हरिद्वार से लेकर उच्च हिमालय तक आस्था पथ गुलजार
देश-दुनिया को लुभा रही देवभूमि की प्राकृतिक सौंदर्य
चारधाम यात्रा से जुड़ी है उत्तराखंड की आर्थिकी
देहरादून, 15 अक्टूबर | हरी-भरी वादियां, ऊंचे-ऊंचे पहाड़, सीढ़ीनुमा-घुमावदार सड़कें, हिमालय व हिल स्टेशन समेत देवभूमि का प्राकृतिक सौंदर्य इन दिनों पर्यटकों को खूब लुभा रहा है। मई से शुरू हुई राज्य की चारधाम यात्रा इस वर्ष अब तक तीर्थयात्रियों का आंकड़ा 40 लाख पार कर चुका है। राज्य में अब तक चार लाख 80 हजार 788 वाहन भी चारधाम पहुंच चुके हैं। अभी भी बड़ी संख्या में तीर्थयात्री चारधाम यात्रा पर देवभूमि पहुंच रहे हैं।
दरअसल, इस वर्ष की चारधाम यात्रा अब अंतिम चरण में है। आने वाले दिनों में सभी धाम छह माह के लिए बंद हो जाएंगे। ऐसे में हरिद्वार से लेकर उच्च हिमालय तक आस्था पथ गुलजार है। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की आर्थिकी की लाइफलाइन है। चारधाम यात्रा से हजारों परिवारों को काफी आस होती है। उत्तराखंड समेत आसपास के राज्यों के अलावा नेपाल के नागरिक भी चारधाम यात्रा के सहारे गुजर-बसर करने देवभूमि आते हैं।
इस वर्ष 31 जुलाई की आपदा भी आस्था की डगर पर श्रद्धालुओं के पांव रोक नहीं पाई। इस वर्ष अब तक 40 लाख 92 हजार 360 तीर्थयात्री सुरक्षित धार्मिक यात्रा कर चारों धामों में शीश नवा चुके हैं। इस दौरान सबसे अधिक यात्री केदारनाथधाम में मंगलवार तक 13 लाख 67 हजार 567 श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। बद्रीनाथ धाम में 11 लाख 18 हजार 348 व गंगोत्री धाम में सात लाख 53 हजार 397 तो यमुनोत्री धाम में अब तक छह लाख 60 हजार 333 तीर्थयात्रियों ने हाजिरी लगा चुके हैं। साथ ही हेमकुंड साहिब दरबार में एक लाख 83 हजार 722 व गौमुख में अब तक 8993 भक्त मत्था टेक चुके हैं। वहीं, अभी भी तीर्थयात्रियों का केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम पहुंचने का सिलसिला जारी है। अकेले केदारनाथ धाम में प्रतिदिन 10 हजार के पार तीर्थयात्री पहुंच रहे हैं।
विश्व फलक पर अतिथि देवो भव: का संदेश देती चारधाम यात्रा
शक्ति-भक्ति से लबरेज पुष्कर सिंह धामी की सरकार सुरक्षित धार्मिक यात्रा को लेकर प्रतिबद्ध है। ऐसे में चारधाम यात्रा विश्व फलक पर अतिथि देवो भव: का संदेश दे रही है। यह संभव हो पाया है सरकार और प्रशासन के समन्वय से। मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को सुरक्षित यात्रा कराना राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता है। चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित और मजबूत करने लिए यात्रा प्राधिकरण बनाया जा रहा है। इसके लिए चारधाम यात्रा एवं इससे जुड़े लोगों और स्टेक होल्डर्स के सुझाव लिए जा रहे हैं।
पिछले कई वर्षाें में गुजरात पर्यटन तथा यात्राधामों के लिए किए गए विकास कार्याें की बदाैलत आज वर्ल्ड टूरिज्म मैप पर चमक रहा है। राज्य में दो दशकों में पर्यटकों की संख्या में 22 गुना वृद्धि हुई है। इसके साथ ही राज्य के पर्यटन विभाग का
बजट वर्ष 2001-02 में पर्यटन विभाग का बजट 12 करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 1620.06 करोड़ रुपये हो गया है।
नरेन्द्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री के रूप में 23 वर्ष पूर्ण होने पर गुजरात सरकार 7 से 15 अक्टूबर के दौरान विकास सप्ताह मना रही है। आज विश्वभर के पर्यटकों के लिए गुजरात पसंदीदा राज्य बन गया है। वर्ष 2003-04 में राज्य में केवल 61.5 लाख पर्यटक आते थे, जिनकी संख्या वर्ष 2022-23 में 14 करोड़ के पार हो गई। इनमें 22 लाख से अधिक विदेशी पर्यटक शामिल हैं।
रणोत्सव, पतंगोत्सव आदि उत्सवों को मिली विश्वस्तरीय लोकप्रियता
नरेन्द्र मोदी ने कच्छ में सफेद रण (रेगिस्तान) का पर्यटन की दृष्टि से महत्व समझा और वर्ष 2005 में ‘रणोत्सव’ की शुरुआत कराई। केवल तीन दिवसीय उत्सव के रूप में शुरू हुआ रणोत्सव आज चार महीने के लंबे कार्यक्रम में परिवर्तित हो गया है। गुजरात के उत्तरायण के त्योहार के प्रति देश-विदेश के लोगों को आकर्षित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव की शुरुआत की गई थी। अहमदाबाद स्थित कांकरिया तालाब परिसर में वर्ष 2009 से कांकरिया कार्निवल हर वर्ष मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त वडनगर की बहनों की स्मृति में ताना-रीरी महोत्सव, मोढेरा स्थित सूर्य मंदिर परिसर में भारतीय नृत्य संस्कृति को बढ़ाने के लिए उत्तरार्ध महोत्सव के कारण भी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई है, तो वाइब्रेंट गुजरात नवरात्र महोत्सव के आयोजन से गुजरात का नवरात्रि उत्सव तथा गरबा विश्व स्तर पर विख्यात हुए हैं।
‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ आकर्षण का केन्द्र
अखंड भारत के निर्माता लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन से गुजरात में नर्मदा जिले के केवडिया में 182 मीटर यानी विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ (एसओयू) का निर्माण किया गया है। एसओयू के आसपास के क्षेत्र में जंगल सफारी पार्क, चिल्ड्रन न्यूट्रिशन पार्क, आरोग्य वन, वैली ऑफ फ्लॉवर्स, एकता मॉल, एकता नर्सरी, मियावाकी वन तथा मेज गार्डन सहित विभिन्न पर्यटन आकर्षणों का विकास किया गया है। केवडिया में रेलवे स्टेशन का निर्माण कर पर्यटकों को परिवहन के लिए सरल कनेक्टिविटी दी गई है। राज्य सरकार द्वारा केवडिया का टोटल टूरिज्म डेवलपमेंट के रूप में विकास किया जा रहा है।
स्मृति वन तथा वीर बाल स्मारक
26 जनवरी, 2001 के विनाशकारी भूकंप के शिकार नागरिकों की स्मृति में कच्छ में स्मृति वन का निर्माण किया गया। इसके अलावा कच्छ के भूकंप में अंजार शहर में मलबे में दफन हो गए बच्चों तथा शिक्षकों की स्मृति में अंजार शहर के बाहर वीर बाल स्मारक तैयार किया गया है।इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2022 में किया गया था।
टूरिज्म फ्रेंड्ली पॉलिसियाँ लागू हुईं
गुजरात में पर्यटन क्षेत्र को गति देने के उद्देश्य से ‘गुजरात टूरिज्म पॉलिसी’ तथा राज्य की ऐतिहासिक विरासतों-इमारतों तथा स्थलों को हेरिटेज टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ‘हेरिटेज टूरिज्म पॉलिसी’ लागू की गईं। देश-विदेश के पर्यटक गुजरात की संस्कृति तथा परंपरा से अवगत कराने और गुजराती व्यंजनों का स्वाद का आनंद उठाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने ‘गुजरात होम स्टे पॉलिसी’ भी लागू की है। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। गुजरात की हस्तकला की समृद्ध परंपरा को प्रमोट करने के लिए पर्यटन विभाग के विभिन्न कार्यक्रमों में हस्तकला उत्पादों के स्टॉल्स लगाने के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया।
पर्यटन स्थलों को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान
पिछले 23 वर्षों में पाटण स्थित राणकी वावा (रानी की बावड़ी), धोळावीरा, अहमदाबाद शहर तथा चाॅपानेर का यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की सूची में समावेश हुआ है। यूनाइटेड नेशन्स एजेंसी वर्ल्ड टूरिज्म ऑर्गेनाइजेशन ने कच्छ के धोरडो गांव को ‘बेस्ट टूरिज्म विलेज’ घोषित किया है। यूनेस्को ने गुजरात के गरबा को ‘अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ की सूची में स्थान दिया है। द्वारका में स्थित शिवराजपुर बीच को ‘ब्ल्यू फ्लैग बीच’ में स्थान प्राप्त हुआ है। यूनेस्को के प्रिक्स वर्सेल्स अवॉर्ड अंतर्गत भुज का स्मृति वन भूकंप मेमोरियल तथा म्यूजियम विश्व के 7 सर्वाधिक सुंदर म्यूजियम्स की सूची में शामिल हुआ है।
तीर्थस्थलों का विकास
जूनागढ़ में गिरनार स्थित एशिया के सबसे बड़े गिरनार रोप-वे का निर्माण किया गया, जिससे श्रद्धालुओं, विशेषकर वरिष्ठ-बुजुर्गों के लिए माताजी के दर्शन सुलभ हुए हैं। गुजरात के विश्व प्रसिद्ध यात्राधाम अंबाजी में 51 शक्तिपीठ का निर्माण किया गया है। आद्यशक्ति धाम के दर्शन को आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को अब एक ही स्थान पर एक साथ सभी 51 शक्तिपीठों के दर्शन का लाभ प्राप्त हो रहा है। पावागढ़ में माँ कालिका के नवनिर्मित मंदिर पर 500 वर्ष बाद स्वर्ण शिखर पर ध्वजारोहण किया गया है। सौराष्ट्र के समुद्री तट पर स्थित प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ महादेव मंदिर में पर्यटकों के लिए सुविधायुक्त सर्किट हाउस का निर्माण किया गया है। प्रसाद योजना अंतर्गत सोमनाथ धाम में यात्रियों की सुविधाओं के लिए अनेक विकास कार्य हो रहे हैं। जीएसआरटीसी ने स्लीपर कोच, एसी कोच तथा लंबी दूरी की यात्रा के लिए उच्चतम् स्तरीय लग्जरी कोच सहित नए प्रकार की सेवाएँ शुरू कर विभिन्न यात्राधामों को जोड़ा है। राज्य के विभिन्न यात्राधामों में सोलर रूफटॉप लगाने का कार्य किया जा रहा है।
सिंधु दर्शन यात्रा यात्रियों को 15 हजार रुपये की सहायता
भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति की एकता का दर्शन कराने वाली ‘सिंधु दर्शन यात्रा’ को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य सरकार सिंधु दर्शन यात्रा पर जाने वाले गुजरात के यात्रियों को 15 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दे रही है। गुजरात के वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थधामों के दर्शन कराने के लिए राज्य सरकार ने श्रवण तीर्थ दर्शन योजना चलाई है।
झांसी, 14 अक्टूबर । प्रयागराज महाकुंभ-2025 से पूर्व प्री कुंभ के अवसर पर जनपद झांसी में 15 दिवसीय कार्यशाला की शुरुआत आज होगी। योगी सरकार प्री कुम्भ के आयोजन के माध्यम से बुन्देखण्ड की लोकसंस्कृति के प्रति जागरुकता का प्रसार करने के मकसद से कई तरह के आयोजन कर रही है। इसी कड़ी में झांसी में यह खास आयोजन किया जाना है।
14 से 28 अक्टूबर 2024 की अवधि में महाकुंभ प्रयागराज-2025 के अंतर्गत जनपद झांसी में राई लोकनृत्य कार्यशाला का आयोजन आर्य कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में किया जाएगा। कार्यशाला में वंदना कुशवाहा और उनकी टीम छात्राओं को प्रशिक्षण देगी। कॉलेजों की इच्छुक छात्राएं 14 और 15 अक्टूबर को आर्य कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय परिसर में पहुंचकर स्क्रीनिंग में हिस्सा ले सकती हैं। कार्यशाला के लिए 50 छात्राओं का चयन किया जाएगा।
कार्यक्रम संयोजक प्रोफेसर अलका नायक और कार्यशाला समन्वयक देवराज चतुर्वेदी ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सपना है कि भारत की संस्कृति को पूरे विश्व में प्रसारित किया जाए। यह विशेष कार्यशाला बुन्देली संस्कृति को पूरे विश्व में सबके सामने ले जाने में सहायक सिद्ध होगी।
प्रतिदिन होने वाली पांच में तीन आरती का समय भी बदलेगा
उज्जैन, 13 अक्टूबर। विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर के मंदिर में आगामी 18 अक्टूबर को कार्तिक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से भगवान महाकाल की दिनचर्या बदलेगी। सर्दी के मौसम में अवंतिकानाथ सुबह आधा घंटा देरी से भोजन करेंगे। भस्म आरती में भगवान को गर्म जल से स्नान कराया जाएगा। प्रतिदिन होने वाली पांच में तीन आरती का समय भी बदलेगा। दिनचर्या में बदलाव का यह क्रम फाल्गुन पूर्णिमा तक चलेगा।
पं. महेश पुजारी ने रविवार को बताया कि महाकाल मंदिर की पूजन परंपरा में गर्मी व सर्दी के क्रम में प्रत्येक छह माह में भगवान की दिनचर्या बदलती है। वर्तमान में भगवान की दिनचर्या गर्मी के मौसम अनुसार चल रही है। भगवान ठंडे जल से स्नान कर रहे हैं, लेकिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से मंदिर में सर्दी की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन से भगवान महाकाल ठंडे के बजाय गर्म जल से स्नान करना प्रारंभ करते हैं। साथ ही आरती का समय भी बदलता है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में प्रतिदिन सुबह सात बजे दद्योदक अर्थात बालभोग आरती हो रही है। इस आरती में भगवान को दही-चावल का भोग लगाया जाता है। आगामी 18 अक्टूबर से यह आरती सुबह 7.30 बजे से होगी। इसी प्रकार वर्तमान में सुबह 10 बजे भोग आरती हो रही है। इसमें भगवान को दाल, चावल, रोटी, सब्जी, मिष्ठान का नैवेद्य लगाया जाता है। यानी भगवान सुबह 10 बजे भोजन कर रहे हैं। वहीं, 18 अक्टूबर से भोग आरती सुबह 10.30 बजे होगी। इसका आशय यह है, सर्दी में भगवान आधा घंटा देरी से भोजन करेंगे। वर्तमान में संध्या आरती शाम सात बजे की जा रही है, लेकिन 18 अक्टूबर से संध्या आरती प्रतिदिन शाम 6.30 बजे से होगी, क्योंकि सर्दियों में सूर्यास्त जल्दी होने लगता है।
इसके अलावा, प्रतिदिन तड़के चार बजे होने वाली भस्म आरती तथा रात 10.30 बजे होने वाली शयन आरती अपने इसी निर्धारित समय पर होगी। शाम पांच बने होने वाली संध्या पूजन का समय भी वहीं रहेगा।
हमीरपुर। हमीरपुर जिले के मुस्करा थाना क्षेत्र के बिहुंनी कला गांव के लाेग विजयदशमी पर रावण की पूजा करते हैं। बड़ी आबादी वाले इस गांव में रावण की विशालकाय प्रतिमा भी स्थापित है। दशहरा पर्व को लेकर यहां रावण की प्रतिमा को रंग रोशन करने की तैयारी ग्रामीणों ने शुरू कर दी है।
बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले के मुस्करा थाना क्षेत्र के बिहुंनी कला गांव में विजयदशमी के पर्व पर ग्रामीण रावण की पूजा करते हैं। गांव के सरपंच प्रतिनिधि उपेन्द्र कुमार ने बताया कि गांव में विजयदशमी पर्व पर यहां रावण की पूजा होती है। गांव के लोग बड़े ही श्रद्धाभाव से रावण की पूजा-अर्चना करते हैं। ग्राम प्रधान संगठन के प्रमुख नेता हर स्वरूप व्यास ने बताया कि हमीरपुर जिले का बिहुंनीकला इकलौता ऐसा गांव है जहां पूरा गांव एकजुट होकर रावण की प्रतिमा के सामने माथा टेकता है। विजयदशमी के दिन रावण की प्रतिमा का भव्य श्रंृगार भी लोग करते हैं।
दस फीट ऊंची स्थापित है रावण की प्रतिमा, 20 हाथ भी है प्रतिमा में
ग्रामीणों ने बताया कि बिहुंनीकला गांव में दस फीट ऊंची और बीस हाथ वाली रावण की प्रतिमा स्थापित है। रावण की प्रतिमा के मुकुट में घोड़े जैसी आकृति भी बनी हुई है। इसके बीस हाथ हैं। रावण के मुख्य सिर के अलावा नौ सिर भी प्रतिमा में लगे हैं। प्रतिमा भी बैठने की मुद्रा में है। पंडित दिनेश दुबे ने बताया कि रावण बड़ा ही धर्मशास्त्री था जिसका अपमान नहीं होना चाहिए। इसीलिए इस गांव में रावण का पुतला दहन नहीं किये जाने की परम्परा कायम है। गांव का एक मुहाल रावण पट्टी के नाम से आज भी बसा है।
रावण की प्रतिमा को दशहरे के दिन सजाने की कायम है परम्परा
ग्राम प्रधान संगठन के प्रमुख नेता हर स्वरूप व्यास ने बताया कि पूरे देश में विजयदशमी पर्व के दिन रावण के पुतले फूंकने की परम्परा कायम है। शहर से लेकर कस्बे और ग्रामीण इलाकों में विजयदशमी की धूम मचती है। रामलीला में श्रीराम-रावण के बीच युद्ध होता है। रावण वध के बाद हर जगह दशहरे की रौनक बढ़ जाती है लेकिन हमीरपुर जिले में बिहुंनीकला गांव में इस त्योहार की कोई रंगत नहीं रहती है। यहां रावण का पुतला नहीं फूंका जाता है। रावण की बड़ी प्रतिमा को रंग रोशन कर लोग सजाते हैं।
रावण की विशालकाय प्रतिमा पर श्रद्धा से चढ़ाते है नारियल
विजयदशमी पर असत्य के प्रतीक रावण के पुतले का दहन कर लोग इस पर्व को बड़े ही खुशी के माहौैल में मनाए जाने की परम्परा बुन्देलखंड में आज भी कायम है लेकिन हमीरपुर के बिहुंनीकला गांव में इसके विपरीत ही परम्परा कायम है। राम का अभिनय करने वाले राजेश का कहना है कि इस गांव में जनवरी माह में रामलीला तो होती है लेकिन रावण का पुतला नहीं फूंका जाता है। यह परम्परा बहुत ही पुरानी है जिसका आज भी निर्वहन इस गांव में होता है। पूरे गांव के लोग रावण की प्रतिमा पर नारियल चढ़ाते हैं।
जालौन। यूं तो नवरात्र में मां के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। लेकिन, देश के कई हिस्सों में देवी मां के चमत्कार से जुड़े हुए तमाम किस्से और कहानियां मौजूद हैं। ऐसा ही एक किस्सा बुंदेलखंड के जालौन से जुड़ा हुआ है। यहां पर मौजूद शारदा माता का मंदिर जो आज भी पृथ्वीराज चौहान और आल्हा ऊदल के साथ भी युद्ध का साक्षी बना हुआ है। यह मंदिर जालौन जिले के बैरागढ़ गांव में स्थित है। जो शक्ति पीठ शारदा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहां जालौन से ही नहीं बल्कि दूर-दराज इलाकों से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। नवरात्र पर यहां पर भव्य आयोजन किए जाते हैं।
दरअसल, शारदा देवी का यह मंदिर जालौन जिले के मुख्यालय उरई से लगभग 30 किलो मीटर दूरी पर ग्राम बैरागढ़ में बना हुआ है। यहां पर ज्ञान की देवी सरस्वती मां शारदा के रूप में विराजमान हैं। मां शारदा देवी की अष्टभुजी मूर्ति लाल पत्थर से निर्मित है। मां शारदा का शक्ति पीठ बैरागढ़ मन्दिर की स्थापना चन्देलकालीन राजा टोडलमल द्वारा ग्यारहवी सदी में कराई गई थी। जबकि किवदंतियों के अनुसार यह मन्दिर आदिकाल में निर्मित कराया गया था और मां शारदा की मूर्ति मन्दिर के पीछे बने एक कुंड से निकली थी। किवदंतियों की मानें तो कुंड से मां शारदा प्रकट हुई थी। इसीलिए इस स्थान को शारदा देवी सिद्ध पीठ कहा जाता है।
हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान और आल्हा-ऊदल के युद्ध की साक्षी है यह भूमि
मां शारदा शक्ति पीठ पृथ्वीराज और आल्हा के युद्ध की साक्षी है। पृथ्वीराज ने बुन्देलखंड को जीतने के उद्देश्य से 11 सदी के बुन्देलखंड के तत्कालीन चन्देल राजा परमर्दिदेव (राजा परमाल) पर चढ़ाई की थी। उस समय चन्देलों की राजधानी महोबा थी। आल्हा- ऊदल राजा परमाल के मंत्री के साथ वीर योद्धा भी थे। बैरागढ़ के युद्ध मे आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में बुरी तरह परास्त कर दिया था। बताया गया कि आल्हा और ऊदल मां शारदा के उपासक थे। जिसमें आल्हा को मां शारदा का वरदान था कि उन्हें युद्ध में कोई नहीं हरा पायेगा। ऊदल की मौत के बाद आल्हा ने प्रतिशोध लेते हुये अकेले पृथ्वीराज चौहान से युद्ध किया और विजय प्राप्त की थी। उसके बाद आल्हा ने विजय स्वरूप मां शारदा के चरणों के बगल में सांग गाढ़ दी। पृथ्वीराज चौहान सांग को न ही उखाड़ सके और न ही सांग की नोक को सीधा कर पाए।
30 फीट ऊंची गढ़ी सांग की लंबाई न नाप सका कोई
आलम है युद्ध में विजय हासिल करने के बाद मंदिर के ठीक बगल में एक लोहे की सांग को गाढ़ दिया जो कि ऊपर से 30 फीट ऊंचाई की दिखाई देती है। लेकिन जैसा जमीन में कितनी गहराई तक है। इस बात का अंदाजा आज तक किसी को नहीं हुआ। मंदिर में आल्हा द्वारा गाड़ी गई सांग इसकी प्राचीनता दर्शाता है। जब आल्हा ने युद्ध से बैराग लिया तभी से यहां का नाम बैरागढ़ पड़ गया। वहीं, मंदिर के पुजारी श्याम ने बताया कि श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओ के लिए चैत्र और शारदीय नवरात्रि नवरात्रि पर दर्शन करने आते है। यहां विशाल मेला लगता है जो पूरे एक माह चलता है। पुजारी के मुताबिक मंदिर के पीछे एक कुंड है। इस कुंड में नहाने से सभी प्रकार के चरम रोग ख़त्म हो जाते है।
दिन में तीन बार रंग बदलती है मंदिर की मूर्ति
मां शारदा शक्ति पीठ के बारे में दर्शन करने वाले लोगों के अनुसार मूर्ति तीन रूपों में दिखाई देती है। सुबह के समय मूर्ति कन्या के रूप में नजर आती है तो दोपहर के समय युवती के रूप में और शाम के समय मां के रूप में मूर्ति दिखाई देती है। जिनके दर्शनों के लिये पूरे भारत वर्ष से श्रद्धालू दर्शन करने आते है। महाराज का कहना है कि मां शारदा माता के दर्शन करने से श्रद्धालुओं की सारी मनोकामनाये पूर्ण होती है। वहीं पिछले 20 सालों से दर्शन के लिए पहुंच रहे श्रद्धालुओं ने बताया कि जब तक माता रानी बुलाती रहेगी वो यहाँ आते रहेंगे। यहां दर्शन करने से दुखों और कष्टों का नाश होता है।
जालाैन। उत्तर प्रदेश के जालौन में बेतवा नदी के किनारे अलग-अलग पहाड़ों पर बने ऐतिहासिक एवं प्राचीन शक्तिपीठ मंदिरों की अलग पहचान व मान्यताएं हैं। जिन की प्राचीनता का अनुमान लगाना बेहद ही मुश्किल है कहा जाता है कि चैत्र एवं शरदीय नवरात्रि के अलावा मकर संक्रांति पर भव्य मेले का आयोजन होता है। श्रद्धालुओं में दोनों शक्तिपीठों पर अटूट विश्वास बना हुआ है। वैसे तो बुंदेलखंड के कोने-कोने से श्रद्धालु आए दिन मंदिरों पर आकर रक्तदंतिका देवी एवं मां अक्षरा देवी पर मत्था टेकने के साथ मन्नते भी मांगते हैं और उनकी मनोकामना भी पूरी होती है।
जालौन के डकोर ब्लॉक की ग्राम पंचायत सैदनगर में रक्तदंतिका नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। जालौन के मुख्यालय उरई से इसकी दूरी 50 किलोमीटर दूर सैदनगर गांव से निकली बेतवा नदी किनारे एक ओर पहाड़ों पर बसी रक्तदंतिका शक्तिपीठ का वर्णन दुर्गा सप्तशती पाठ के दो श्लोकों में मिलता है। पहाड़ पर देवी रक्तदंतिका विराजमान हैं। यह मंदिर सदियों पुराना है। पहले यह शक्तिपीठ तंत्र साधना का केंद्र हुआ करता था। यहां पर बलि देने का प्रावधान था। कोई भी साधक रात में मंदिर परिसर में नहीं रुक सकता था। कई वर्षों पहले लंका वाले महाराज आकर रुक गए थे। उन्होंने यहां पर साधना शुरू की। वह किसी से बोलते-चालते नहीं थे। उनके समय से ही नवरात्र के दिनों में कुछ साधक देवी भक्त मंदिर में रुकने लगे थे पहाड़ में देवी के मंदिर के साथ ही दूसरी तरफ एक हनुमान जी का मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि देवी मंदिर में दो शिलाएं रखी हुई हैं। यह शिलाएं रक्तिम हैं। सती के दांत यहां पर गिरे थे। बताया जाता है कि अगर शिलाओं को पानी से धो दिया जाए तो कुछ ही देर में यह शिलाएं फिर से रक्तिम हो जाती हैं। अब इस मंदिर में एक देवी प्रतिमा की स्थापना कर दी गई है। वास्तिवक पूजा दंत शिलाओं की ही होती है। पहले बलि प्रथा भी प्रचलित थी, अब समय के साथ इस पर पाबंदी लगा दी गई है।यहां नवरात्रि के मौके पर दूर-दराज से भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर की सीढ़ियों पर अपना मत्था टेकने के लिए आते हैं।
तंत्र-मंत्र साधना का केंद्र रहा मंदिर
देवी रक्तदंतिका स्फटिक के पहाड़ पर विराजमान हैं और यह मंदिर सदियों पुराना बताया जाता है पहले यह शक्तिपीठ तंत्र साधना का केंद्र हुआ करता था। फिलहाल अब इस पर रोक लगा दी गई है और नवरात्रि में मैया के मंदिर में उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश राजस्थान दिल्ली सहित कई अन्य राज्यों से आने वाले भक्तों की भीड़ माता के दर्शनों के लिए उमड़ती है।
मंदिर के पुजारी कृष्ण चंद्र गौतम ने बताया कि गर्भ गृह में किसी को जाने की अनुमति नहीं है। यह मंदिर सृष्टि के निर्माण के समय का है दूर-दूर से श्रदालु यहाँ पहुंचते हैं और जो एक बार भी यहाँ आता है उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
सुल्तानपुर । ऐतिहासिक दुर्गापूजा महोत्सव देश में कलकत्ता शहर के बाद अयोध्या के निकट बसे कुशभवनपुर का है। यहाँ की दिव्यता, भव्य सजावट और नौ दिन नवरात्रि की आराधना के बाद दशहरा से पंडालों की सजावट शुरू होती हैं। अलग-अलग तरह से होने वाली भव्य सजावट और दुर्गा जागरण से शहर अलौकिक हो उठता है। यहाँ का विसर्जन सबसे आकर्षक होता है, जो परंपरा से हटकर पूर्णिमा को सामूहिक शोभायात्रा के रूप में शुरू होकर लगभग 36 घंटे में सम्पन्न होता है।
प्रभु श्रीरामचंद्र की अयोध्या से लगभग 65 किलोमीटर, प्रयागराज से 100 तथा बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी से 155 किलोमीटर की दूरी पर बसे कुश की नगरी कुशभवनपुर (सुल्तानपुर) स्थित है। गोमती नदी के तट पर स्थित प्राचीनकाल में इसे भगवान कुश ने बसाया था। जिसके कारण इसे कुशभवनपुर के नाम से भी जाना जाता है।
अपनी अनेकों पहचान वाला उत्तर प्रदेश के लव की नगरी लखनऊ एवं भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या के पास मौजूद है। जहां दशहरे के पर्व पर सांस्कृतिक व धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इन सभी जिलों के रंग यहाँ की दूर्गापूजा महोत्सव के आगे फीके पड़ जाते हैं। यही वजह है कि देश में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर (कुशभवनपुर) जिले का दुर्गापूजा महोत्सव कोलकाता से भी पहले स्थान रखता है। कोलकाता में संख्या बल या सज्जा में भले पहला स्थान रखता हो किंतु अन्य मायनों में यहाँ की दुर्गापूजा अपने आप में इकलौती है।
पहली बार वर्ष 1959 में शहर के ठठेरी बाज़ार में बड़ी दुर्गा के नाम से भिखारीलाल सोनी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर यहां दुर्गापूजा महोत्सव के उपलक्ष्य में पहली मूर्ति स्थापना की थी। इस मूर्ति को उनके द्वारा बिहार प्रान्त से विशेष रूप से बुलाये गए तेतर पंडित व जनक नामक मूर्तिकारों ने प्रतिमा को अपने हाथों से बनाया था। विसर्जन पर उस समय शोभा यात्रा डोली में निकली गयी थी। डोली इतनी बड़ी होती थी जिसमें आठ व्यक्ति लगते थे। पहली बार जब शोभा यात्रा सीताकुंड घाट के पास पहुंची थी तभी जिला प्रशासन ने विर्सजन पर रोक लगा दिया था। जो बाद में सामाजिक लोगों के हस्तक्षेप के बाद विसर्जित हो सकी थी। यह दौर दो सालों तक ऐसे ही चला। वर्ष 1961 में शहर के ही रुहट्टा गली में काली माता की मूर्ति की स्थापना बंगाली प्रसाद सोनी ने कराई और फिर 1970 में लखनऊ नाका पर कालीचरण उर्फ नेता ने संतोषी माता की मूर्ति को स्थापित कराया। वर्ष 1973 में अष्टभुजी माता, श्री अम्बे माता, श्री गायत्री माता, श्री अन्नापूर्णा माता की मूर्तियां स्थापित कराई गई। इसके बाद से तो मानों जनपद की दुर्गापूजा में चार चांद लग गया और शहर, तहसील, ब्लाक एवं गांवों में मूर्तियों का तांता सा लग गया।
पहली बार आठ कहार की डोली से निकली थी विसर्जन शोभायात्रा
सर्वप्रथम स्थापित की गई मूर्तियों को कंहार डोली पर उठाकर चलते थे, जिसमें एक मूर्ति को उठाये जाने के लिये आठ कहार लगते थे। जो कि अब ट्रैक्टरों पर बिजली की जगमगाहट के साथ क्रमबद्ध झांकी के रुप में निकलती हैं। जिले की पहचान और गौरव दुर्गापूजा महोत्सव के रुप में इसलिये और बढ़ गया कि दशमी के दिन देश व प्रदेश के अन्दर मूर्तियां विसर्जित कर दी जाती हैं, पर यहां कुछ अलग ही परम्परा का इतिहास है। दशमी के दिन रावण का पुतला फूंके जाने के पूर्व नौ दिनों तक शहर के रामलीला मैदान में सम्पूर्ण रामलीला की झांकी प्रस्तुत की जाती है और उसके बाद दशमी के दिन से सात दिनों दुर्गापूजा मेले का आयोजन होता है। जिसमें भरत-मिलाप से लेकर विविध कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इतना ही नहीं जनपद को देश के अन्दर पहला स्थान मिलने का एक मुख्य वजह यह है कि वर्ष 1983 के बाद से शहर के अन्दर जगह-जगह अनेक मंदिरों का दृश्य कारीगरों द्वारा पंडाल के रुप में देखने को मिलता रहा है। जिसमें करीब 10 लाख से अधिक का खर्च आता है, साथ ही आने वाले दूर दराज के लोगों के लिये विशाल भंडारे के आयोजन के साथ दवा से लेकर हर आवश्यक सुविधा स्थानीय स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा यहां मुहैया कराई जाती है।
सप्ताह भर चलने वाले इस कार्यक्रम का समापन विसर्जन के रुप में करीब 36 घंटों के बाद सीताकुंड घाट पर होता है। जिसे देखने के लिये आसपास जिलों के हजारों लोग जमा होते है। ऐसे में शहर के अंदर तिल रखने की भी जगह नहीं होती।
केन्द्रीय पूजा व्यवस्था समिति के पूजा प्रबंधक बाबा राधेश्याम सोनी की मानें तो आज भिखारीलाल सोनी इस दुनिया में नहीं है, पर उनके द्वारा रखी गई दुर्गापूजा महोत्सव की नींव मजबूत से मजबूत होती चली आ रही है। राधेश्याम की मानें तो उनका जनपद गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है। वह इस बुनियाद पर कि पूर्व में दुर्गापूजा महोत्सव के दौरान मुस्लिम समुदाय के मोहर्रम और बारह रबीउल अव्वल का पर्व एक साथ पड़ गया था फिर भी यहां बिना विवाद के सकुशल संपन्न हुआ। समितियों में मुस्लिम सदस्य भी है और तमाम मुस्लिम विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से दुर्गा भक्तों के सहयोग में लगे रहते हैं। आज दुर्गापूजा महोत्सव में मुस्लिम समुदाय के लोग कंधे से कंधा जोड़ सौहादर्य बनाये रखने के लिये जुटे रहते हैं।
शहर की कोई गली कोई कोना बाकी नहीं, जहां इस ऐतिहासिक उत्सव की धूम न हो। शहर एक पखवाड़े रात दिन जगता है। छह दशकों से चला आ रहा यह समारोह केवल हिन्दुओं का पर्व न होकर सुलतानपुर का महापर्व बन चुका है। प्रशासन भी यहां की गंगा जमुनी तहजीब को देखकर पूरी तरह आश्वस्त रहता है। यहां रहने वाले किसी भी मजहब के लोग जिस तरह इस महापर्व में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं और एक मिसाल कायम किये हुए हैं।
शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है ज्वाला देवी का पवित्र दरबार
हमीरपुर। हमीरपुर जिले के एक गांव में ज्वाला देवी मंदिर में नवरात्रि पर्व की धूम मची हुई है। इस मंदिर का इतिहास भी सदियों पुराना है जहां अनवरत ईंट से निकल रही ज्वाला को दर्शन कर लोग माथा टेकते हैं। यहां मां के दरबार में प्रसाद के रूप में गुड़ और चने की दाल से बनी रोट का भोग लगाने की परम्परा कायम है। इस मंदिर में आसपास के अलावा पड़ोसी एमपी राज्य से बड़ी संख्या में लोग पूजा और अनुष्ठान कराने आते हैं।
हमीरपुर जिले के सिसोलर थाना क्षेत्र का भंभई गांव एतिहासिक रूप से आज भी पूरे क्षेत्र में विख्यात हैं। ये गांव बांदा-मौदहा व सुमेरपुर-टिकरी मार्ग से चार किमी दूरी पर स्थित हैं। टैम्पो व निजी वाहनों से मौदहा अथवा सुमेरपुर से इस गांव तक जाने का मार्ग इन दिनों बारिश के कारण कठिन हो गया हैं। गांव तक पहुंचने के मार्ग जर्जर है इसके बाद भी देवी भक्त बड़े ही उत्साह के साथ पूजा अर्चना के लिये यहां मंदिर पहुंचते हैं। शादी विवाह और अन्य किसी मांगलिक कार्य सम्पन्न कराने को ज्यादातर लोग सुमेरपुर-टिकरी मार्ग से होते हुये भंभई गांव स्थित इस स्थान पर जाते हैं। गांव के बाहर मां ज्वाला देवी का पवित्र स्थान हैं जहां सिर्फ शक्तिपीठ की पूजा ही होती हैं। मंदिर में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं हैं। शक्तिपीठ में सिर्फ एक ईट रखी हैं जिसमें सैकड़ों साल का अतीत छिपा हैं।
यह स्थान हमीरपुर, बांदा, महोबा, फतेहपुर व मध्यप्रदेश के कई इलाकों में विख्यात हैं। हर रोज दर्शन करने के लिये यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती हैं। तीज त्यौहारों में तो शक्तिपीठ में तिल रखने को भी जगह नहीं थी। पूर्व ग्राम प्रधान दिनेश शुक्ला व महंत रतन ब्रह्मचारी ने बताया कि मां ज्वाला देवी के दरबार का इतिहास सैकड़ों साल पुराना हैं जहां प्रतिदिन पूजा अर्चना करने के लिये देवी भक्तों की भारी भीड़ जुटती हैं। नवरात्रि पर्व पर सुबह से ही इस पवित्र स्थान में लोगों की भीड़ पूजा अर्चना के लिये उमड़ी है। गांव के लोग मंदिर के बाहर आने जाने वाले श्रद्धालुओं को मदद भी करते हैं ताकि उन्हें कोई दिक्कतें न उठानी पड़े। मंदिर में मां को परम्परागत प्रसाद अर्पित करने के बाद भक्त लोग अद्भुत ईट के दर्शन जरूर करते हैैं। क्योंकि यह ईट बड़ी ही चमत्कारी है जिसे ध्यान लगाकर मन्नतें मांगने पर मां ज्वाला देवी मनोकामना जरूर पूरी करती हैं।
सदियों पुरानी है मां ज्वाला की शक्तिपीठ
गांव के बुजुर्ग आदित्य शुक्ला व पूर्व प्रधान दिनेश शुक्ला ने बताया कि मां ज्वाला देवी के दरबार का इतिहास कम से कम सात सौ साल पुराना है। हर एक की इस दरबार से मुरादें पूरी होती हैं। साल भर तक यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। शक्तिपीठ में सिर्फ पूड़ी, गुड़ व चने की दाल से बनायी गयी रोठ ही प्रसाद के तौर पर चढ़ाया जाता हैं। यह प्रसाद मां को प्रिय भी हैं। इस तरह के प्रसाद को चढ़ाने की परम्परा भी सैकड़ों सालों से चली आ रही हैं जो मौजूदा समय में भी कायम है।
भुर्जी जाति के बुजुर्ग को संत से मिली थी ईट
पूर्व प्रधान दिनेश शुक्ला ने बताया कि गांव के भुर्जी जाति के एक बुजुर्ग व्यक्ति घर से चारो धाम की तीर्थयात्रा पर पैदल निकला था। उसे जंगल में एक संत मिल गये। बीहड़ केे बीच साधना में बैठे संत ने उसे अपने पास बुलाया और थोड़ा आराम करने के लिये कहा। संत की बात मानकर भुर्जी वहीं बैठ गया था। उसने देखा कि संत के पास एक दिव्य ईट रखी हैं जिसमें ज्वाला जल रही है। संत ने भुर्जी से कहा कि इस ईट से बड़ा कोई और तीर्थ नहीं होगा। ये विधि विधान से स्थापित भी हैं।
