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डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान वार्ता में प्रगति के चलते ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ अस्थायी रूप से रोका

Date : 06-May-2026

 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रही बातचीत में सकारात्मक प्रगति का हवाला देते हुए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को कुछ समय के लिए रोकने का ऐलान किया है। यह अमेरिका के नेतृत्व वाला अभियान होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया गया था।

ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि ईरान के साथ समझौते की दिशा में अच्छी तरक्की हो रही है और कई देशों के अनुरोध पर यह फैसला लिया गया है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री नाकेबंदी पहले की तरह जारी रहेगी।

सैन्य अभियान में बड़ी सफलता

ट्रंप ने दावा किया कि हाल के अमेरिकी सैन्य अभियानों में ईरान की नौसेना लगभग पूरी तरह तबाह हो चुकी है और उसकी वायुसेना का भी यही हाल है। ट्रंप ने कहा, “उनके पास अब कोई नौसेना नहीं बची है।”

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी कहा कि इस अभियान ने उस रणनीतिक जलमार्ग पर अमेरिका का नियंत्रण सुनिश्चित कर दिया है। ट्रंप ने कार्यक्रम के दौरान एशियाई देशों की निर्भरता का जिक्र करते हुए कहा कि जापान अपनी 90 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया लगभग 43 प्रतिशत तेल की जरूरत होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते पूरी करता है। उन्होंने कहा कि लगातार सैन्य और आर्थिक दबाव के कारण ईरान अब समझौते के लिए तैयार दिख रहा है।

नाकेबंदी जारी, अभियान रोका

राष्ट्रपति ट्रंप ने यह घोषणा व्हाइट हाउस में युवाओं की फिटनेस और ‘प्रेसिडेंशियल फिटनेस टेस्ट’ से संबंधित कार्यक्रम के कुछ घंटों बाद की। कार्यक्रम में उन्होंने ईरान पर सैन्य दबाव और होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति का बार-बार जिक्र किया। ट्रंप ने साफ किया कि जहाजों की आवाजाही से जुड़ी कार्रवाई भले ही अस्थायी रूप से रोक दी गई हो, लेकिन पूरा क्षेत्र अभी भी अमेरिकी नाकेबंदी के दायरे में है।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब पिछले कई हफ्तों से खाड़ी क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले किए हैं और वॉशिंगटन ने कई बार चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही बाधित नहीं होनी चाहिए। दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल पेट्रोलियम का लगभग पांचवां हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है, जिसकी वजह से भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े तेल आयातक देश इस पर नजर रखे हुए हैं।


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