विवेकानंद ने धर्म को तर्क की कसौटी पर परखने की सीख दी और कहा- धार्मिक बनो लेकिन धर्मान्ध नहीं।
नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय थे जहाँ विश्व भर से छात्र वैसे ही पढ़ने आते थे जैसे आज कैंमब्रिज,आक्सफोर्ड और ट्रिनटी जाते हैं।
विदेशी हमलावरों ने धन दौलत और राज्य बाद में लूटा, उनके पहले निशाने पर यहां के शैक्षणिक संस्थान और यहां की ग्यान परंपरा रही।
बख्तियार खिलजी ने जब नालंदा में आग लगाई तो उसके सैनिक महीनों किताबों को तापते रहे। मध्यकाल तक आते आते सब कुछ लगभग नष्ट हो गया। इसलिये जितने भी ग्यानी थे सबने खुद को ईश्वर के हवाले कर दिया साहित्य में भक्तिकाल इसी परिस्थितिजन्य मजबूरी का नाम है।
अँग्रेज यहाँ आए तो उन्होंने भारतीय शिक्षा संस्कृति व गुरु-शिष्य परंपरा की जाजम ही पलट दी। हम पर ऐसी शिक्षा पद्धति थोपी जो हमारे खुद के वजूद पर ही संदेह पैदा करने वाली थी, उसी को आज भी हम ओढ़े-दसाए चल रहे हैं।
हमारा सनातनी ग्यान और कृतियाँ को जो कैसे भी श्रुति-स्मृति के जरिए चलती चली आईं उन्हें अँग्रेजों ने मिथ करार देकर खारिज करना शुरू कर दिया। अब देसी अँग्रेज उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
आज हालात यह है कि अमेरिका के नासा ने भले ही रामसेतु के अस्तित्व की पुष्टि की हो पर जब हम राम-रामायण, कृष्ण-महाभारत की बात करते हैं और उसे अपने सनातनी गौरव के साथ जोड़ते हैं तो कोई विदेश में रहने वाले नहीं यहाँ के अपने ही देसी विद्वान चढ़ बैठते हैं, बोलने वाले का गला पकड़ लेते हैं।
बहस शुरू हो जाती है कि राम-कृष्ण काल्पनिक पात्र हैं इनका हमारे सनातनी इतिहास से कोई वास्ता नहीं। रामायण-महाभारत में दर्ज प्रसंग महज मायथालाजी हैं, कवियों की कोरी कल्पना।
जिन विद्वानों और अन्वेषकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे भारत की सनातनी संस्कृति, यहां के शोध-अनुसंधान के बिखरे सूत्रों को सहेजकर फिर उसी गौरव को वापस लाने की दिशा में काम करें, वे पूरा वक्त इसी खोज में लगा देते हैं कि हम पूर्वकाल की भारतीय ग्यान की पूँजी को कैसे पुंगी में बदल दें।
अपने देसी बौद्धिकों की इस अधकचरी नस्ल ने देश का सबसे ज्यादा बेडा गर्क किया है। इन्हीं के बनाए वातावरण के चलते हमारा आत्मविश्वास इतना खोंखला हो गया है कि जब किसी प्रतिभा को विदेश में सम्मान मिलता है तभी हम उसे स्वीकार करते हैं।
इन्हें यह बात भी अच्छे से जान लेना चाहिए कि स्वामी विवेकानंद ने शिकागों में उसी सनातनी दर्शन और इन अधकचरे बौद्धिकों द्वारा घोषित कर दिए गए मिथकों और मायथालाजी के ही दृष्टांत देकर भारतीय की मेधा की धाक जमाई।
राजनीति ने भी कुछ कम नुकसान नहीं किया। भारत में यह केंद्रीय तत्व बनकर गर्भगृह में प्रतिष्ठित हो गई। अब तो कोई भी बात राजनीति से शुरू होती है और वहीं खत्म भी।
राजनीति हमारी रगों में आ गई, वायुमंडल में छा गई,अब ग्यान की रोशनी उसी से छनकर हम तक पहुँचती है। नजर उठाकर देखें, अपने यहाँ गली, मोहल्ले, नाले, नरदे से लेकर चौराहे सार्वजनिक इमारतें,यहाँ तक कि ग्यान-विग्यान के संस्थान सभी नेताओं के नाम पर हैं।
यूरोप घूमकर आने वाले बताते हैं कि वहाँ के वैग्यानिकों, कलाकारों का इतना सम्मान है कि सड़क चौराहों की बात छोड़िए हवाई अड्डे तक वैग्यानिकों, कलाकारों के नामपर हैं।
आज हम यदि विश्वगुरु बनने की बात करते हैं तो प्रतिभाओं के आँकलन का अपना पैमाना बनाएं, उन्हें सम्मान दें यह न ताके बैठे रहें कि जब बुकर मिलेगा तभी बड़ा लेखक मानेंगे।
विवेकानंद ने भारतीय स्वाभिमान की वैश्विक प्राणप्रतिष्ठा की। उन्हें युवाओं का आदर्श बनाएं न बनाएं पूजें या न पूजें भारत को हर क्षेत्र में स्वाभिमानी बनाए जैसी कि स्वामी जी की अभिलाषा थी। इस ग्रंथि को हिंद महासागर में विसर्जित कर दें कि जो कुछ विदेश से आ रहा है वही श्रेष्ठ है, यह धारणा बननी चाहिए कि हमारा अपना उससे भी श्रेष्ठ है। लेकिन यह लफ्फाजी नहीं वास्तव में हर मानदंड में श्रेष्ठ रहे इसका भी जतन करें।
लेखक - जयराम शुक्ल
