वरिष्ठ गांधीवादी, समाजवादी और स्वतंत्रता सेनानी जीजी पारिख का मुंबई में 100 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पारिख ने अपने जीवनकाल में दो बार जेल में समय बिताया—पहली बार 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान और दूसरी बार आपातकाल के समय।
इन चुनौतियों के बावजूद, उनका सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पण कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में की और 1940 के दशक के प्रारंभ से सौराष्ट्र और मुंबई में विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके साथ ही, वे छात्र कांग्रेस की बॉम्बे इकाई के अध्यक्ष भी रहे।
उनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाजसेवा दोनों में यादगार रहेगा।
