भारतीय संस्कृति के अनंत आकाश में भगवान श्री राम एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी आभा युगों-युगों से मानवता का मार्ग प्रशस्त कर रही है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि केवल एक पंचांग की गणना नहीं है, बल्कि यह वह संधि काल है जब अधर्म के अंधकार को चीरने के लिए 'धर्म' ने साकार रूप धारण किया था। त्रेतायुग के उस पावन मध्याह्न में, जब सूर्य अपने पूर्ण तेज के साथ आकाश के मध्य में स्थित थे, अयोध्या की पावन भूमि पर महाराज दशरथ और माता कौशल्या के आंगन में परब्रह्म का प्राकट्य हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अलौकिक दृश्य का वर्णन करते हुए लिखा है कि उस समय न केवल अयोध्या, बल्कि चराचर जगत आनंदित हो उठा था। शीतल, मंद और सुगंधित पवन बहने लगी थी, देवलोक से पुष्पों की वर्षा हो रही थी और समस्त ऋषि-मुनि हर्षित थे क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि अब असुरों के आतंक का अंत निकट है और विश्व को 'मर्यादा' का पाठ पढ़ाने वाला महापुरुष आ चुका है।
राम नवमी का पर्व भारतीय जनमानस के हृदय में गहरे तक समाया हुआ है। यह पर्व केवल उत्सव मनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह आत्म-मंथन और आत्म-शुद्धि का अवसर है। चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों की कठिन तपस्या और शक्ति की उपासना के पश्चात जब नवमी का उदय होता है, तो वह भक्त की भक्ति की पूर्णता का प्रतीक होता है। राम का अर्थ ही है 'रमण करने वाला'—वह तत्व जो प्रत्येक जीव के भीतर चेतना के रूप में विद्यमान है। श्री राम का जीवन एक ऐसी खुली पुस्तक है जिसका प्रत्येक अध्याय मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न होने का संदेश देता है। एक राजकुमार होने के नाते उन्हें जो सुख प्राप्त होने चाहिए थे, नियति ने उन्हें उनसे वंचित कर वनवास की ओर भेज दिया, किंतु श्री राम के मुख पर न तो कोई शिकन थी और न ही अपने पिता या माता कैकेयी के प्रति कोई द्वेष। यही वह बिंदु है जहाँ से एक साधारण मनुष्य 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनने की यात्रा प्रारंभ करता है।
इस पावन दिवस पर संपूर्ण भारतवर्ष एक विलक्षण आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो जाता है। मंदिरों के कपाट ब्रह्म मुहूर्त में ही खुल जाते हैं और शंखों की मंगल ध्वनि भक्त के सोए हुए अंतर्मन को जागृत कर देती है। राम नवमी की पूजा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण मध्याह्न का होता है। दोपहर के बारह बजते ही, जब भक्त 'भय प्रगट कृपाला दीनदयाला' का सस्वर पाठ करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो समय ठहर गया हो। भगवान के बाल स्वरूप का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है और उन्हें पीले वस्त्रों व आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है। धनिया की पंजीरी का भोग लगाया जाता है, जो आयुर्वेद की दृष्टि से भी इस ऋतु में अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। यह त्योहार हमारी कृषि संस्कृति और स्वास्थ्य विज्ञान से भी कितनी गहराई से जुड़ा है, यह इस छोटे से उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है।
राम नवमी का सामाजिक पक्ष भी अत्यंत सुदृढ़ है। भगवान राम ने अपने जीवन में कभी भी ऊँच-नीच या जाति-पाति के भेदभाव को स्थान नहीं दिया। उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाकर प्रेम की पराकाष्ठा सिद्ध की और निषादराज को गले लगाकर सामाजिक समरसता का उदाहरण प्रस्तुत किया। आज के युग में जब समाज विभिन्न संकीर्ण विचारधाराओं में बंटा हुआ है, राम नवमी का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। शाम के समय जब नगरों में भव्य शोभायात्राएं निकलती हैं और 'जय श्री राम' के नारों से आकाश गूँज उठता है, तो वह केवल एक धार्मिक प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि वह सामूहिक संकल्प होता है—एक ऐसे समाज के निर्माण का जहाँ राम राज्य की कल्पना साकार हो सके। राम राज्य, जहाँ 'दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि व्यापा' अर्थात् जहाँ किसी को भी शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कष्ट न हो।
इस पर्व की सार्थकता तभी है जब हम श्री राम के केवल नाम को न पूजें, बल्कि उनके गुणों को अपने आचरण में उतारें। सत्य बोलना, बड़ों का सम्मान करना, निर्बलों की रक्षा करना और अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहना ही वास्तविक राम-भक्ति है। राम नवमी हमें याद दिलाती है कि रावण केवल बाहर नहीं है, वह हमारे भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार के रूप में भी विद्यमान है। इस पर्व पर संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने भीतर के इन विकारों का दमन करेंगे और विवेक रूपी राम को अपने हृदय के सिंहासन पर विराजमान करेंगे। जब प्रत्येक व्यक्ति मर्यादा में रहकर अपने धर्म का पालन करेगा, तभी यह विश्व वास्तव में शांति और आनंद का धाम बन सकेगा।
