नया आईफोन खरीदने के बाद हर कोई उसे तुरंत देखने के लिए उत्साहित रहता है, लेकिन उसकी पैकेजिंग ऐसा होने नहीं देती। जिन लोगों ने नया आईफोन खरीदा है, उनका अनुभव लगभग एक जैसा रहा है—बॉक्स खोलना थोड़ा मुश्किल होता है। यह अचानक या आसानी से नहीं खुलता, बल्कि इसमें कुछ समय लगता है, और यही ऐप्पल की खास रणनीति का हिस्सा है। स्टीव जॉब्स समेत कंपनी के कई बड़े अधिकारियों ने भी इस बारे में खुलकर बात की है।
दरअसल, आईफोन का बॉक्स इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसे खोलते समय यूजर के भीतर उत्सुकता बनी रहे। सील हटाने के बाद भी बॉक्स की लिड इतनी परफेक्ट तरीके से फिट होती है कि उसे धीरे-धीरे ही खोला जा सकता है। सवाल यह उठता है कि इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी वाली कंपनी अनबॉक्सिंग को आसान क्यों नहीं बनाती? इसका जवाब ऐप्पल की मार्केटिंग और डिजाइन फिलॉसफी में छिपा है।
ऐप्पल ने जानबूझकर इस तरह की पैकेजिंग तैयार की है और इसके लिए कंपनी के पास पेटेंट भी मौजूद है। स्टीव जॉब्स का मानना था कि जब कोई व्यक्ति आईफोन या आईपैड का बॉक्स खोले, तो उसे शुरुआत से ही एक प्रीमियम और खास अनुभव महसूस होना चाहिए। उन्होंने एक बार कहा था कि बॉक्स खोलने का टेक्टाइल एक्सपीरियंस ही यह संकेत देता है कि अंदर मौजूद प्रोडक्ट कितना खास है। जॉब्स ने यह सोच ऐप्पल के शुरुआती निवेशक और चेयरमैन Mike Markkula से सीखी थी।
ऐप्पल के पूर्व डिजाइनर Jony Ive, जिन्होंने वर्षों तक स्टीव जॉब्स के साथ पैकेजिंग डिजाइन पर काम किया, उनका भी मानना था कि पैकेजिंग सिर्फ एक बॉक्स नहीं बल्कि पूरा अनुभव है। उनके मुताबिक, अनबॉक्सिंग एक तरह का “थिएटर” है, जो प्रोडक्ट के प्रति भावनात्मक जुड़ाव और एक्साइटमेंट पैदा करता है।
डिजाइन एक्सपर्ट्स का कहना है कि आईफोन को धीरे-धीरे अनबॉक्स करने की प्रक्रिया यूजर में सस्पेंस और उत्साह बढ़ाती है। यह अनुभव लोगों को कुछ पल रुककर उस प्रीमियम प्रोडक्ट को महसूस करने का मौका देता है, जिसे उन्होंने खरीदा है।