बॉलीवुड के अनकहे किस्से: वह अमर प्रार्थना गीत 41 रीटेक के बाद ओके हुआ Date : 19-May-2024 व्ही .शांताराम ने जब अपनी फिल्म `दो आंखें बारह हाथ' को बनाना शुरू किया था तब गंभीर विषय के चलते उनकी पूरी यूनिट को इसकी सफलता पर संदेह था। लेकिन व्ही. शांताराम को छह खूंखार कैदियों, एक जेलर और खुले जेल की अनोखी सोच की सफलता पर पूरा विश्वास था, इसलिए वह फिल्म को उत्कृष्ट बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे थे। उनके परिश्रम और जुनून को देखकर इस फिल्म के निर्माण का विरोध कर रहे उनके सहयोगी, कलाकार और तकनीशियन भी पूरे उत्साह से काम करने लगे। खुली जेल की शूटिंग के लिए व्ही .शांताराम ने कोल्हापुर से 10-12 किलोमीटर दूर कसबा बावड़ा के रास्ते में एक उजाड़-सा मैदान चुना था। मैदान में खुली जेल और एक पुराने से बंगले का सेट लगाया गया था। यहां 20-22 दिन की शूटिंग में जेलर और कैदियों के कई महत्वपूर्ण दृश्य, खिलौने वाली चंपा और कैदियों के सीन तथा चार गीत फिल्माए गए। फिल्म का क्लाइमेक्स जो कि एक प्रार्थना गीत की पृष्ठभूमि में था, यहीं फिल्माया जाना था। व्ही . शांताराम का मन ऐसे प्रार्थना गीत का था जो किसी धर्म विशेष से न जुड़ा हो बल्कि वह ऐसा गीत हो जो हर इंसान को मेहनती और ईमानदार बनने की प्रेरणा दे। फिल्म के गीतकार पंडित भरत व्यास और संगीतकार वसंत देसाई थे। भरत व्यास ने पूरी रात जागकर गीत लिखा और जब उसका मुखड़ा शांताराम जी को सुनाया तो वह बहुत खुश हुए और तुरंत ही घोषणा कर दी कि यह गीत अमर होगा। इस प्रार्थना गीत के बोल थे- मालिक तेरे बंदे हम ऐसे हो हमारे करम नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हंसते हुए निकले दम... व्यास ने जिस तर्ज में इसे गाकर सुनाया था वह भी शांताराम जी को बहुत पसंद आई और उन्होंने वसंत देसाई को उसी तर्ज पर धुन बनाकर गीत रिकॉर्ड करने को कहा। फिल्म में यह गीत दो प्रसंग पर फिल्माया जाना था। इसे एक बार लता मंगेशकर की आवाज में और एक बार पुरुष कोरस में रिकॉर्ड किया गया। फिल्म के अंत में जेलर आदिनाथ की मृत्यु होने के दौरान खिलौने बेचने वाली चंपा यह गीत गाती है। जब यह गीत फिल्माया जा रहा था तब सभी मुख्य कलाकार एक साथ फ्रेम में थे। व्ही .शांताराम ने फ़िल्म में जेलर का रोल किया था। सभी लोगों को निर्देश देने के बाद शांताराम जी चारपाई पर आकर लेटते थे। फिल्म के कैमरामैन थे जी. बालकृष्ण । हर बार शॉट लेने के दौरान कोई न कोई गड़बड़ हो जा रही थी। कई बार प्लेबैक मशीन चलाने वाले से मशीन चलाने में देर हो जाती, कभी क्रेन धीमी हो जाती तो कभी किसी कलाकार को फ्रेम में पहुंचने में देर हो जाती। इस तरह जब 40 रीटेक हो गए तो व्ही .शांताराम का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने सभी को सख्त स्वर में कहा कि इस बार कोई गलती नहीं करेगा। लेकिन उनका इशारा कैमरामैन बालकृष्ण की ओर सबसे ज्यादा था। आखिरकार लाइट... कैमरा... एक्शन ...की जोरदार आवाज के बाद कैमरा रोल हुआ। शांताराम जी धीरे-धीरे खाट पर जाकर लेट गए। हर कलाकार ने सावधानी बरती। शॉट खत्म होते ही जब शांताराम जी ने कैमरामैन बालकृष्ण से पूछा, "क्या शॉर्ट ओके हुआ? तो बालकृष्ण ने घबराते हुए कहा कि नहीं...अन्ना...। शांताराम जब गुस्से में उनकी तरफ बड़े तो उन्होंने डर कर अपने सहयोगी से क्रेन अप... क्रेन अप... कहकर चिल्लाना शुरू कर दिया। सहयोगी ने भी क्रेन ऊपर कर दी। अब तो शांताराम जी और गुस्सा हो गए। उन्होंने उनसे पूछा कि किसकी गलती है यह तो बताओ... जिसकी गलती है वह आज बच नहीं पाएगा... तब क्रेन पर बैठे-बैठे घबराए हुए बालकृष्ण ने कहा कि सब कुछ ठीक हुआ था अन्ना लेकिन जब कैमरा आपकी तरफ आया तब आपने चारपाई पर लेटने में देर कर दी। अपनी गलती जानकर शांताराम जी का गुस्सा शांत हुआ। बुरी तरह डरे हुए बालकृष्ण को देखकर उनकी हंसी निकल गई...तब कहीं जाकर बालकृष्ण सामान्य हुए और अगला टेक ओके हो गया। यह 41वां टेक था। फिल्म के एक अन्य गाने सैयां झूठों का बड़ा सरताज निकला... को गाते हुए खिलौने बेचने वाली चंपा की चप्पल में एक कंकड़ फंस जाता है जिसे वह निकाल कर दूर फेंक देती है। इस गाने के कई दिन बाद अचानक शांताराम जी ने अपने सहायक कैमरामैन त्यागराज को पास के एक तालाब से उड़ते हुए सारसों के झुंड के शॉट लेने को कहा। वह चार-पांच दिन रोज सुबह मेहनत करते रहे लेकिन एक बार में तीन या चार से ज्यादा सारस उड़ ही नहीं रहे थे। उन्होंने शोर मचा लिया, पत्थर मार लिए लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार एक बंदूक मंगाकर फायर करने पर उड़ते हुए सारसों के झुंड को शूट किया जा सका। एक दिन त्यागराज ने डरते-डरते शांताराम जी से पूछा कि दादा ऐसा तो कोई शॉट फिल्म में नहीं है। फिर इसे कहां लगाएंगे? तब शांताराम जी ने बड़े शांत स्वर में कहा कि तुम्हें याद है वह कंकड़ जो गाना गाते हुए चंपा की चप्पल में फंसा था! वह कंकड़ ही उसने इस तालाब में फेंका था। तभी तो इतने सारस एक साथ उड़े थे... अब चौकने की बारी त्यागराज की थी। चलते चलते फिल्म के गंभीर विषय को देखते हुए दर्शकों के मनोरंजन के लिए शांताराम जी ने सोचा था कि खुले कारागार में लंबे-चौड़े खूंखार कैदियों पर नजर रखने के लिए एक बहादुर पहरेदार की जगह एक पतला-दुबला दब्बू-सा पहरेदार रखा जाए। इसके लिए उन्होंने मराठी के प्रसिद्ध हास्य कलाकार राजा गोसावी से बात भी की थी लेकिन तारीखों की समस्या के कारण वह यह भूमिका नहीं कर सके। इसलिए शांताराम ने इस भूमिका के लिए अपने राजकमल स्टूडियो के सहायक कैमरामैन पतले-दुबले त्यागराज को ही चुना था। कैदी के बच्चों की दादी की भूमिका आशा देवी नामक अभिनेत्री को दी गई थी और सब्जी के दलाल नत्थू सेठ की भूमिका के लिए राजकमल स्टूडियो के ही ड्रेपरी प्रमुख चांदोरकर को चुना गया था। लेकिन सभी कलाकारों को लुक टेस्ट पास होने के बाद ही रोल दिए गए थे।