बेंगलुरु, 03 जनवरी (हि.स.)। कर्नाटक के विजयपुर जिले में स्थित ज्ञानयोग आश्रम के प्रसिद्ध संत सिद्धेश्वर स्वामी का मंगलवार रात करीब नौ बजे पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। उन्होंने सोमवार को अंतिम सांस ली। 81 वर्षीय स्वामीजी पिछले कुछ समय से उम्रजनित बीमारियों से जूझ रहे थे।
सिद्धेश्वर स्वामी के भक्त और अनुयायी कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं अन्य राज्यों में भी फैले हुए हैं। विजयपुर जिला प्रशासन ने उनके सम्मान में मंगलवार को स्कूलों-कॉलेजों और सरकारी कार्यालयों में अवकाश घोषित किया था।
सिद्धेश्वर स्वामी का पार्थिव देह मंगलवार तड़के 4.30 बजे तक आम लोगों के अंतिम दर्शन के लिए आश्रम में रखा गया। उसके बाद पार्थिव देह को सैनिक स्कूल परिसर में रखा गया, जहां से पार्थिव देह एक बार फिर आश्रम लाया गया। आश्रम परिसर में ही रात करीब नौ बजे उनका अंतिम संस्कार किया गया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य नेताओं ने स्वामीजी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, परमपूज्य श्री सिद्धेश्वर स्वामी को समाज की उत्कृष्ट सेवा के लिए याद किया जाएगा। उन्होंने दूसरों की भलाई के लिए अथक परिश्रम किए। दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके असंख्य भक्तों के साथ है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने सिद्धेश्वर स्वामीजी के निधन को राज्य के लिए अपूरणीय क्षति बताया है। उन्होंने कहा कि विजयपुर के ज्ञानयोगश्रम के सिद्धेश्वर स्वामी के निधन की खबर सुनकर गहरा दुख हुआ। उन्होंने अपने प्रवचनों के जरिए मानव जाति के उद्धार के लिए उत्कृष्ट एवं अद्वितीय सेवा की। भगवान उनके भक्तों को इस दुख को सहने की शक्ति दें।
धारवाड़ के कर्नाटक विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक करने के बाद कोल्हापुर में शिवाजी विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर किया।
सिद्धेश्वर स्वामी के एक भक्त मारुति मोरे ने उनको याद करते हुए कहा, हमारे पैतृक गांव कटराल में कुछ लोग शराब के आदी हो गए थे। हर रोज शाम को हंगामा करते थे जबकि स्थानीय लोग इन शरारती तत्वों से डरते थे। यह बात स्वामीजी के कानों तक पहुंची। उन्होंने शराब पीने वालों को बुलाया और उन्हें शराब छोड़ने की सलाह दी।
मारुति मोरे याद करते हैं- एक बार सिद्धेश्वर स्वामी श्री सुत्तूर देशिकेंद्र स्वामीजी के साथ आध्यात्मिक व्याख्यान के लिए विदेश दौरे पर थे। उनके व्याख्यान से प्रभावित होकर लोग दान की होड़ में लग गए। इस तरह से दान की कुल राशि 102 करोड़ रुपये हो गई। फिर भी उन्होंने इस धनराशि को स्पर्श करने से भी मना कर दिया। मठ के प्रबंधन में लगे लोग उनके इस रुख से परेशान थे।
