मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं में उनका राष्ट्र प्रेम स्पष्ट प्रदर्शित होता है. गुप्त जी रचनाओं ने देश के नौजवानों को आजादी के आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया-
जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
उन्होंने अपनी रचनाओं में देश के गौरव और सौंदर्य का वर्णन किया है. गौरव और सौन्दर्य के साथ-साथ उन्होंने देश की दुःख की स्थिति पर भी अपनी कविताओं के माध्यम से रोशनी डाली. हिंदी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्वपूर्ण कवि है हिंदी साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से सम्बोधित किया जाता था।
हिंदी साहित्य की बात करें तो इसमें मुख्यतः दो कवियों को राष्ट्र कवि की संज्ञा दी जाती है - मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर।
इन्होंने अपना लेखन कार्य बीसवीं सदी के प्राम्भिक दशक से ही शुरू कर दिया था। तत्कालीन समय में भारत पर ब्रिटिश का शासन था। जनता के मन में स्वयं के प्रति न्यनता घर कर गई थी। ऐसे समय में मैथिलीशरण गुप्त की कृति ‘भारत-भारती’ ने देश की आजादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी.अपने काव्य में भारत के गौरवशाली अतीत में अपने काव्य द्वारा लोगों के मन में स्वाभिमान की भावना को जागृत करने का प्रयास किया और काफी हद तक सफल भी रहे। वे भारत-भारती में लिखते हैं
भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।
कविता से लोगों में आत्मविश्वास की भावना को विकसित किया इसकी बढ़ती लोकप्रियता से तत्कालनी बिहार और मध्य प्रदेश शासन विचलित हो उठे |.
‘भारत-भारती’ के स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय भूमिका से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने मैथिलीशरण गुप्त को ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी दी थी
इस रचना से जनता प्रभावित होकर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में बढ़-चढ़ कर भाग लिया।
मैथिलीशरण गुप्त ने अपने साहित्यिक गुरु महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से ‘भारत-भारती’ की रचना की थी. इस रचना में गुप्त जी ने भारत के स्वर्णिम अतीत का वर्णन तो किया ही है, साथ ही वर्तमान की समस्याओं को उठाते हुए भविष्य की अपनी संकल्पना का भी प्रतिपादन किया है। भारत-भारती के भविष्य खण्ड की उनकी निम्न पंक्तियाँ आज के दौर में भी प्रासंगिक हैं और दूरदर्शी भी
अब तो उठो हे बंधुओं निज देश की जय बोल दो,
बनने लगें सब वस्तुएँ कल कारखाने खोल दो।
जावे यहाँ से और कच्चा माल अब बाहर नहीं,
हो 'मेड इन' के बाद बस अब 'इंडिया' ही सब कहीं॥
रामायण, महाभारत, राष्ट्रप्रेम और मातृशक्ति मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं के प्रमुख केंद्र बिन्दु रहे हैं|अपने जीवनकाल में उन्होंने दो महाकाव्य, 20 खंड काव्य, 17 गीतिकाव्य, चार नाटक और गीतिनाट्य की रचना की. मैथिलीशरण गुप्त जी की मृत्यु 78 वर्ष की आयु में 12 दिसंबर, 1964 को हृदय गति रुकने से हुई.
उनकी रचनाएं हमेशा प्ररेणा देती रही है और सदेव जीवन के उद्देश्य समझाती रहेंगी-
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।
