काठमांडू, 08 मई । नेपाल के विपक्षी दलों ने उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के पद पर डॉ. मनोज शर्मा के नाम की सिफारिश का विरोध करते हुए आपत्ति जताई है। डॉ. शर्मा के नाम की सिफारिश गुरुवार को सिंह दरबार में हुई संवैधानिक परिषद की बैठक में की गई। वरीयता क्रम के डॉ. मनोज शर्मा चौथे स्थान पर हैं।
बैठक में ही राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष नारायण प्रसाद दाहाल और प्रमुख प्रतिपक्षी दल के नेता भीष्म राज अंगदेम्बे ने अपनी असहमति दर्ज कराई थी। अंगदेम्बे ने आज पत्रकार सम्मेलन में कहा, “ न्यायपालिका में परंपरा, मूल्यों और मान्यताओं को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने शर्मा के नाम का प्रस्ताव किया। इस पर सहमत नहीं हुआ जा सकता। मैंने निर्णय में अपना असहमति मत दर्ज कराया है।”
नेपाली कांग्रेस के महामंत्री प्रदीप पौडेल ने सरकार पर शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को तोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “संवैधानिक परिषद संबंधी अध्यादेश पर पहले से ही हमारी असहमति थी। अब स्पष्ट हो गया है कि ऐसा करने के लिए ही अध्यादेश लाया गया था। शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को तोड़ा गया है। बहुमत से निर्णय लेने के सर्वमान्य सिद्धांत को भी तोड़ा गया है।”
यूएमएल के उपाध्यक्ष रघुजी पंत ने कहा कि सिफारिश में वरिष्ठता क्रम को नजरअंदाज कर न्यायपालिका पर कार्यपालिका ने हस्तक्षेप किया है। उन्होंने कहा कि देश एक सक्षम महिला प्रधान न्यायाधीश पाने से वंचित रह गया। उन्होंने कहा, “इस तरह कार्यपालिका का न्यायपालिका में रुचि दिखाना शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत है। स्वतंत्र न्यायपालिका की मान्यता पर हस्तक्षेप हुआ है। इससे देश की न्याय प्रणाली में बड़ा अव्यवस्था पैदा हो सकती है। जो लोग कल सत्ता में बैठे लोगों की गलतियों पर सवाल उठाते थे, आज वे उससे भी बड़ी गलती कर रहे हैं।” पंत ने कहा किमिनबहादुर रायमाझी, हरिकृष्ण थापा और अनुपराज शर्मा जैसे लोगों ने प्रधान न्यायाधीश बनकर उत्कृष्ट काम किया है।
नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश ज्वाला ने कहा कि सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों को तोड़ रही है। उन्होंने कहा, “सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों, मान्यता और परंपराओं को तोड़ते हुए सर्वसत्तावादी तरीके से चलती दिखाई दे रही है। यह लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। लोकतांत्रिक आवरण में आए प्रधानमंत्री का अलोकतांत्रिक तरीके से चलने की प्रवृत्ति दिखना चिंता का विषय है।”
