अंततः अखंड भारत का सपना होगा साकार
Date : 16-Aug-2024
प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी 15 अगस्त 2024 को पूरे भारतवर्ष में 77वां स्वतंत्रता दिवस बहुत ही धूम धाम से मनाया गया। दरअसल, भारतीय नागरिक 15 अगस्त 1947 के पूर्व अंग्रेजों के शासन के अंतर्गत पराधीन थे एवं 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों के शासन से मुक्त होकर भारतीय नागरिक स्वाधीन हुए। इसलिए इस पर्व को स्वाधीनता दिवस कहना अधिक तर्कसंगत होगा। स्वतंत्र शब्द दो शब्दों से मिलाकर बना है (1) स्व; एवं (2) तंत्र। अर्थात स्वयं का तंत्र, इसलिए स्वतंत्रता दिवस कहना तो तभी न्यायोचित होगा जब स्वयं का तंत्र स्थापित हो। भारत के नागरिकों में आज “स्व” के भाव के प्रति जागृति तो दिखाई देने लगी है और वे “भारत के हित सर्वोपरि हैं” की चर्चा करने लगे हैं। परंतु, भारत में तंत्र अभी भी मां भारती के प्रति समर्पित भाव से कार्य करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है, जिससे कभी कभी असामाजिक तत्व अपने भारत विरोधी एजेंडा पर कार्य करते हुए दिखाई दे जाते हैं और भारत के विभिन्न समाजों में अशांति फैलाने में सफल हो जाते हैं। स्व के तंत्र के स्थापित होने से आश्य यह है कि देश में हिंदू सनातन संस्कृति का अनुपालन सुनिश्चित हो।
प्राचीन काल में भारत विश्व गुरु था। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों सहित लगभग समस्त क्षेत्रों में भारतीय सनातन संस्कृति का दबदबा था। भारत को उस खंडकाल में सोने की चिड़िया कहा जाता था। भारत के विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से पूरे विश्व से विद्यार्थी भारत में आते थे। भारत पर शक, हूण, कुषाण एवं यवन के आक्रमण हुए, परंतु भारत पर उनके कुछ समय के शासन के पश्चात वे भारतीय सनातन संस्कृति में ही रच बस गए एवं भारत का हिस्सा बन गए। परंतु, अरब के देशों से मुसलमान एवं ब्रिटेन से अंग्रेजों के भारत पर चले शासन के दौरान उन्होंने भारतीय नागरिकों का बलात धर्म परिवर्तन करवाया, स्थानीय नागरिकों पर अकल्पनीय अत्याचार किए। भारत के बड़े बड़े प्रतिष्ठानों, मंदिरों एवं ज्ञान के स्थानों को नष्ट किया। अंग्रेजों ने तो भारतीय नागरिकों के साथ छल कपट करते हुए यह भ्रम फैलाया कि अंग्रेजों ने ही भारतीय नागरिकों को जीना सिखाया है अन्यथा भारतीय समाज तो असभ्य, अनपढ़ गंवार था। उन्होंने भारतीय सनातन संस्कृति पर गहरी चोट की। वे भारतीयों में हीन भावना भरने में सफल रहे। भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति को नष्ट किया। गुरुकुल नष्ट किए। अंग्रेजों को नौकर चाहिए थे अतः तात्कालिक शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन किए। इसी प्रकार की शिक्षा प्रणाली देश में आज भी चल रही है, जिसके अंतर्गत शिक्षित भारतीय केवल नौकरी करने के लिए ही उतावाले नजर आते हैं। वे अपना स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने के प्रति रुचि ही प्रकट नहीं करते हैं। भारत में उद्योगपति अपने परिवार की विरासत से ही निकले हैं।
उक्त विखंडित हुए भूभाग से भारत का नाता आज भी बना हुआ है। जैसे, अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित रही हैं, जिन्हें बाद के खंडकाल में तालिबान ने खंडित कर दिया है। महाभारत काल में गांधारी आज के अफगानिस्तान राज्य की निवासी रही है। अफगानिस्तान शिव उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी प्रकार पाकिस्तान में तो तक्षशिला विश्वविद्यालय रहा है, जिसमें विश्व के अन्य देशों से विद्यार्थी अधय्यन के लिए आते थे। हिंगलाज माता का मंदिर है, भगवान झूलेलाल का अवतरण इस धरा पर हुआ था, साधु बेला, संत कंवरराम, ऋषि पिंगल, ऋषि पाणिनि भी इसी धरा पर रहे हैं। भगत सिंह, लाला लाजपत राय एवं आचार्य कृपलानी जैसे देशभक्तों ने भी इसी धरा पर जन्म लिया था। बंगला देश में भी आज ढाकेश्वरी मंदिर स्थित है जिसके नाम पर ही बांग्लादेश की राजधानी को ढाका कहा जाता है। जगदीश चंद्र बोस एवं विपिन चंद्र पाल जैसे महान देशभक्तों ने भी इसी धरा पर जन्म लिया है। नेपाल तो अभी हाल ही के समय तक हिंदू राष्ट्र ही रहा है एवं यहां पर कैलाश मानसरोवर, पशुपति नाथ मंदिर, जनकपुर जहां माता सीता का जन्म हुआ था एवं विश्व प्रसिद्ध लुम्बिनी, आदि नेपाल में ही स्थित हैं। इस दृष्टि से यह ध्यान में आता है कि भारत को एक बार पुनः अखंड क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए क्योंकि भारत से अलग हुए इन सभी देशों की सांस्कृतिक विरासत तो एक ही दिखाई देती हैं।