"भाई-बहिन के प्रेम और विजय के साथ समरसता का प्रतीक है कजलियों का पर्व"
Date : 20-Aug-2024
भुजरियों (कजलियों) की राम राम भाई-बहिन के विजय पर्व की अनंत कोटि शुभकामनाएं।आखिरकार भाई ऊदल के नेतृत्व में बहिन चंद्रावलि की विजय हुई..भुजरियों (कजलियों) का विसर्जन हुआ..पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई.. कीरतसागर, भुजरियों की लड़ाई - जगनिक के आल्हाखड और जनश्रुतियों से साभार)
भारत में पर्व युगों से चली आ रही सांस्कृतिक परम्पराओं, प्रथाओं, मान्यताओं, विश्वासों, आदर्शों, नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक मूल्यों का वह मूर्त प्रतिबिम्ब हैं जो जन-जन के किसी एक वर्ग अथवा स्तर-विशेष की झाँकी ही प्रस्तुत नहीं करते, वरन् सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं। श्रावण मास में रक्षाबंधन के अगले दिन भुजरिया पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रुप से बुंदेलखंड का लोकपर्व है। महान् लोक कवि जगनिक के वीर रस प्रधान काव्य आल्हाखंड में वर्णित कथा के आलोक में यह पर्व जहाँ एक ओर भाई - बहिन के प्रेम और विजय का प्रतीक है, तो वहीं दूसरी ओर अच्छी बारिश, फसल एवं सुख-समृद्धि की कामना के लिए भी मनाया जाता है। इसे कजलियों का पर्व भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ में इसे भोजली कहा जाता है। यह पर्व एक समय संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता था और कजलियां मिलन के माध्यम से सुख - दुख साझा किए जाते थे साथ ही बैर भाव मिटा दिए जाते थे। यह पर्व समाज के सभी वर्गों के पारस्परिक मिलन और समरसता का प्रतीक है।भारत में पर्व युगों से चली आ रही सांस्कृतिक परम्पराओं, प्रथाओं, मान्यताओं, विश्वासों, आदर्शों, नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक मूल्यों का वह मूर्त प्रतिबिम्ब हैं जो जन-जन के किसी एक वर्ग अथवा स्तर-विशेष की झाँकी ही प्रस्तुत नहीं करते, वरन् सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं।