काठमांडू, 09 मई । नेपाल बार एसोसिएशन (एनबीए) ने संवैधानिक परिषद द्वारा वरिष्ठता क्रम को नजरअंदाज कर न्यायमूर्ति मनोज कुमार शर्मा को उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश पद के लिए सिफारिश पर असंतोष व्यक्त किया है। एसोसिएशन ने संवैधानिक परिषद के नियमों में संशोधन से जुड़े अध्यादेश पर भी असहमति जताई है।
एनबीए ने शनिवार को एक बयान में कहा, “विश्वव्यापी रूप से मान्य शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को नजरअंदाज करते हुए सरकार ने संवैधानिक परिषद के माध्यम से पूरी न्यायपालिका पर दीर्घकालीन प्रभाव डालने तथा न्यायपालिका को कार्यपालिका की छाया में रखने के उद्देश्य से परंपरा को तोड़ते हुए जो सिफारिश की है, वह अप्रत्याशित है।”
महासचिव एवं वरिष्ठ अधिवक्ता केदारप्रसाद कोइराला ने बयान में अध्यादेश के माध्यम से शासन चलाने की प्रक्रिया को कानून के शासन का उल्लंघन बताया है। उन्होंने कहा कि संविधान की मूल भावना को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए असंवैधानिक अध्यादेश और उसके आधार पर शासन चलाने की “अप्राकृतिक इच्छा” तथा गैरसंवैधानिक कार्यों के कारण न्यायपालिका के नियंत्रित और निर्देशित होने की आशंका है।
बयान में कहा गया कि संवैधानिक मूल्यों, मान्यताओं और परंपराओं के विरुद्ध ऐसे कदम न्यायपालिका के लिए उचित नहीं हैं और यह केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय भी है।
एनबीए ने आरोप लगाया कि संवैधानिक भावना के विपरीत कानून में संशोधन करने वाले अध्यादेश को “दूषित मंशा” के साथ संसद को दरकिनार कर लाया गया है। अध्यादेश के माध्यम से संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता और यह व्यवस्था केवल अपवादस्वरूप दुर्लभ परिस्थितियों में प्रयोग होनी चाहिए। संगठन ने टिप्पणी की कि ऐसे कदम स्वेच्छाचारिता को बढ़ावा देते हैं। सरकार उत्तरदायी न्यायपालिका को निर्देशित और नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है और इसका विरोध किया जाना आवश्यक है।
उल्लेखनीय है कि नेपाल में प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की अध्यक्षता वाली संवैधानिक परिषद ने न्यायमूर्ति मनोज कुमार शर्मा को देश का नया प्रधान न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की है। न्यायमूर्ति शर्मा चौथे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हैं। वरिष्ठता क्रम को नजरअंदाज करने और संवैधानिक परिषद को लेकर जारी अध्यादेश का विरोध हो रहा है।
नेपाल का संवैधानिक परिषद वर्ष 2015 के संविधान के तहत गठित एक शीर्ष संस्था है, जो मुख्य न्यायाधीश, संवैधानिक निकायों के प्रमुखों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति की सिफारिश करती है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में यह 6 सदस्यीय परिषद नियुक्तियों में अहम भूमिका निभाती है। पांच मई 2026 को जारी अध्यादेश के बाद यह अब उपस्थित सदस्यों के बहुमत से निर्णय ले सकती है। नए नियमों के मुताबिक अब परिषद की बैठक के लिए कम से कम 4 सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है और निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से लिए जा सकते हैं, न कि सर्वसम्मति से। सरकार का मानना है कि इस बदलाव से खाली पदों को शीघ्र भरा जा सकेगा।
