मोहम्मद रफी साहब ने अपने गायन के आरंभ में जिस गायक के स्टाइल को अपनाया वे जीएम दुर्रानी थे । यहां तक कि रफी साहब ने अपने फिल्मी करियर का पहला हिंदी गीत "दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी " संगीतकार श्याम सुंदर की धुन पर फिल्म गांव की गोरी (1944) के लिए जीएम दुर्रानी के साथ कोरस में गया था। जीएम दुर्रानी ने फिल्मों में कुल मिलाकर लगभग 500 गीत गाए हैं । 1944 से 1951 तक वे अपने गायन के शीर्ष पर थे। दुर्रानी साहब अच्छे गायक ही नहीं बल्कि अच्छे संगीतकार के साथ-साथ अच्छे अभिनेता भी थे। फिल्मों में संगीतकार के रूप में उन्होंने "गुंजन" नाम का इस्तेमाल किया। अभिनेता के तौर पर उनकी कुछ फिल्में थीं- रेत महल (1949), तीसरा कौन (1965), आकाशदीप (1965), बहारें फिर भी आएगी (1966), लाल पत्थर (1971) और भूमिका (1977)। ।
जीएम दुर्रानी का पूरा नाम गुलाम मुस्तफा दुर्रानी था । वह 1919 में पेशावर में पैदा हुए थे। पिता की सख्ती से तंग आकर 1935 में एक दिन उन्होंने घर छोड़ दिया और गायक के रूप में अपनी किस्मत आजमाने के लिए बंबई की ट्रेन में बिना टिकट सवार हो लिए। टिकट चेकर ने उनकी सुरीली आवाज सुनकर उन्हें बेटिकट जाने दिया। बंबई में उनके एक दोस्त इसाक शिकारपुरी थे जो एआर कारदार के फिल्मों में गायक व संगीतकार थे ने उन्हें कई लोगों से मिलवाया। मिनर्वा मूवीटोन के सोहराब मोदी को उनकी गायकी का अनोखा अंदाज पसंद आ गया और उन्होंने उस समय बन रही अपनी फिल्म सैद-ए-हवस (1938) में उन्हें दरबारी गायक का रोल दे दिया। तब तक भारतीय फिल्मों में प्ले बैक की प्रथा चालू नहीं हुई थी इसलिए उन्हें सीधे कैमरे के सामने खड़े होकर शराबी का अभिनय करते हुए एक गजल गानी पड़ी।
इस बीच मिनर्वा मूवीटोन की कई फिल्म फ्लॉप हो गईं तो उन्हें मजबूरन ऑल इंडिया रेडियो में 40 रुपये की नौकरी करनी शुरू कर दी। प्ले बैक तकनीक के शुरू होने के साथ ही 1940 की फिल्म बहुरानी में उनके गुरु संगीतकार रफीक गजनवी ने उनसे कई गीत गवाए लेकिन ऑल इंडिया रेडियो की सरकारी नौकरी के कारण ग्रामोफोन में उनका नाम नहीं दिया गया। 31 दिसंबर, 1940 को उन्होंने अपनी रेडियो की नौकरी को अलविदा कह दिया और पूरी तरह से अपने फिल्मी करियर पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया। इसके बाद तो उन्होंने 'मिर्जा गालिब', 'हमलोग', 'मगरूर', 'शमा', 'नमस्ते', और 'सबक' जैसी सुपरहिट फिल्मों के लिए खुर्शीद अनवर, नौशाद, शंकर राव व्यास और एआर कुरैशी (अल्ला रक्खा) जैसे प्रसिद्ध संगीत-निर्देशकों के लिए गाया और लोकप्रियता के बेहद ऊंचे मुकाम पर जा बैठे।
कई गायकों ने उनके साथ अपने करियर की शुरुआत की। मोहम्मद रफी के अलावा जोहराबाई अम्बालावाली से लेकर सुरैया, उमादेवी, सितारा, शमशाद बेगम, नूरजहां, खान मस्ताना और अमीरबाई कर्नाटकी, कोई भी ऐसे गायक-गायिका नहीं थे जिन्होंने दुर्रानी के साथ न गाया हो। लता मंगेशकर (चांदनी रात) और गीता दत्त (दो भाई) ने भी अपने करियर की शुरुआत दुर्रानी के साथ गाये ड्यूएट के जरिये ही की थी। दिलचस्प बात यह है कि वह हिंदू भक्ति गीत गाने वाले पहले मुस्लिम गायकों में से एक थे। ऐसा ही एक गाना उन्होंने संगीतकार शंकर राव व्यास के लिए गाया था, फिल्म भरत मिलाप (1942) में रघुकुल रीत सदा चली आई: - उसी वर्ष उन्होंने फिल्म चूड़ियां में संगीतकार एसएन त्रिपाठी के लिए शीर्षक गीत "चूड़ियां ले लो" गाया। संगीतकार ख्वाजा खुर्शीद अनवर के वे सहायक भी रहे। उनकी सिफारिश पर उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अंगूरी (1941) किस्मत पलट के देख (1961) और फिल्म स्टेट एक्सप्रेस (1961) में गुंजन के नाम से संगीत भी दिया।
एक गायक के रूप में उनका करियर अचानक खत्म हो जाने के पीछे कई दस्तानें हैं। कुछ लोगों का कहना है कि एक गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान उस समय की एक गायिका जो बाद में बहुत बड़ी हस्ती बनकर उभरी के पहनावे पर की गई टिप्पणी के कारण उन्होंने कई संगीतकारों से उनसे गाना न गवाने को कहा। लेकिन यह सच नहीं है। दरअसल 50 के दशक के आरंभ में कई प्रतिभाशाली गायकों जैसे मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मुकेश और मन्ना डे के आने के कारण और दाढ़ी आदि बड़ाकर उनके आध्यात्मिक हो जाने के कारण वे पीछे होते चले गए और धीरे-धीरे गुमनामी के अंधेरे में खो गए । उनका अंतिम समय बड़ा मुश्किल में बीता। जीवनयापन के लिए उनको अपने घर का फर्नीचर ,गहने और घर सब कुछ बेचना पड़ा। जनरल मर्चेंट की दुकान चलाई और 100 रुपयों की मामूली रकम के लिए रेडियो के विज्ञापनों और जिंगल के लिए अपनी आवाज दी। कैंसर से छह वर्ष तक लड़ते-लड़ते और उचित इलाज के अभाव में वे आखिरकार 8 सितंबर, 1988 को हमारे बीच नहीं रहे ।
चलते-चलते
विभाजन के समय भारत से पाकिस्तान चली गई लोकप्रिय गायिका नूरजहां अस्सी के दशक में जब लाहौर से भारत आईं तो उनके सम्मान में टाटा आयल मिल्ज वालों ने 11 फरवरी, 1982 को मुंबई के षणमुखा हाल में एक संगीत संध्या "मोर्टल मैन इम्पोर्टल मेलोडीज" का आयोजन किया था। इस रंगारंग समारोह में दूसरे नामचीन गायकों के साथ दुर्रानी साहब ने भी अपनी फिल्म "नयी कहानी" (1943) का मधुर गीत “नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे, कितने मीठे कितने प्यारे" गाकर श्रोताओं को आनंद विभोर कर दिया था। उनके चाहने वाले जो कि कई दशकों से उनकी सुरीली आवाज को सुनने के लिए तरस रहे थे, इस महफिल में स्टेज पर उनकी आवाज सुनकर कई दिनों तक भाव विभोर रहे थे।
लेखक - अनुज कुमार शर्मा
