भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 मार्च का दिन एक ऐसा दिन है, जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। यह दिन हमारे देश के तीन ऐसे महान क्रांतिकारियों के सर्वोच्च बलिदान का साक्षी है, जिन्होंने अपनी जवानी देश की बलिवेदी पर अर्पित कर दी। इनमें से एक थे—शिवराम हरि राजगुरू। उनका नाम लेते ही न केवल शौर्य और साहस की यादें ताज़ा हो जाती हैं, बल्कि एक ऐसी देशभक्ति का एहसास होता है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को हिलाकर रख दिया था।
प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी विचार
शिवराम हरि राजगुरू का जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे जिले के खेड़ (जिसे आज 'राजगुरुनगर' के नाम से जाना जाता है) में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें निडरता और अन्याय के विरुद्ध लड़ने का जज्बा था। बहुत कम उम्र में ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित हो गए थे। वे 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) के एक सक्रिय और महत्वपूर्ण सदस्य बने। राजगुरू के लिए देश की आज़ादी केवल एक सपना नहीं, बल्कि उनका एकमात्र धर्म था। उन्होंने अपने जीवन का हर क्षण भारत माता की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया।
भगत सिंह और सुखदेव के साथ अटूट बंधन
राजगुरू की पहचान उनके साहसी कार्यों के साथ-साथ भगत सिंह और सुखदेव के साथ उनकी गहरी मित्रता के लिए भी जानी जाती है। यह तिकड़ी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे सशक्त और प्रभावशाली आवाज़ थी। जहाँ भगत सिंह वैचारिक नेतृत्व प्रदान करते थे, वहीं राजगुरू अपने अचूक निशाने और तीव्र प्रतिक्रिया के लिए जाने जाते थे। उन्होंने महसूस किया कि अहिंसक विरोध के साथ-साथ कभी-कभी कठोर प्रहार भी आवश्यक हैं ताकि विदेशी शासकों को यह संदेश दिया जा सके कि भारत का युवा अब चुप नहीं बैठेगा।
सांडर्स हत्याकांड: एक प्रतिशोध का अध्याय
अक्टूबर 1928 में जब लाला लाजपत राय पर पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो गई, तो पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई। इस घटना का बदला लेने के लिए HSRA ने योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को, भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव ने लाहौर में जे.पी. सांडर्स को मार गिराया। राजगुरू ने उस ऑपरेशन में मुख्य भूमिका निभाई थी। यह केवल एक हत्या नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश शासन के उन अत्याचारों के विरुद्ध एक करारा जवाब था। इस घटना के बाद से ही वे ब्रिटिश हुकूमत की आँखों के कांटे बन गए थे।
लाहौर षड्यंत्र केस और फाँसी का निर्णय
सांडर्स हत्याकांड के बाद, ब्रिटिश सरकार ने इन क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। बाद में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और उन पर 'लाहौर षड्यंत्र केस' चलाया गया। जेल में रहने के दौरान भी उन्होंने अपना साहस नहीं खोया। उन्होंने न केवल जेल के कठिन नियमों के खिलाफ भूख हड़ताल की, बल्कि अदालती कार्यवाही को अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रचार का माध्यम बना लिया। अंततः, उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।
23 मार्च 1931: शहादत का दिन
23 मार्च 1931 की शाम, लाहौर जेल में एक ऐसा इतिहास रचा गया जिसने पूरे देश की दिशा बदल दी। तय समय से पहले ही, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फाँसी के तख्ते पर ले जाया गया। कहा जाता है कि उस समय भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बल्कि वे प्रसन्नता के साथ 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे। उन्होंने खुशी-खुशी मौत को गले लगाया ताकि आने वाली पीढ़ियों को यह याद रहे कि स्वतंत्रता इतनी सस्ती नहीं है। उनके बलिदान ने भारत में स्वतंत्रता की अलख को और भी तेज कर दिया।
राजगुरू का योगदान और विरासत
शिवराम हरि राजगुरू केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, वे त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, सुखों और यहाँ तक कि अपने भविष्य की भी परवाह नहीं की। उनका बलिदान देश के युवाओं के लिए आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उनकी शहादत ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर देश के लिए कुछ करना है, तो व्यक्ति को अपने अहंकार और अपने 'मैं' को मिटाना होगा।
