जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द के अबुल फजल एनक्लेव स्थित मुख्यालय में आयोजित मासिक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए जमाअत नेताओं ने मणिपुर में महीनों से जारी जातीय हिंसा और हरियाणा के नूंह में होने वाले सांप्रदायिक दंगे के लिए राज्य सरकारों की विफलता को जिम्मेदार ठहराते हुए चिंता व्यक्त की गई।
जमाअत इस्लामी हिन्द के उपाध्यक्ष प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि मणिपुर में विभिन्न जातीय समूहों के बीच अनसुलझे ऐतिहासिक तनाव के परिणामस्वरूप लगभग तीन महीने से चल रही लंबी हिंसा मानवता की नई गिरावट का संकेत देती है और राज्य एवं केंद्र दोनों स्तरों पर शासन की घोर विफलता को उजागर करती है। सरकार की ओर से उचित समय पर और सक्रिय कार्रवाई से हिंसा को बढ़ने से रोका जा सकता था और कई कीमती जानें बचाई जा सकती थीं। मणिपुर में हिंसा कई मुद्दों को उजागर करती है जिनका इस देश के अल्पसंख्यक सामना कर रहे हैं। निरंतर अल्पसंख्यक विरोधी घृणा अभियान के कारण जातीय संहार के प्रयास हुए और हजारों नागरिकों को अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया। हम मणिपुर में हिंसा के संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की सराहना करते है और मांग करते है कि केंद्र सरकार मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए तुरंत पर्याप्त कदम उठाए।
संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए जमाअत के उपाध्यक्ष मलिक मोहतसिम खान ने कहा कि भारतीय रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) कांस्टेबल के जरिए चलती ट्रेन में मुस्लिम समुदाय के तीन नागरिकों और आरपीएफ के एक अधिकारी की निर्मम और लक्षित हत्या एक घृणात्मक अपराध था जिसमें आरोपी ने मुस्लिम जैसे दिखने वाले यात्रियों की तलाश की और उन्हें बेरहमी से गोली मार दी। किसी विशेष समुदाय के खिलाफ कट्टरपंथ के किसी भी आरोप को दूर करने के लिए अपराधियों को मानसिक रोगी क़रार देना मानक संचालन प्रक्रिया बन गई है। हत्या के बाद आरोपी के जरिए प्रधानमंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री की तारीफ करने की खबरें बेहद परेशान करने वाली और नुकसानदेह हैं। जमाअत पीड़ितों के परिवारों के लिए मुआवजे, परिजनों के लिए उपयुक्त रोजगार, घटना की स्वतंत्र उच्च स्तरीय न्यायिक जांच और दोषी को सजा देने की मांग करती है।
कांफ्रेंस को सम्बोधित करते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय सचिव मौलाना शफी मदनी ने कहा कि हरियाणा में भड़की सांप्रदायिक हिंसा की जमाअत तत्काल उच्च स्तरीय जांच की मांग करती है। साथ ही पूर्व खुफिया जानकारी के बावजूद नागरिकों की सुरक्षा करने में विफल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करती है। जमाअत हिंसा के लिए जिम्मेदार वास्तविक दोषियों को पकड़ने के बजाय मुस्लिम युवाओं की पक्षपातपूर्ण गिरफ्तारियों पर भी चिंता व्यक्त करती है।
इस अवसर पर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की महिला विंग की राष्ट्रीय सचिव रहमतुन्निसा ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा संकलित रिपोर्ट पर गंभीर चिंता व्यक्त की और कांफ्रेंस को बताया कि 2019 से 2021 तक देश भर में 13.13 लाख से अधिक लड़कियां और महिलाएं आश्चर्यजनक रूप से लापता हो गईं। लापता महिलाओं की सबसे अधिक संख्या मध्य प्रदेश में है, लगभग दो लाख महिलाओं के लापता होने की सूचना है, इसके बाद पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर का स्थान है। ऐसा प्रतीत होता है कि “बेटी बचाओ“ का आह्वान चुनावी नारा बन कर रह गया है। सरकार द्वारा आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 जैसी विभिन्न पहल जो 12 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के बलात्कार के लिए मृत्युदंड सहित अधिक कठोर दंड लगाता है, वांछित प्रभाव नहीं पड़ रहा है। जमाअत-ए-इस्लामी हिंद का मानना है कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों को रोकने का सबसे अच्छा तरीका नैतिकता और नैतिकता पर आधारित समाज का विकास करना है।
