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आईएनएस विक्रांत के लिए फ्रेंच राफेल मरीन ने अमेरिकी एफ/ए-18 को पीछे छोड़ा

Date : 09-Dec-2022

 राफेल के समुद्री संस्करण में वायुसेना वर्जन के साथ 85 फीसदी से अधिक समानता होगी

- नौसेना ने रक्षा मंत्रालय को सौंपी दोनों लड़ाकू विमानों की परीक्षण रिपोर्ट, मंजूरी का इन्तजार 

नई दिल्ली, 09 दिसंबर (हि.स.)। देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत के लिए भारतीय नौसेना 26 नए डेक-आधारित लड़ाकू विमानों को खरीदने की तैयारी में है। इसके लिए सीधी प्रतिस्पर्धा में फ्रांसीसी राफेल मरीन लड़ाकू विमान ने अमेरिकी एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट को पीछे छोड़ दिया है। फ्रांसीसी और अमेरिकी कंपनियों ने गोवा में तट-आधारित परीक्षण सुविधा में अपने-अपने विमानों की क्षमताओं का प्रदर्शन किया। नौसेना ने रक्षा मंत्रालय को दोनों लड़ाकू विमानों की परीक्षण रिपोर्ट सौंप दी है। अब सरकार की मंजूरी का इन्तजार है। 

राफेल मरीन को फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन ने बनाया है जबकि सुपर हॉर्नेट अमेरिकी कंपनी बोइंग का उत्पाद है। डसॉल्ट और बोइंग ने क्रमश: जनवरी और जून में गोवा में तट-आधारित परीक्षण सुविधा में नौसेना के साथ अपने-अपने विमानों की क्षमताओं और स्की-जंप का प्रदर्शन किया था। नौसेना ने रक्षा मंत्रालय को दोनों लड़ाकू विमानों की परीक्षण रिपोर्ट सौंप दी है। अब नौसेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सरकार से सरकार के बीच सौदे पर अंतिम फैसला होना बाकी है, जिसके लिए सरकार की मंजूरी का इंतजार है। 

नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राफेल मरीन नौसेना की आवश्यकताओं के लिए बेहतर फिट पाया गया है। अधिकारी ने कहा कि भारतीय वायु सेना पहले से ही राफेल लड़ाकू विमानों के दो स्क्वाड्रन का संचालन करती है और यदि नौसेना भी उसी लड़ाकू विमान के समुद्री संस्करण का आदेश देती है, तो पुर्जों और रखरखाव में आसानी होगी। दरअसल, राफेल के समुद्री संस्करण और वायु सेना के लड़ाकू राफेल में 85 फीसदी से अधिक समानता है। भारत की समुद्री सेना को अपनी लड़ाकू क्षमता की कमी पूरी करने के लिए राफेल मरीन विमानों का इस्तेमाल करना सही है।

नौसेना प्रमुख एडमिरल आर. हरि कुमार ने पिछले सप्ताह कहा था कि आईएनएस विक्रांत के लिए भारत खुद स्वदेशी जुड़वां इंजन वाले डेक-आधारित लड़ाकू (टीईडीबीएफ) विकसित करेगा। नौसेना इन विमानों के डिजाइन और विकास के लिए एक मसौदा नोट तैयार कर रही है। नौसेना इस परियोजना पर रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (डीआरडीओ) और वैमानिकी विकास एजेंसी के साथ काम कर रही है। टीईडीबीएफ का पहला प्रोटोटाइप 2026 के आसपास तैयार होने की संभावना है और इसका उत्पादन 2032 तक शुरू हो सकता है। चूंकि टीईडीबीएफ अभी भी एक दशक दूर है, इसलिए नौसेना विकल्प के तौर पर 26 लड़ाकू विमानों को खरीदने पर विचार कर रही है।

जानकारों का कहना है कि राफेल के समुद्री संस्करण और भारतीय वायु सेना के राफेल के साथ 85 फीसदी से अधिक समानता होगी। इसका मतलब है कि पुर्जों के रसद प्रबंधन और रखरखाव की समानता में जबरदस्त फायदे होंगे। फ्रांसीसी कंपनी ने भी इस बात पर जोर दिया है कि राफेल मरीन भारतीय वायुसेना के 36 राफेल लड़ाकू विमानों के समान होने से प्रशिक्षण, रखरखाव और रसद समर्थन में आसानी होगी। यह विमान आईएनएस विक्रमादित्य की तरह आईएनएस विक्रांत से भी उड़ान भरने के लिए स्की-जंप का उपयोग करेंगे। फिलहाल विक्रमादित्य से रूसी मूल के मिग-29के लड़ाकू विमानों का संचालन किया जा रहा है।

फाइटर जेट राफेल के मुकाबले 'राफेल मरीन' की खासियत

भारतीय वायु सेना के उपयोग में आने वाले राफेल जेट के समुद्री संस्करण 'राफेल मरीन' में एक अंडरकारेज और नोज व्हील, एक बड़ा अरेस्टर हुक, एक एकीकृत सीढ़ी जैसे कई अन्य मामूली अंतर हैं। स्की टेक-ऑफ के लिए राफेल मरीन चार-पांच टन बाहरी भार पूर्ण आंतरिक ईंधन के साथ ले जा सकता है। कम आंतरिक ईंधन के साथ यह मिशन की आवश्यकताओं के आधार पर अधिक हथियार ले जा सकता है। इसमें लड़ाकू हवाई गश्त, अवरोधन, एडी एस्कॉर्ट, समुद्री और जमीनी हमले शामिल हैं। राफेल मरीन लड़ाकू विमानों का नवीनतम संस्करण है। परमाणु सक्षम राफेल मरीन हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल उल्का, हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल स्कैल्प और हैमर प्रिसिजन गाइडेड गोला-बारूद ले जा सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार/सुनीत निगम 


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