"भीमा से डॉ.भीमराव आंबेडकर बनने की यात्रा की कुशल सारथी थीं- मातोश्री रमाबाई आंबेडकर" | The Voice TV

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"भीमा से डॉ.भीमराव आंबेडकर बनने की यात्रा की कुशल सारथी थीं- मातोश्री रमाबाई आंबेडकर"

Date : 08-Feb-2024

मातोश्री रमाबाई का जन्म 07 फ़रवरी 1898 वणंदगाव, रत्नागिरी में हुआ था। मातोश्री’ रमाबाई-भीमराव आम्बेडकर बाबा साहेब की पत्नी थीं। आज भी लोग उन्हें ‘मातोश्री’ रमाबाई के नाम से जानते हैं। 7 फ़रवरी 1898 को जन्मी रमा के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। ऐसे में उनके मामा ने उन्हें और उनके भाई-बहनों को पाला।

वर्ष 1906 में 9 वर्ष की उम्र में उनका विवाह बॉम्बे (अब मुंबई) में 14-वर्षीय भीमराव से हुआ। रमाबाई को भीमराव प्यार से ‘रामू’ बुलाते थे और वो उन्हें ‘साहेब’ कहकर पुकारतीं थीं। विवाह के तुरंत बाद से ही रमा को समझ में आ गया था कि पिछड़े तबकों का उत्थान ही बाबा साहेब के जीवन का लक्ष्य है। और यह तभी संभव था, जब वे खुद इतने शिक्षित हों कि पूरे देश में शिक्षा की मशाल जला सके।बाबा साहेब के इस संघर्ष में रमाबाई ने अपनी आख़िरी सांस तक उनका साथ दिया। बाबा साहेब ने भी अपने जीवन में रमाबाई के योगदान को बहुत महत्वपूर्ण माना है। उन्होंने अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ को रमाबाई को समर्पित करते हुए लिखा, कि उन्हें मामूली-से भीमा से डॉ. आम्बेडकर बनाने का श्रेय रमाबाई को जाता है।

 
हर एक परिस्थिति में रमाबाई बाबा साहेब का साथ देती रहीं। बाबा साहेब वर्षों अपनी शिक्षा के लिए बाहर रहे और इस समय में लोगों की बातें सुनते हुए भी रमाबाई ने घर को सम्भाले रखा। कभी वे घर-घर जाकर उपले बेचतीं, तो बहुत बार दूसरों के घरों में काम करती थीं। वे हर छोटा-बड़ा काम कर, आजीविका कमाती थीं और साथ ही, बाबासाहेब की शिक्षा का खर्च जुटाने में भी मदद करती रहीं।
जीवन की जद्दोज़हद में उनके और बाबासाहेब के पांच बच्चों में से सिर्फ़ यशवंत ही जीवित रहे। पर फिर भी रमाबाई ने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि वे खुद बाबासाहेब का मनोबल बढ़ाती रहीं।मातोश्री का देहावसान 27 मई सन् 1935 को हुआ। बाबासाहेब के और इस देश के लोगों के प्रति जो समर्पण रमाबाई का था, उसे देखते हुए कई लेखकों ने उन्हें ‘त्यागवंती रमाई’ का नाम दिया।
 
 
लेखक -डॉ आनंद सिंह राणा

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