नई दिल्ली, 05 मई । संगीतज्ञ एवं दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर डॉ. मधुर लता भटनागर ने कहा कि युवा दिखावे से दूर रहकर अपनी जड़ों से जुड़े और ऐसे काम करें जिससे समाज का भी भला हो।
डॉ. भटनागर ने मंगलवार को हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) में चल रहे दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (डीआईएफएफ) 2026 के दौरान 7 मई को उनकी लघु फिल्म 'म्यूजिक ऑफ नेचर' प्रदर्शित की जाएगी, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देगी। उनकी यह 8 मिनट की फिल्म मानवीय पात्रों से मुक्त है। इसमें केवल पेड़-पौधे, झरने, पहाड़, बादल और चाँद-सितारों को ही 'कलाकार' के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उन्होंने कहा, "फूल-पौधे झूमते और गाते हैं, झरनों के बहने में भी एक लय है। मैंने इसी प्राकृतिक संगीत को संजोया है ताकि दुनिया भर में जो पेड़ काटे जा रहे हैं, उन्हें रोका जा सके और लोग प्रकृति की महत्ता को समझें।" फिल्म में कोयल और मोर की वास्तविक आवाजों के साथ बांसुरी और अन्य वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया गया है।"
साक्षात्कार के दौरान डॉ. भटनागर ने अपने गौरवशाली अतीत को साझा करते हुए बताया कि वह पहली संगीतकार थीं जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं को संगीतबद्ध किया था।
उन्होंने बताया कि आजादी के 50वें वर्ष के उपलक्ष्य में मंडी हाउस स्थित रूसी सांस्कृतिक केंद्र में स्वयं अटल की उपस्थिति में उनके गीतों के कैसेट का विमोचन हुआ था। उन्होंने अटल की प्रसिद्ध रचनाओं जैसे "विश्व शांति के हम साधक हैं, जंग न होने देंगे", "उनकी याद करें" और "भारत का मस्तक कभी नहीं झुकेगा" को अपनी धुनों से सजाया है।
मूल रूप से मुरादाबाद की रहने वाली और दिल्ली को अपनी कर्मभूमि बनाने वाली डॉ. भटनागर ने संगीत में पीएचडी की है। उनके लिखे शोध ग्रंथ आज भी विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे हैं। हाल ही में 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस और संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दूरदर्शन द्वारा उनके पांच गीतों का प्रसारण किया गया।
आज की 'रील्स' और सोशल मीडिया वाली पीढ़ी को संदेश देते हुए डॉ. भटनागर ने कहा कि कला में सामाजिक उद्देश्य का होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, "कोई भी कला का कार्य ऐसा हो जिसमें सामाजिक संदेश हो। युवाओं को केवल दिखावे (मटेरियलिस्टिक) के पीछे नहीं भागना चाहिए बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ना चाहिए।"
डॉ. भटनागर वर्तमान में ध्रुपद और धमार जैसी लुप्त होती शास्त्रीय विधाओं के संरक्षण के लिए भी कार्य कर रही हैं। उनका यूट्यूब चैनल 'मधुर लता' उनके भजनों, गजलों और शास्त्रीय संगीत के प्रेमियों के लिए एक बड़ा मंच बन गया है।
