कोई नई शृंखला खोज ली जाए, तो 20,067 का रुतबा बदल भी सकता है। बहरहाल, एनसायक्लोपीडिया संख्या की रोचकता का कुछ अंदाज़ तो दे ही सकता है।
वैसे बात इतने पर ही नहीं रुकती और यह एनसायक्लोपीडिया संख्याओं के अन्य गुणों की खोजबीन का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। लेकिन शायद वह गहन गणित का मामला है।
अपनी धुरी पर घूमते हुए पृथ्वी एक लट्टू की तरह डोलती भी है। पृथ्वी के केंद्र में मौजूद पिघला लोहा, पिघलती बर्फ, समुद्री धाराएं और यहां तक कि बड़े-बड़े तूफान भी इस धुरी को भटकाने का कारण बनते हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने पाया है कि ध्रुवों के विचलन में एक इन्सानी गतिविधि - भूजल का दोहन - की भी उल्लेखनीय भूमिका है।
कल्पना कीजिए कि आप अपनी उंगली पर बास्केटबॉल को घुमा रहे हैं। यह अपनी धुरी पर सीधी घूमती रहेगी। लेकिन एक तरफ भी थोड़ी हल्की या भारी हो जाए तो यह असंतुलित होकर डोलने लगेगी और धुरी की दिशा बदल जाएगी। ठीक इसी तरह पृथ्वी की धुरी भी डोलती है जिसके कारण हर साल उत्तरी ध्रुव लगभग 10 मीटर के एक वृत्त पर भटकता रहता है। और इस वृत्त का केंद्र भी सरकता रहता है। हाल ही में पता चला है कि यह केंद्र आइसलैंड की दिशा में प्रति वर्ष लगभग 9 सेंटीमीटर सरक रहा है।
ऑस्टिन स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय के भूविज्ञानी क्लार्क आर. विल्सन इसका एक कारण हर वर्ष सैकड़ों टन भूजल के दोहन को मानते हैं। इसके प्रभाव को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने नए बांधों और बर्फ पिघलने के कारण जलाशयों के भरने जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए ध्रुवों के भटकने का एक मॉडल बनाया। उनका उद्देश्य 1993 से 2010 के बीच देखे गए ध्रुवीय विचलन को समझना था।
इस मॉडल की मदद से उन्होंने पाया कि बांध और बर्फ में हुए परिवर्तन ध्रुवीय विचलन की व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं थे। लेकिन जब उन्होंने इसी दौरान पंप किए गए 2150 गीगाटन भूजल को इस मॉडल में डाला तो ध्रुवीय गति वैज्ञानिकों के अनुमानों के काफी निकट पाई गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार महासागरों में पानी के भार के पुनर्वितरण के कारण पृथ्वी की धुरी इस अवधि में लगभग 80 सेंटीमीटर खिसक गई है। जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स की रिपोर्ट के अनुसार ग्रीनलैंड या अंटार्कटिका में बर्फ के पिघलने से समुद्रों में पहुंचने वाले पानी की तुलना में भूजल दोहन ने ध्रुवों को खिसकाने में एक बड़ी भूमिका निभाई है।
इसका अधिक प्रभाव इसलिए भी देखने को मिला क्योंकि अधिकांश पानी उत्तरी मध्य अक्षांशों से निकाला गया था। मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी भारत और पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका वे इलाके हैं जहां भूजल का ह्रास सर्वाधिक हुआ है। यदि भूजल को भूमध्य रेखा या ध्रुवों के करीब से निकला जाता तो यह प्रभाव कम होता।
शोधकर्ताओं का कहना है कि धुरी में यह बदलाव इतना नहीं है कि मौसमों पर असर पड़े लेकिन इससे अन्य परिघटनाओं के मापन में मदद मिलेगी। इस अध्ययन से यह जांचने में भी मदद मिलेगी कि भूजल निकासी की वजह से समुद्र स्तर में कितनी वृद्धि हुई है। इस नए अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है कि भूजल निकासी की वजह से 1993 से 2010 के बीच वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 6 मिलीमीटर की वृद्धि हुई है।
मिल्की वे स्पाइरल आकाशगंगा का एक प्रकार है जिसके अंदर हमारा सौर मंडल मौजूद है। जब आप रात के समय आकाश की ओर देखते हैं, तब आपको सफ़ेद रंग का चमकदार रौशनी नजर आती है जो मिल्की वे है।
बहुत सारे तारों की मौजूदगी होने के कारण यह इतना चमकीला एवं सफ़ेद दिखाई देता है। मिल्की वे में दो सौ बिलियन से भी ज्यादा तारे मौजूद हैं। मिल्की वे में पाए जाने वाले तारे हमारे सूर्य से कई बिलियन साल पुराने हैं ।
यह एक बड़े से भंवर (whirlpool) के आकार में है, जो 200 मिलियन सालों में एक बार चक्कर लगता है। इसके माध्यम में ब्रह्माण्ड बिंदु (galactic सेंटर) मौजूद है। वहां घने गैस एवं धूल के बादल होने के कारण उसको देख पाना बहुत मुश्किल है। इस कारण इसके केंद्र के दूसरी ओर देखना भी मुश्किल रहा है।
मिल्की वे की संरचना
जब आप रात के समय आकाश की तरफ देखते हो तो आपको सफ़ेद रंग की व्यापक पट्टी नजर आती है, जो मिल्की वे है। ये पट्टी तबसे दिखाई पड़ते रहे हैं, जबसे पृथ्वी का निर्माण हुआ है। मिल्की वे का जो भाग हम पृथ्वी से देख पाते हैं, वह इसका बाहरी भाग माना जाता है। मिल्की वे गर्म गैसों के halo से घिरा हुआ है जो कई हजार लाख प्रकाश वर्ष तक फैला हुआ है एवं घूमता लगाता रहता है।
यह 100,000 प्रकाश वर्ष तक फैला हुआ है। इसके दो arm एवं दो spur हैं। इनमे से एक spur का नाम ओरियन spur है जिसके अंदर हमारा सूर्य विराजमान है। मिल्की वे के दोनों arm का नाम Perseous एवं Saggitrus है। हमारा यह आकाशगंगा फैलता या एक्सपैंड होता रहता है। इसके मध्य में एक ब्लैक होल है जिसे Saggitrus A* नाम दिया गया है।
गैलेक्सी के चारों ओर घुमावदार arm घने गैस एवं धूल के बादलों से बने हुए हैं। इस arm में हमेशा नए तारे बनते रहते हैं। ये सब एक गोल डिस्क के अंदर बन रहे होते हैं। ये 1000 लाइट ईयर के बराबर रहते हैं।
मिल्की वे का मध्य भाग काफी उभरा हुआ है और जैसा कि पहले बताया जा चुका है, यह भाग घने गैस एवं धूल के बादलों से भरा हुआ है – इस कारण हम लोग फिलहाल यह नहीं जानते कि इसके दूसरी ओर क्या है। इस उभरे भाग में डार्क होल का भी वास है जोकि सूर्य से कई बिलियन गुना ज्यादा भारी है। इसका निर्माण एक छोटे से बिंदु के कारण शुरू हुआ था जो घने बादलों के द्वारा और बढ़ते गए एवं इनका स्वरुप भयंकर होता गया।
कुछ अध्ययनों से यह पता चला है कि मिल्की वे का भार सूर्य से 400 बिलियन से 780 बिलियन ज्यादा है। वैज्ञानिक इन बातों के शोध में लगे हुए हैं कि कैसे मिल्की वे पड़ोस में पाए जाने वाले संरचनाओं को प्रभावित करते हैं, जैसे कौन- कौन से तारे पाए जाते हैं, कितने और सौर मंडल मौजूद हैं, क्या किसी दूसरे ग्रह पर जीवन संभव है इत्यादि।
