चाणक्य नीति:-विपत्ति में क्या करें | The Voice TV

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"छोटा सा बदलाव ही जिंदगी की एक बड़ी कामयाबी का हिस्सा होता है"।

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चाणक्य नीति:-विपत्ति में क्या करें

Date : 18-Oct-2023

 आपदर्थे धनं रक्षेद दारान रक्षेद धनैरपि |

आत्मानं सततं रक्षेद दारैरपि धनैरपि ||

विपत्ति के समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए | धन से अधिक रक्षा पत्नी की करनी चाहिए | किन्तु अपनी रक्षा का प्रश्न सम्मुख आने पर धन और पत्नी का बलिदान भी करना पड़े तो भी नहीं चुकना चाहिए |

संकट, दुःख में धन ही मनुष्य के कम आता है | अतः ऐसे संकट में समय में संचित धन ही कम आता है इसलिए मनुष्य को धन की रक्षा करनी चाहिए | पत्नी धन से भी बढ़कर है , अतः उसकी रक्षा धन से पहले करनी चाहिए | किन्तु धन एवं  पत्नी से पहले तथा इन दोनों से बढ़कर अपनी रक्षा करनी चाहिए | अपनी रक्षा होने पर इनकी तथा अन्य सबकी भी रक्षा की जा सकती है |

आचार्य चाणक्य धन के महत्त्व को कम नहीं करते क्योंकि धन से व्यक्ति के अनेक कार्य सधते हैं किन्तु परिवार की भद्र महिला, स्त्री अथवा पत्नी के जीवन-सम्मान का प्रश्न सम्मुख आ जाने पर धन की परवाह नहीं करनी चाहिए | परिवार के मान-मर्यादा से ही व्यक्ति की अपनी मान-मर्यादा है | वही चली गई तो जीवन किस काम का और वह धन किस कम का ? पर जब व्यक्ति की स्वयं की जान पर बन आवे तो क्या धन, क्या स्त्री , सभी की चिंता छोड़ व्यक्ति को अपने जीवन की रक्षा करनी चाहिए | वह रहेगा तो ही पत्नी अथवा धन का उपभोग कर सकेगा वरना सब व्यर्थ ही रह जायेगा | राजपूत स्त्रियों ने जब यह अनुभव किया कि राज्य की रक्षा कर पाना या उसे बचा पाना असंभव हो गया तो उन्होंने जौहर व्रत का पालन किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी | यही जीवन का धर्म है |


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