22 अगस्त 1930 : बैतूल में वनवासी आँदोलन : पुलिस गोली चालन : एक बलिदान: अनेक घायल | The Voice TV

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22 अगस्त 1930 : बैतूल में वनवासी आँदोलन : पुलिस गोली चालन : एक बलिदान: अनेक घायल

Date : 22-Aug-2024

ब्रिटिश काल के दस्तावेजों में कुछ ऐसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है जिनका विवरण इतिहास पुस्तकों में नगण्य। ऐसी ही एक घटना बैतूल जिले की है जब वनवासियों ने वनरक्षण और अपने वनाधिकार के लिये संघर्ष किया । इस संघर्ष में अनेक बलिदान हुये किन्तु ब्रिटिश सरकार के गजेटियर में एक बलिदान का उल्लेख है । 

अंग्रेजों ने कानून बनाकर भारत की समस्त वन संपत्ति पर पूर्ण अधिकार कर लिया था और वनवासियों को बंधुआ मजदूर बनाकर उनसे ही वन संपत्ति एकत्र करने का काम लेते थे । वनवासियों से ही बलपूर्वक वनोपज तुड़वाते और व्यापार करके धन कमाते थे । वनवासी वन संपत्ति से पूरी तरह बेदखल हो गये थे । यदि कोई वनवासी अपनी निजी आवश्यकता केलिये कोई वनोपज तोड़ लेता था तो उसे दंडित किया जाता था । यह अंग्रेजों की कूटनीतिक थी कि वनवासी बंधुआ मजदूरों से काम लेने केलिये उनके बीच से ही कुछ लोगों को जमादार बना दिया था । ये जमादार ही वनवासियों से काम लेते थे । जमादारों को अंग्रेज सिपाही नियंत्रित करते थे । वनवासियों पर अंग्रेजों के इस अत्याचार के विरुद्ध बैतूल क्षेत्र के कोरकू वनवासी युवा गंजन सिह कोरकू ने आवाज उठाई । उन्होंने वनवासियों को एकत्र किया और अपने वनों की सुरक्षा करने का आव्हान किया । उन्होने समूचे वनक्षेत्र में घूमकर वनवासियों को संघर्ष केलिये संगठित किया । उनके आव्हान का प्रभाव पड़ा और वनवासी एकत्र होने लगे । वनवासियों के पास साधनों का अभाव था । उनके हथियार कुल्हाड़ी, हँसिया और तीर कमान थे । वे इन्हीं को लेकर संघर्ष केलिये आगे आये । लगभग पांच सौ वनवासियों की टोली तैयार हुई और अंग्रेजों के जमादारों, नाकेदारों और सिपाहियों को भगा दिया । और क्षेत्र के वनों पर अधिकार कर लिया और वहाँ तैनात अंग्रेजों के नाकेदार और चौकीदारों को भगा दिया । इससे अंग्रेज बौखलाए। बड़ी संख्या में पुलिस बल आया । वनवासियों ने मोर्चा लिया । यह 22 अगस्त 1930 का दिन था । पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया । लेकिन वनवासी डटे रहे । पुलिस ने गोली चलाई । इसमें एक वनवासी की मृत्यु हुई । इस बलिदानी का नाम नहीं मिलता । लोक चर्चाओं में कहा जाता है कि अनेक वनवासी बलिदान हुये । जो घायल हुये वे बाद में दिवंगत हुये । इनमें से किसी का उल्लेख नहीं मिलता । पुलिस गंजन सिंह को जीवित पकड़ना चाहते थे लेकिन वे निकलने में सफल हो गये। अंग्रेजों ने उन्हें फरार घोषित करके उनपर पाँच सौ रुपये का ईनाम घोषित किया । लगभग एक माह पश्चात एक विश्वासघाती के कारण गंजन सिंह पचमढ़ी गिरफ्तार कर लिये गये । उन्हें पाँच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई । उन्हें रायपुर जेल में रखा गया ।


लेखक:- रमेश शर्मा 
 

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