वेद और पुराण पर आधारित महर्षि अरविंद के विकासवादी सिद्धांत | The Voice TV

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वेद और पुराण पर आधारित महर्षि अरविंद के विकासवादी सिद्धांत

Date : 05-Dec-2023

बंगाल के महान क्रांतिकारियों में से एक थे- महर्षि अरविन्द | देश की आध्यात्मिक क्रांति की पहली चिंगारी भी थे। उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में हुआ था | पिता के डी कृष्णघन एक डॉक्टर थे। माँ स्वर्णलता देवी और पत्नी का नाम मृणालिनी था।

इन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा दार्जिलिंग में पूरी की थी, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें उनके भाई के साथ विदेश भेज दिया गया था। उन्होंने इंग्लैंड में सेंट पॉल से पढ़ाई के बाद कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में शिक्षा ली।

अपने पिता की ख़्वाहिश पूरी करने के लिए उन्होंने कैम्ब्रिज में रहते हुए आईसीएस की परीक्षा भी दी और 1890 में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा पास किया, भारत लौटने के बाद 1902 में अहमदाबाद में, कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान, उनकी मुलाक़ात बाल गंगाधर तिलक से हुई और उनसे प्रभावित होकर वे भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े।

1906 में 'वंदे मातरम 'साप्ताहिक के सहसंपादक के रूप में भी, काम शुरू किया और सरकार की जनता विरोधी नीतियों के ख़िलाफ खूब लिखा, जिसके बाद उनपर न सिर्फ मुकदमे दर्ज़ हुए बल्कि जेल भी गए। आज़ादी की लड़ाई में कई बार वे जेल गए। कहते हैं जेल की कोठरी में अरविंद का ज़्यादा समय साधना और तप में गुजरता था।
साल 1910 में अरविंद पुडुचेरी चले गए और वहीँ योग सिद्धि की और आज के वैज्ञानिकों को बताया कि दुनिया को चलाने के लिए एक और जगत भी है। वहीँ उन्होंने श्री अरविंद ऑरोविले की स्थापना की। वे एक महान योगी और दार्शनिक थे। उन्होंने वेद उपनिषद पर न सिर्फ टीका लिखी, योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ भी लिखें।
अरविंद ने डार्विन जैसे जीव वैज्ञानिकों के सिद्धांत से आगे, चेतना के विकास की एक कहानी लिखी और समझाया कि किस तरह धरती पर जीवन का विकास हुआ। वेद और पुराण पर आधारित महर्षि अरविंद के 'विकासवादी सिद्धांत' की यूरोप में भी खूब चर्चा हुई। महर्षि अरविंद की तमाम किताबें और साहित्य विदेशी लाइब्रेरी में भी पढ़ने को मिल जाएंगी, उनकी अनूठी कृति लाइफ डिवाइन (दिव्य जीवन) विश्व की महान कृतियों में गिनी जाती है।

 

महर्षि अरविंद का आश्रम पूर्वी पुडुचेरी में 1926 से योग विज्ञान में दिलचस्पी रखने वालों के लिए साधना का बड़ा केंद्र है।
5 दिसम्बर 1950 को उनका पुडुचेरी में निधन हो गया लेकिन एक महान क्रांतिकारी के रूप में वो आज भी स्मरणीय है |



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